दीवाली-दीपावली : तमसो मा ज्योतिर्मय : भारत का प्रकाशोत्सव
दिवाली 7 नवंबर 2018 (बुधवार)

दिवाली या दीपावली भारतवर्ष में मनाया जाने वाला हिंदूओं का एक ऐसा पर्व है जिसके बारे में लगभग सब जानते हैं। भगवान राम की अयोध्या वापसी पर लोगों ने उनका स्वागत घी के दिये जलाकर किया। अमावस्या की काली रात रोशन भी रोशन हो गई। अंधेरा मिट गया उजाला हो गया यानि कि अज्ञानता के अंधकार को समाप्त कर ज्ञान का प्रकाश हर और फैलने लगा। इसलिये दिवाली को प्रकाशोत्सव भी कहा जाता है। दिवाली का त्यौहार जब आता है तो साथ में अनेक त्यौहार लेकर आता है। एक और यह जीवन में ज्ञान रुपी प्रकाश को लाने वाला है तो वहीं सुख–समृद्धि की कामना के लिये भी दिवाली से बढ़कर कोई त्यौहार नहीं होता इसलिये इस अवसर पर लक्ष्मी की पूजा भी की जाती है।

वास्तव में दीवाली सिर्फ एक त्योहार नहीं, बल्कि यह त्योहारों का समूह है, जो 5 दिनों तक मनाया जाता है। इस वर्ष बुधवार, 7 नवम्बर 2018 को महालक्ष्मी की पूजा का महापर्व दिवाली है। दिवाली पर की गई पूजा से लक्ष्मी प्रसन्न होती हैं और धन संबंधी परेशानियों से मुक्ति मिल सकती है। लक्ष्मी को प्रसन्न करने के लिए पुरानी परंपराओं के अनुसार कुछ खास काम बताए गए हैं।
दीपदान, धनतेरस, गोवर्धन पूजा, भैया दूज आदि त्यौहार दिवाली के साथ–साथ ही मनाये जाते हैं। पांच दिन के इस दिवाली उत्सव में विभिन्न अनुष्ठानों का पालन किया जाता है।पांच दिनों के दीवाली उत्सव में अमावस्या का दिन सबसे महत्वपूर्ण होता है, इसे लक्ष्मी पूजा, लक्ष्मी–गणेश पूजा और दीवाली पूजा के नाम से जाना जाता है. केवल घरों में ही नहीं दीवाली पूजा कार्यालयों में भी की जाती है। व्यवसायियों के लिए दीवाली का दिन सबसे महत्वपूर्ण होता है।
इस दिन स्याही की बोतल, कलम और नए बही–खातों की पूजा की जाती है। दावात और लेखनी पर देवी महाकाली की पूजा और नए बही–खातों पर मां सरस्वती की पूजा कर बही–खातों को भी पवित्र किया जाता है। इस साल दिवाली 7 नवंबर 2018 (बुधवार) को है।

सांस्कृतिक, सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक हर लिहाज से दिवाली बहुत ही महत्वपूर्ण त्यौहार है। वर्तमान में तो इस त्यौहार ने धार्मिक भेदभाव को भी भुला दिया है और सभी धर्मों के लोग इसे अपने–अपने तरीके से मनाने लगे हैं। हालांकि पूरी दुनिया में दिवाली से मिलते जुलते त्यौहार अलग–अलग नामों से मनाये जाते हैं लेकिन भारतवर्ष में विशेषकर हिंदूओं में दिवाली का त्यौहार बहुत मायने रखता है।
ऐसा कहा जाता है कि कार्तिक मास की अमावस्या की आधी रात में मां लक्ष्मी धरती पर आती हैं. जिस घर में स्वच्छता और शुद्धता होती है मां लक्ष्मी वहां निवास करती हैं। दीवाली को दीपावली के नाम से भी जाना जाता है, बता दें कि दीवाली उत्सव धनतेरस से शुरू होता है और भैया दूज पर समाप्त होता है।

दीवाली या दीपावली, भारतीय संस्कृति का सबसे महत्वपूर्ण पावन पर्व हैं। हर गाँव नगर और प्रांतों में हर जाति एवं धर्म के लोग इस पर्व को मनाते हैं। दीवाली को त्योहार का रूप देने में भारतीय संस्कृति के लोक–व्यवहारों का प्रमुख योग रहा हैं। घरों की सफ़ाई दीवाली के कई दिन पूर्व से की जाती है। गाँवों और क़स्बों में आज भी लोग–बाग स्वयं अपने घरों की सफ़ाई दीवाली से हफ़्तों पहले प्रारंभ करते हैं। घरों की लिपाई और पुताई का प्रचलन आज भी दृष्टिगत होता है। गाँवों में जहाँ कच्चे मकान मिट्टी के बने होते हैं, वहाँ गोबर की लिपाई दीवारों, छतों और फ़र्श पर की जाती हैं। गोबर गंदे वातावरण को दूर कर कीटनाशन गुण रखने वाले पदार्थ हैं। हमारे स्वास्थ्य के लिए भी गोबर की उपयोगिता को वैज्ञानिकों ने स्वीकार किया है।
शहरों में जहाँ मकान पक्के बने होते हैं वहाँ मकानों पर कलई, सफ़ेदी की पुताई अथवा रंगों की सजावट की जाती हैं। चूना भी कीटनाशक पदार्थ हैं। दीवारों और छतों पर चूने की पुताई करके हम अपने घर के वातावरण को स्वच्छ और शुद्ध बनाते हैं। घरों की सफ़ाई में ही निहित हैं और अपने गाँव और शहर की सफ़ाई और नगर की स्वच्छता में ही छिपा हुआ हैं, वहाँ के निवासियों का स्वास्थ्य। इस प्रकार दीवाली के अवसर पर की जाने वाली घरों की सफ़ाई में हमारे नगर प्रांत और देश की स्वच्छता और हमारे स्वास्थ्य की भावना प्रवाहित होती है। इतना ही नहीं एक दूसरे के मकानों की सफ़ाई में हम लोग आपस में सहयोग करते हैं। समाज के कल्याण और दूसरों की भलाई करने के लिए यह सहयोग व्यापक रूप ग्रहण कर लेता हैं, जिसमें हमारी यह भावना अंतर्निहित रहती हैं कि हम दूसरों के स्वास्थ्य और साफ़ रहने की कामना करते हैं।

दीवाली के अवसर पर घरों में चौक पूरे जाते हैं। दरवाज़ों पर रंगोली रचाई जाती हैं और आँगन में अल्पना सजाई जाती हैं। घर के मुख्य द्वार पर “शुभ लाभ” लिखना अथवा गणेश और लक्ष्मी की मूर्ति बनाने की प्रथा आज भी दृष्टिगत होती है। कहीं–कहीं तो घर के मुख्य दरवाज़े पर दोनों ओर रंग–बिरंगे हाथी बनाए जाने की प्रथा भी हैं। हाथी लक्ष्मी का सहचर हैं और गणेश बुद्धि तथा सफलता के देव हैं। दीवाली से ही व्यापारी लोग अपना नया साल शुरू करते हैं। शुरू करने को ही श्री गणेश भी कहा जाता है। अत: लक्ष्मी गणेश और हाथी के चित्र हमारे पारिवारिक और सामाजिक जीवन में आने वाले वर्ष के लिए सुख, समृद्धि और सफलता की कामना के प्रतीक हैं।
शुभ गणेश का प्रतीक हैं और लाभ लक्ष्मी का। इसलिए दीवाली के दिन लक्ष्मी के साथ–साथ गणेश की भी पूजा होती हैं। लक्ष्मी सामाजिक समृद्धि का आधार स्तंभ हैं, जिसकी कामना ग़रीब और अमीर सभी करते हैं। लेकिन केवल समृद्धि ही सब कुछ नहीं हैं। लक्ष्मी (धन) के सदुपयोग के लिए बुद्धि और विवेक की आवश्यकता होती हैं। बुद्धि और विवेक के अभाव में धन का दुरुपयोग होने से हमारा नैतिक पतन अवश्यंभावी हैं। हमारे आसपास ऐसे उदाहरण कम नहीं हैं, जहाँ धन की बहुतायत वाले परिवार दुराचरण और अनैतिकता के रास्ते पर चलते–चलते पतन की ओर अभिमुख होते देखे गए हैं। अत: आज के इस पावन पर्व दीवाली के अवसर पर हम लक्ष्मी और गणेश दोनों की पूजा करके सदाचार, विवेकशील और समृद्धिशाली होने की अपनी मनोकामना व्यक्त करते हैं।

दीवाली के दिन घरों पर दीप जलाए जाते हैं और रंग–बिरंगी रोशनी की जाती है। सामाजिक जटिलताओं के कारण दीपावलियों की रोशनी के रूप में और प्रकार में अंतर आ जाता रहा है। हमारी प्रगति की परिचायक विज्ञान के सहारे हम रंग–बिरंगे बिजली के बल्बों का प्रयोग इस अवसर पर करने लगे हैं। मोमबत्तियों से भी रोशनी की जाती है। मूलरूप मे दीपावली दीपों की रोशनी का उत्सव हैं। मिट्टी के दिये में तेल डालकर रूई की बाती बनाकर दिये जलाए जाने की हमारी लोक परंपरा आज भी अपनी लोक संस्कृति को आलोकित करती है। तेल तरल होता है और वह किसी भी वातावरण में अपने को ढाल लेता है। समाज में परिस्थितियों के अनुकूल समायोजित करने की यह कला से क्यों न सीखे। रूई सफ़ेदी होती है, जो सतोगुण का प्रतीक और निर्मल पावनता का द्योतक है। दीपावलियों की यह ज्योति हमारी आंतरिक प्रसन्नता को व्यक्त करती है।

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लेखक – श्री दयानंद शास्त्री, उज्जैन
संपर्क – vastushastri08@gmail.com
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