क्यों अमर वृक्ष कहलाता है अक्षयवट, जानिये इसकी पौराणिक मान्यताएं
संगम नगरी प्रयाग में अक्षयवट का प्रवेश द्वार श्रद्धालुओं के दर्शन और पूजा के लिये दस जनवरी से खोल दिया जायेगा.कुंभ में अक्षयवट दर्शन के बिना श्रद्धालु प्रयागराज में स्नान और पूजा पाठ अधूरा माना जाता है.कुंम्भ में इस बार सभी श्रद्धालु अक्षयवट का दर्शन व पूजन कर सकेगें.कई दशको से यह अक्षयवट किले में सेना की सुरक्षा में था जिसे कुंम्भ मेले में आम जनता के लिए दस जनवरी को खोल दिया जायेगा.
क्या हैं पौराणिक मान्यताएं
किवदंती के अनुसार, एक ऋषि की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान नारायण ने उन्हें दर्शन दिया.
ऋषि ने भगवान से चमत्कार दिखाने को कहा. भगवान ने पूरे संसार को जलमय कर दिया.सबकुछ पानी में डूब गया.लेकिन अक्षय वट सुरक्षित रहा. कहा जाता है कि इस वट वृक्ष के नजदीक मरने वाला सीधे गोलोक (भगवान विष्णु के यहां) जाता है.मान्यता है कि अक्षय वट पर भगवान विष्णु बाल स्वरूप में विराजमान रहते हैं.
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यहां 3 रात रुके थे श्रीराम और माता सीता
ऐसी मान्यता है कि भगवान राम और सीता ने वन जाते समय इस वट वृक्ष के नीचे तीन रात तक निवास किया था.
सीता ने अक्षय वट को दिया था ये आशीर्वाद
बताया जाता है, ”जब राजा दशरथ की मृत्यु के बाद पिंड दान की प्रक्रिया आई तो भगवान राम सामान इकट्ठा करने चले गए.उस वक्त देवी सीता अकेली बैठी थी तभी दशरथ जी प्रकट हुए और बोले की भूख लगी है, जल्दी से पिंडदान करो. ”सीता कुछ नहीं सूझा.उन्होंने अक्षय वट के नीचे बालू का पिंड बनाकर राजा दशरथ के लिए दान किया. उस दौरान उन्होंने ब्राह्मण, तुलसी, गौ, फाल्गुनी नदी और अक्षय वट को पिंडदान से संबंधित दान दक्षिणा दिया.’जब राम जी पहुंचे तो सीता ने कहा कि पिंड दान हो गया.दोबारा दक्षिणा पाने के लालच में नदी ने झूठ बोल दिया कि कोई पिंड दान नहीं किया है.लेकिन अक्षय वट ने झूठ नहीं बोला और रामचंद्र की मुद्रा रूपी दक्षिणा को दिखाया.इसपर सीता जी ने प्रसन्न होकर अक्षय वट को आशीर्वाद दिया कि संगम स्नान करने के बाद जो कोई अक्षय वट का पूजन और दर्शन करेगा उसी को संगम स्नान का फल मिलेगा अन्यथा संगम स्नान निरर्थक हो जाएगा.
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प्रयाग नाम के पीछे ये है मान्यता

कहते हैं ‘ब्रह्मा जी ने वटवृक्ष के नीचे पहला यज्ञ किया था.इसमें 33 करोड़ देवी-देवताओं का आह्वान किया गया था. यज्ञ समाप्त होने के बाद ही इस नगरी का नाम प्रयाग रखा गया था, जिसमें ‘प्र’ का अर्थ प्रथम और ‘त्याग’ का अर्थ यज्ञ से है.
क्यों नहीं करने दिये जाते थे दर्शन
अक्षय वट वृक्ष के पास कामकूप नाम का तालाब था.मोक्ष प्राप्ति के लिए लोग यहां आते थे और वृक्ष पर चढ़कर तालाब में छलांग लगा देते थे.’644 ईसा पूर्व में चीनी यात्री ह्वेनसांग यहां आया था.तब कामकूप तालाब मैं इंसानी नरकंकाल देखकर दुखी हो गया था.’उसने अपनी किताब में भी इसका जिक्र किया था.उसके जाने के बाद ही मुगल सम्राट अकबर ने यहां किला बनवाया.
इस दौरान उसे कामकूट तालाब और अक्षयवट के बारे में पता चला.तब उसने पेड़ को किले के अंदर और तालाब को बंद करवा दिया था. अक्षय वट वृक्ष को अकबर और उसके मातहतों ने कई बार जलाकर और काटकर नष्ट करने की कोशिश की, लेकिन सफल नहीं हुए.’हालांकि यह भी कहा जाता है कि अकबर ने ऐसा इसलिए किया कि वो लोगों की जान बचा सके.”
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अक्षयवट के नीचे ही है अदृश्य सरस्वती नदी

यहां ब्रह्मा जी द्वारा स्थापित वो शूल टंकेश्वर शिवलिंग भी है, जिस पर मुगल सम्राट अकबर की पत्नी जोधा बाई जलाभिषेक करती थी. शूल टंकेश्वर मंदिर में जलाभिषेक का जल सीधे अक्षय वट वृक्ष की जड़ में जाता है. वहां से जमीन के अंदर से होते हुए सीधे संगम में मिलता है.
ऐसी मान्यता है कि अक्षय वट वृक्ष के नीचे से ही अदृश्य सरस्वती नदी भी बहती है.संगम स्नान के बाद अक्षय वट का दर्शन और पूजन यहां वंशवृद्धि से लेकर धन-धान्य की संपूर्णता तक की मनौती पूर्ण होती है।
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