आजकल हमारे देश में कुम्भ का आयोजन चल रहा है. इस समय कुम्भ का आयोजन हरिद्वार और वृन्दावन में हो रहा है. यहाँ वृन्दावन का नाम सुनकर लोगों में भ्रम की सी स्थिति दिखाई दे रही है कि वृन्दावन में कुम्भ कबसे लगने लगा.
कुम्भ मेला वैसे देश के चार स्थानों – हरिद्वार, प्रयागराज, नासिक और उज्जैन – में पूर्ण और अर्द्धकुम्भ लगने की परंपरा है. पर अचानक वृंदावन में कुम्भ लगने से लोगों में उत्सुकता जगी है.
अखाड़ों का निर्माण
कुम्भ में साधु, संन्यासी, ब्रह्मचारी, नागा, बाबा और हिंदू धर्म के विभिन्न संप्रदायों के संत स्नान करते है. आदि शंकराचार्य जी ने हिंदू धर्म को व्यवस्थित करने के लिए 2500 साल पहले शैव अखाड़ों का निर्माण किया जिसमें संन्यासियों की बड़ी संख्या में मौजूदगी होती है.
हर अखाड़े का अपना देवता और संरचना थोडी अलग-अलग होती है. पर ये सभी शंकराचार्य जी के बनाए दशनामी परंपरा को निभाने वाले संन्यासी होते है.
अग्नि अखाड़ा को छोड़कर सभी में नागा संन्यासी की परंपरा है, अग्नि में केवल ब्रह्मचारी होते हैं. देश भर में इसमें साधुओं का प्रतिनिधत्व अणियों और मणियों के माध्यम से होती है. हर अखाड़े में रमता पंच और महंत की भी व्यवस्था होती है.
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वैष्णव अखाड़े

समय काल के साथ और वैष्णव संप्रदाय के स्वरूप लेने से वैष्णवों के तीन अखाड़े बने और इसमें बड़ी संख्या में बैरागी साधु और संत जुड़ते गए. वैष्णव धर्म को आधार और स्वरूप देन में कुछ गुरूओं का बहुत योगदान है.
रामानंद द्वारा रामानंद, रामानुजाचार्य द्वारा विशिष्टाद्वैत, माधवाचार्य द्वारा माध्वचारी, भास्कराचार्य द्वारा निम्बार्क, बल्लभाचार्य द्वारा पुष्टिमार्गी या शुद्धाद्वैत संप्रदाय का प्रचलन हुआ.
वैष्णव उप संप्रदाय
वैष्णव के बहुत से उप संप्रदाय हैं – जैसे बैरागी, दास, राधावल्लभ, सखी, गौड़ीय, विष्णु स्वामी, श्री संप्रदाय, हंस संप्रदाय, ब्रह्म संप्रदाय, रुद्र संप्रदाय आदि है. श्री चतु: सम्प्रदाय वैष्णवों के 52 द्वारा है. वैष्णव अखाड़ों में भी नागा होते है, जो “टहल” और “मुरेटिया” पद के बाद मिलती है.
वैष्णवपंथ के लिए रामानुजाचार्य, रामानंदाचार्य, वल्लभाचार्य ने उल्लेखनीय कार्य किए. उन्होंने वैष्णव संप्रदायों को पुनर्गठित किया तथा वैष्णव साधुओं को उनका आत्मसम्मान दिलाया.
शैव-वैष्णव संत और कुम्भ
अब आते है कुम्भ पर. हरिद्वार कुम्भ में शैव और वैष्णव संतों में स्नान के लिए खूनी संघर्ष की बहुत सी दास्तानें हैं. सन् 1310 में शैव महानिर्वाणी अखाड़ा और रामानंद वैष्णव अखाड़ा में बड़ा संघर्ष हुआ.
वर्ष 1398 के अर्धकुंभ में तैमूर लंग के आक्रमण से कई जानें गईं. वर्ष 1760 में शैव संन्यासी व वैष्णव बैरागी, तो 1796 के कुंभ में शैव संन्यासी और निर्मल संप्रदाय भिड़े. 1998 में हर की पौड़ी में अखाड़ों का संघर्ष हुआ. सन् 1760 में तो शैव नागा साधुओं ने 1800 वैष्णव संतों की हत्या कर दी थी.
1723 में पहला वृन्दावन कुम्भ
वैष्णव अखाड़ा ने कुम्भ में स्नान के इन संघर्षों को देखते हुए 1723 में पहली बार अपना वृंदावन में “वैष्णव बैठक” आयोजित किया. इसमें में केवल वैष्णव अखाड़े आते हैं और कुछ खास दिनों पर स्नान के बाद यहीं से सीधे हरिद्वार कुम्भ की ओर प्रस्थान करते है. इसीलिए ये कुम्भ बैठक नाम से लोकप्रिय हुआ. अंग्रेजी शासन ने 1879 में कुम्भ में स्नान के लिए समय तय करके संघर्षों को विराम देने की कोशिश की, जो व्यवस्था आजतक जारी है.
वृंदावन कुम्भ बैठक का विस्तार
वृंदावन कुम्भ बैठक का विस्तार समय के साथ हुआ है. 1986 की वृंदावन कुम्भ बैठक हाथियों के रेले के लिए मशूहर रहा. साधु संत यहां गाजे-बाजे के साथ पूरे वैभव के साथ आते है. इस बार भी ये 40 दिन का आयोजन है. कुम्भ के पूर्व के इस आयोजन को इस बार सरकार बहुत अच्छे से करवा रही है, जिससे इसे कुम्भ समान ही देखा जा रहा है.
वृन्दावन कुम्भ में शाही स्नान
वृन्दावन कुम्भ में पहला शाही स्नान 27 फरवरी को माघ पूर्णिमा को दूसरा फाल्गुन एकादशी 9 मार्च को और तीसरा फाल्गुन अमावस 13 मार्च को होगा. वहीं शाही परिक्रमा 25 मार्च को रंगभरनी एकादशी के दिन दी जाएगी.
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