



पवित्र जोशीमठ क्षेत्र के जिलाधिकारी, वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक एवं समस्त सम्बन्धित जन, जो कि क्षेत्र के विशिष्ट जन है ।
हम स्वामी अविमुक्तेश्वरानन्दः सरस्वती ज्योतिष्पीठ के पूज्यपाद जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानन्द सरस्वती जी महाराज के दण्डी सन्यासी शिष्य हैं ।
ज्योतिष्पीठ की स्थापना के 2501वें वर्ष का उत्सव इस समय ज्योतिर्मठ में मनाया जा रहा है । इसके अन्तर्गत पूर्व घोषित कार्यक्रम के अनुसार जोशीमठ के विशिष्ट मंदिरों में पूजा-अर्चना का कार्यक्रम भी अखिल भारतीय वैदिक सम्मेलन आदि के साथ चल रहा है । जिसके अन्तर्गत पिछले चार दिनों से तोटकाचार्य जी, शंकराचार्य जी, भविष्य केदार, नृसिंह मंदिर, ज्योतिरीष्वर महादेव आदि की विशेष पूजा सम्पन्न हो चुकी है जिसे ज्योतिर्मठ के वैदिकों, पुरोहितों द्वारा सम्पन्न कराया जा रहा है ।
इसी क्रम मे आज पांचवें दिन ज्योतिष्पीठ की आराध्या भगवती पूर्णागिरि देवी की पूजा का कार्यक्रम था । जब सबेरे नौ बजे हम लोग भगवती के मंदिर में पहुंचे तो वहां पुजारी ( नाम अज्ञात) द्वारा ताला बन्द कर दिया गया और बताया गया कि स्वामी रामानन्द जी कहेंगे तो खुलेगा ।
हमारे दो लोग और फिर बाद मे हम स्वयं मठ में गए । अनुरोध किया कि ताला खोल दीजिए और पुजारी जी को भेज दीजिए जिससे हमारे द्वारा लाए गए पूजा के उपचार (चन्दन-रोली-फल-फूल-साडी-वस्त्र आदि) पुजारी द्वारा भगवती को चढाए जा सके । पर हमारे लोगों से रामानंद जी ने कहा कि ताला नहीं खुलेगा और आप लोग वहां नहीं आइए । हमारे जाने पर रामानंद जी तो नहीं मिले । कहा गया कि कहीं गए है और जो व्यक्ति मिले (नाम अज्ञात-बताया कि हम महर्षि जी के यहाँ से आए हैं) उन्होंने कहा कि ताला नहीं खुलेगा । हमारे प्रेम पूर्वक समझाने पर उन्हीं के साथ खडे व्यक्ति ने कहा कि चलिए आप लोग शुरु करिए- पुजारी को भेजते हैं– गरुगद्दी के दर्शन से भी मना किया ।
हमलोगों ने आकर मंदिर के बाहर खुले स्थान में पूजा आरम्भ किया ।
पूजा के दूसरी मूर्ति मंगवाइ गई और लगभग दो घंटा तक पूजा करते हुए प्रतीक्षा करते रहे पर कोई भी नहीं आया । ऐसे में हमें अत्यन्त मार्मिक पीडा उत्पन्न हुई है कि हम ज्योतिष्पीठ के शंकराचार्य जी के शिष्य होने के बाद भी यदि मठ में रह नहीं सकते, गुरुगद्दी का दर्शन नहीं कर सकते और अपने आराध्या देवी पूर्णाम्बा का दर्शन पूजन भी नहीं कर सकते तो हमारे जीवित रहने का क्या प्रयोजन है ????
इस समय हम अत्यन्त अपमानित और अपने मूलभूत अधिकारों से वंचित होने के कारण निरीह महसूस कर रहे हैं । हम सन्यासी होनेवाला नाते हिंसा का मार्ग नही अपना सकते । अतः शान्तिप्रिय तरीके से अपने अधिकारों की प्राप्ति संरक्षण हेतु भगवती पूर्णागिरी जी के मंदिर के बाहर ही बैठ गए हैं ।
1- हमारी मांग है कि हमारे मूल अधिकार ज्योतिर्मठ में निवास, दर्शन,;पूजन, सत्संग आदि से हमें वंचित ना किया जाए प्रशासन और जनता इसमें हमारी मदद करें ।
2- हमें ससम्मान मठ में अपने अधिकारों के उपभोग को सुनिश्चित कराया जाए और बाधा डालने वालों को हटाया जाए ।
3- इस दौरान हमारी जान माल की सुरक्षा की जिम्मेदारी स्थानीय प्रशासन और उत्तराखंड सरकार की है ।
जबतक हमारी ये मांगें प्रशासन पूरी नहीं करवाता है तबतक हम इसी स्थान पर बिना अन्न,फल, ग्रहण किए केवल ज्योतिधारा का पानी पीकर 3 दिन तक रहेंगे ।
तीन दिन के बाद उसे भी छोडकर अपनी तपस्या जारी रखेंगे ।
तपस्या हमारी परम्परा है इसे करने का संविधान के अनुच्छेद 25 में हमें अधिकार है ।
भवदीय – स्वामिश्रीः अविमुक्तेश्वरानन्दः सरस्वती
वर्तमान में- माता पूर्णागिरी के चरणों, जोशीमठ, चमोली, उत्तराखंड ।
समर्थन में आए संतगण –

Editorial Review Note
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