1100 मुसलमान बच्चों को पढ़ाने वाले कश्मीरी पंडित की दास्तान
कश्मीर के हालात किसी से छिपे नहीं हैं. ऐसे मुश्किल हालातों में जब लोग कश्मीर छोड़ रहे थे तब वहां कोई ऐसा था जिसने एक अलग कश्मीर का सपना देखा था. और अपने उस सपनों को साकार करने के लिए उन्होंने कश्मीर का दामन नहीं छोड़ा.

हम बात कर रहे हैं कश्मीर के गांदरबल में विजय मेमोरियल एजुकेशन इंस्टिट्यूट चला रहे संजय वर्मा की. यह स्कूल सिर्फ स्कूल ही नहीं बल्कि हर मजहब का समवेश लिए हुए है.
आज इस स्कूल में 1100 मुसलमान छात्र पढ़ते हैं. हिन्दू छात्रों की संख्या सिर्फ 15 है. स्कूल में क़रीब पचास शिक्षक हैं, जिनमें से 44 मुस्लिम धर्म से हैं.
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मां की इच्छा पूरी की

संजय वर्मा एक कश्मीरी पंडित हैं, जो विस्थापन के दौर में भी कश्मीर छोड़कर नहीं गए.
वह कहते हैं, “साल 2000 में मेरी मां का एक हादसे में निधन हो गया था. वह शिक्षिका थीं और बच्चों को मुफ़्त में पढ़ाती थीं. जिस दिन उनकी मौत हुई, हमारे घर में वे मुसलमान बच्चे जमा हो गए, जिन्हें वे पढ़ाती थीं. वे रोते रोते कह रहे थे कि हमारी मां मर गई हैं.”
संजय के मुताबिक, मां के देहांत के पास उनके पास यही विकल्प था कि कश्मीर में अपनी सब जायदाद बेच कर निकल जाएं. लेकिन मां चाहती थीं कि यहां पढ़ाई चलती रही. लिहाज़ा मां का सपना पूरा करने के लिए उन्होंने स्कूल शुरू का फैसला किया. लेकिन यह सफ़र आसान नहीं था. पहले साल स्कूल में सिर्फ सिर्फ सात बच्चों का दाख़िला हुआ था.
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इस्लाम की शिक्षा भी दी
मुसलमान बच्चों के लिए संजय वर्मा ने धार्मिक शिक्षक भी रखे हैं और उन्हें मुक़म्मल धार्मिक शिक्षा भी दी जाती है.

कश्मीर से विस्थापन के सवाल पर संजय वर्मा कहते हैं, “हमारे परिवार को कुछ ऐसा महसूस नहीं हुआ कि हमें कश्मीर छोड़ देना चाहिए. हमें अपने मुसलमान पड़ोसियों से इतना प्यार मिला कि कश्मीर छोड़ने की ज़रूरत ही महसूस नहीं हुई.” साल 1990 में कश्मीर घाटी में हथियारबंद आंदोलन के बाद लाखों कश्मीरी पंडित वहां से विस्थापित हो गए और भारत के दूसरे राज्यों में जाकर बस गए.
बच्चों में भी है मज़हबी भाईचारा

वह कहते हैं, “मैं चाहता हूं कि जो भी मुसलमान छात्र यहां से निकले वह अच्छा मुसलमान बनकर निकले. जो हिंदू छात्र यहां से निकले वह भी अच्छा बनकर निकले.” संजय कहते हैं कि शिक्षा के मैदान में न कोई हिंदू होता है और न कोई मुसलमान.
यहां पढ़ने वाले पंडित छात्रों के गहरे दोस्त मुसलमान छात्र हैं. दसवीं की छात्रा ईशा रैना की सबसे अच्छी दोस्त सादिया हैं. दोनों डॉक्टर बनना चाहती हैं.

इसी तरह आठवीं के छात्र राहुल और अयान की दोस्ती भी गहरी है. राहुल कहते हैं, “मुझे हमेशा अयान में एक अच्छा इंसान नज़र आया. जब भी कोई परेशानी होती थी तो अयान मेरी मदद करता था.”
स्पेशल बच्चों के लिए भी है इंतजाम

स्कूल में ‘स्पेशल’ बच्चों के लिए भी इंतज़ाम किया गया है. ऐसी ही दो छात्राएं महविश और रिंको हैं जो बोल तो नहीं पातीं, लेकिन अपनी हर चीज़ एक-दूसरे से मिल-बांटकर खाती हैं.
स्कूल में इस्लाम पढ़ाने वाले मुश्ताक अहमद बताते हैं कि शुरू शुरू में लोगों ने मुझसे कहा कि क्या मालूम इस्लामियत पढ़ाने के हवाले से वहां कुछ होगा भी या नहीं. लेकिन सवाल पूछने वालों की यह धारणा ग़लत निकली.
वह कहते हैं, ‘मैं कई साल से यहां पढ़ाता हूं. कभी ऐसा महसूस नहीं हुआ कि मुझे अपना इस्लामियत मज़मून पढ़ाने में कोई परेशानी आई हो. जिस अंदाज़ से संजय वर्मा ने यह स्कूल चलाया है, वह बहादुरी का काम है.’
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