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उज्जैन महाकालेश्वर- चढ़ावे के फूलों से बनती है जैविक खाद

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उज्जैन महाकालेश्वर- चढ़ावे के फूलों से बनती है जैविक खाद
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उज्जैन महाकालेश्वर- चढ़ावे के फूलों से बनती है जैविक खाद

उज्जैन ही नहीं, भारत के प्रमुख देवस्थानों में श्री महाकालेश्वर का मन्दिर अपना विशेष स्थान रखता है। भगवान महाकाल काल के भी अधिष्ठाता देव रहे हैं। पुराणों के अनुसार वे भूतभावन मृत्युंजय हैं, सनातन देवाधिदेव हैं।

इतिहास:

उज्जैन का प्राचीन नाम उज्जयिनी है । उज्जयिनी भारत के मध्य में स्थित उसकी परम्परागत सांस्कृतिक राजधानी रही । यह चिरकाल तक भारत की राजनीतिक धुरी भी रही । इस नगरी कापौराणिक और धार्मिक महत्व सर्वज्ञात है। भगवान् श्रीकृष्ण की यह शिक्षास्थली रही, तो ज्योतिर्लिंग महाकाल इसकी गरिमा बढ़ाते हैं। आकाश में तारक लिंग है, पाताल में हाटकेश्वर लिंग है और पृथ्वी पर महाकालेश्वर ही मान्य शिवलिंग है। सांस्कृतिक राजधानी रही। यह चिरकाल तक भारत की राजनीतिक धुरी भी रही। इस नगरी कापौराणिक और धार्मिक महत्व सर्वज्ञात है। भगवान् श्रीकृष्ण की यह शिक्षास्थली रही, तो ज्योतिर्लिंग महाकाल इसकी गरिमा बढ़ाते हैं। आकाश में तारक लिंग है, पाताल में हाटकेश्वर लिंग है और पृथ्वी पर महाकालेश्वर ही मान्य शिवलिंग है।

बहुधा पुराणों में महाकाल की महिमा वर्णित है। भारत के बारह ज्योतिर्लिंगों में महाकाल की भी प्रतिष्ठा हैं । सौराष्ट्र में सोमनाथ, श्रीशैल पर मल्लिकार्जुन, उज्जैन मे महाकाल, डाकिनी में भीमशंकर, परली मे वैद्यनाथ, ओंकार में ममलेश्वर, सेतुबन्ध पर रामेश्वर, दारुकवन में नागेश, वाराणसी में विश्वनाथ, गोमती के तट पर ॥यम्बक, हिमालय पर केदार और शिवालय में घृष्णेश्वर। महाकाल में अंकितप्राचीन मुद्राएँ भी प्राप्तहोती हैं ।

मंदिर:

महान धार्मिक, पौराणिक, सांस्कृतिक, ऐतिहासिक तथा राजनैतिक नगरी उज्जयिनी जो विश्व के मानचित्र पर २३-११ उत्तर अक्षांश तथा ७५-४३ पूर्व रखांश पर उत्तरवाहिनी शिप्रा नदी के पूर्वी तट पर भूमध्यरेखा और कर्क रेखा के मिलन स्थल पर, हरिशचन्द्र की मोक्षभूमि, सप्तर्षियों की र्वाणस्थली, महर्षि सान्दीपनि की तपोभूमि, श्रीकृष्ण की शिक्षास्थली, भर्तृहरि की योगस्थली, सम्वत प्रवर्त्तक सम्राट विक्रम की साम्राज्य धानी, महाकवि कालिदास की प्रिय नगरी, विश्वप्रसिद्ध दैवज्ञ वराह मिहिर की जन्मभूमि, जो अवन्तिका अमरावती उज्जयिनी कुशस्थली, कनकश्रृंगा, विशाला, पद्मावती, उज्जयिनी आदि नामों से समय-समय पर प्रसिद्धि पाती रही, जिसका अनेक पुराणों और धार्मिक ग्रंथों में विषद वर्णन भरा पड़ा है, ऐसे पवित्रतम सप्तपुरियों में श्रेष्ठ पुण्यक्षेत्र में स्वयंभू महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग के रूप में मणिपुर चक्र नाभीस्थल सिद्धभूमि उज्जयिनी में विराजित हैं।

 

आज जो महाकालेश्वर का विश्व-प्रसिद्ध मन्दिर विद्यमान है, यह राणोजी शिन्दे शासन की देन है। यह तीन खण्डों में विभक्त है। निचले खण्ड में महाकालेश्वर बीच के खण्ड में ओंकारेश्वर तथा सर्वोच्च खण्ड में नागचन्द्रेश्वर के शिवलिंग प्रतिष्ठ हैं। नागचन्द्रेश्वर के दर्शन केवल नागपंचमी को ही होते हैं। मन्दिर के परिसर में जो विशाल कुण्ड है, वही पावन कोटि तीर्थ है। कोटि तीर्थ सर्वतोभद्र शैली में निर्मित है। इसके तीनों ओर लघु शैव मन्दिर निर्मित हैं। कुण्ड सोपानों से जुड़े मार्ग पर अनेक दर्शनीय परमारकालीन प्रतिमाएँ देखी जा सकती हैं जो उस समय निर्मित मन्दिर के कलात्मक वैभव का परिचय कराती है। कुण्ड के पूर्व में जो विशाल बरामदा है, वहाँ से महाकालेश्वर के गर्भगृह में प्रवेश किया जाता है। इसी बरामदे के उत्तरी छोर पर भगवान्‌ राम एवं देवी अवन्तिका की आकर्षक प्रतिमाएँ पूज्य हैं। मन्दिर परिसर में दक्षिण की ओर अनेक छोटे-मोटे शिव मन्दिर हैं जो शिन्दे काल की देन हैं। इन मन्दिरों में वृद्ध महाकालेश्वर अनादिकल्पेश्वर एवं सप्तर्षि मन्दिर प्रमुखता रखते हैं। ये मन्दिर भी बड़े भव्य एवं आकर्षक हैं। महाकालेश्वर का लिंग पर्याप्त विशाल है। कलात्मक एवं नागवेष्टित रजत जलाधारी एवं गर्भगृह की छत का यंत्रयुक्त तांत्रिक रजत आवरण अत्यंत आकर्षक है। गर्भगृह में ज्योतिर्लिंग के अतिरिक्त गणेश, कार्तिकेय एवं पार्वती की आकर्षक प्रतिमाएँ प्रतिष्ठ हैं। दीवारों पर चारों ओर शिव की मनोहारी स्तुतियाँ अंकित हैं। नंदादीप सदैव प्रज्ज्वलित रहता है। दर्शनार्थी जिस मार्ग से लौटते हैं, उसके सुरम्य विशाल कक्ष में एक धातु-पत्र वेष्टित पाषाण नंदी अतीव आकर्षक एवं भगवान्‌ के लिंग के सम्मुख प्रणम्य मुद्रा में विराजमान है। महाकाल मन्दिर का विशाल प्रांगण मन्दिर परिसर की विशालता एवं शोभा में पर्याप्त वृद्धि करता है।भगवान्‌ महाकालेश्वर मन्दिर के सबसे नीचे के भाग में प्रतिष्ठ है। मध्य का भाग में ओंकारेश्वर का शिवलिंग है। उसके सम्मुख स्तंभयुक्त बरामदे में से होकर गर्भगृह में प्रवेश किया जाता हैं। सबसे ऊपर के भाग पर बरामदे से ठीक ऊपर एक खुला प्रक्षेपण है जो मन्दिर की शोभा में आशातीत वृद्धि करता हैं। महाकाल का यह मन्दिर, भूमिज चालुक्य एवं मराठा शैलियों का अद्भुत समन्वय है। ऊरुश्रृंग युक्त शिखर अत्यंत भव्य है। विगत दिनों इसका ऊर्ध्व भाग स्वर्ण-पत्र मण्डित कर दिया गया है।ज्योतिर्लिंग महाकालेश्वर दक्षिणामूर्ति हैं। तंत्र की दृष्टि से उनका विशिष्ट महत्त्व है। प्रतिवर्ष लाखों तीर्थ यात्री उनके दर्शन कर स्वयं को कृतकृत्य मानते हैं।

 

श्री महाकालेश्वर मंदिर में भस्मार्ती हेतु नियम     

  1. अनुमति हेतु आवेदन भस्मार्ती के एक दिन पूर्व करना आवश्यक होगा।

 

  1. अनुमति हेतु आवेदन स्थान की उपलब्धता के आधार पर दिये जावेगे।

 

  1. भस्मार्ती के लिए अवेदन प्रस्तुत करने का समय दोप. 12:30 बजे तक रहेगा, इसके पश्चात आने वाले आवेदन स्वीकार नहीं होंगे।

 

  1. सूची प्रकाषन रात्रि 7:00 बजे किया जावेगा एवं भस्मार्ती अनुमति पत्र वितरण रात्रि 7:30 बजे से रात्रि 10:30 बजे तक किया जावेगा।

 

  1. आवेदन प्रस्तुत करने के समय अनुसार वरियता दी जावेगी।

 

  1. भस्मार्ती में प्रवेष पाने वाले प्रत्येक श्रद्धालुओं को फोटो युक्त (पता सहित) परिचय पत्र प्रस्तुत करने पर ही अनुमति दी जावेगी पेन कार्ड अमान्‍य है

 

  1. भस्मार्ती के दौरान प्रसाद, दूध दर्षनार्थियों द्वारा नहीं चढाया जाता है, केवल जल ही चढाया जावेगा।

 

  1. भस्मार्ती आरती के दौरान कोई भी व्यक्ति गर्भगृह व गलियारे में खडा नहीं रहेगा।

 

  1. भस्मार्ती के पश्चात एवं गर्भगृह प्रवेष बंद की स्थिति में कोई भी व्यक्ति, यजमान, पंचामृत नही करेगा।

 

  1. भगवान महाकाल की प्रथम घण्टी बजने के पश्चात ही दर्षनार्थी गर्भगृह में प्रवेष करेंगे।

 

  1. अनुमति प्राप्त दर्षनार्थी जलाभिषेक कर तुरंत बाहर आयेंगे।

 

  1. जलाभिषेक के समय महिलाएं साडी एवं पुरूष सोला, धोती पहनकर आवें।

 

  1. भस्मार्ती के दौरान जलाभिषेक का समय सभी दर्षनार्थियों के लिए कुल 5 मिनिट है, जिसका सभी दर्षनार्थी ध्यान रखें।

 

  1. जिन दर्षनार्थियों को जल चढाने की अनुमति है वे ही गर्भगृह में जायेंगे।

 

  1. उक्त निर्देषों का पालन नहीं करने पर दर्षनार्थियों की अनुमति स्वतः समाप्त हो जावेंगी।

 

  1. भगवान श्री महाकालेष्वर को प्लास्टिक की थैली द्वारा जल या दूध न चढावें।

 

  1. भस्मार्ती व्यवस्थओं में समय-समय पर परिवर्तन हो सकता है।

त्यौहार

वार्षिक पर्वो में प्रमुख पर्वो पर भगवान के विशेष पूजन, उत्सव व श्रृंगार होते है। श्रावण के प्रत्येक सोमवार को भगवान के विभिन्न स्वरूपों की सवारी (चल समारोह) निकाली जाती है। मराठा (सिंधिया) राज्य के समय श्रावण शुक्ल से भाद्रपद कृष्ण तक प्रत्येक सोमवार को एक-एक झांकी बढ़ाते हुए सवारी निकाली जाती थी, अब लगभगसन् 1967 (सं. 2024 वि.) से श्रावण कृष्ण से लेकर भाद्रपद कृष्ण तक सभी सोमवार को पालकी,गरुड, नंदी, रथ एवं हाथी एकोत्तार बढ़ाते हुए भगवान के विभिन्न स्वरुपसुसज्जित झांकियों के साथ सवारी निकालने की परंपरा है। भाद्रपद कृष्ण के अंतिम सोमवार को सवारी का भव्य स्वरूप और भक्तों-दर्शकों की भीड़ नगर में समाती ही नहीं है।

 

नागपंचमी श्रावण शुक्ल पंचमी को शिखर के तीसरे तल पर नाग के आसन पर स्थित शिव-पार्वती की सुन्दर प्रतिमा के दर्शन लाखों धर्मप्राण जनता वर्ष में एक ही बार करती है। पूरे श्रावण मास में धर्म-प्राण जनता जल, दूध, दही, घृत् शकर, शहद, चन्दन अक्षत से पूजन करती है और संकल्पानुसार संख्या में बिलपत्र चढ़ाती है।आश्विन कृष्ण पक्ष में उमा सांझी महोत्सव और शुक्ल पक्ष में विजयादशमी पर महाकालेश्वर की राजसी सवारी नगर और सीमा के बाहर दशहरा मैदान जाती है, वहाँ शमी वृक्ष की शाखा (डाली) की पूजन, सीमा पूजा, अपराजिता देवी की पूजन विधि विधान से सम्पन्न होती है। कार्तिकमास में (कार्तिक शुक्ल पक्ष से मार्गशीर्ष कृष्णपक्ष मे) प्रत्येक सोमवार को महाकालेश्वर की सवारी (पालकी में महाकालेश्वर की प्रतिमा) मंदिर से शिप्रा नदी जाती है, वहॉ शिप्रा पूजन के पश्चात ढ़ाबा रोड़, गोपाल मंदिर होकर पुन: मंदिर पर आती है। श्रावण की सवारी में भी सवारी का मार्ग यही होता है।

 

अन्नकूट महोत्सव

कार्तिक कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी (अनर्क 14 रूप 14) को भगवान का अन्नकूट महोत्सव परंपरा से भस्मार्ती के नेमनूक द्वारा आयोजित होता है। भक्तो के सहयोग से पुजारीवर्ग द्वारा भी अन्नकूट होने लगा है शासकीय अन्नकूट दिन में 10 बजे से होता है।

 

हरिहर-मिलन

कार्तिक शुक्ल चतुर्दशी (वैकुण्ठ चतुर्दशी) की रात्रि में शंकर और विष्णु का मिलन हरिहर मिलाप के रूप में होता है। मध्य रात्रि में महाकालेश्वर की सवारी गोपाल मंदिर जाती है। वहॉ मंदिर संस्थान की ओर से भगवान महाकालेश्वर का पूजन विष्णु को प्रिय तुलसीदल से किया जाता है, बाद ऊपर रात्रि में 4 बजे गोपालजी की सवारी गोपाल मंदिर से महाकाल मंदिर पर आती है और यहाँ भस्मार्ती के समय भगवान चतुर्भज को फलों का भोग और शिवप्रिय बिल्वपत्र अर्पित किये जाते है, इस दिन भगवान को विभिन्न ऋतु फलों का भोग लगाया जाता है। सम्वत 2004 वि. (सन् 47) के पश्चात् से गोपालजी की सवारी नहीं आती है, उस परम्परा का निर्वाह स्थानीय बड़े गणेश से भक्त लोग चतुर्भज भगवान की सवारी ले जाकर पर्व परंपरा का निर्वाह करते हैं।

शिवरात्रि महोत्सव

फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष में शिवरात्रि के पूर्व 9 दिन से नवरात्रि में भगवान का नित्य श्रृंगार लघुरूद्राभिषेक, हरिकीर्तन कथा आदि का आयोजन होता हैं। शिवरात्रि को लाखों भक्तगण भगवान के दर्शन करते है। रात्रि में महापूजन, महान्यास आवरण, धान्य पूजन आदि परंपरागत धार्मिक विधि सम्पन्न होती है। महर्षि सांदीपनि द्वारा भगवान को श्रीकृष्ण को दिये महाकालेश्वर के सहस्त्र नामावली से बिल्वपत्र अर्पण किये जाते है। ग्वालियर, होल्कर, देवास आदि भूतपूर्व राज्य की परम्परागत नेमनूक से पूजन व्यवस्था चल रही है। रात्रि पूजन के पश्चात पुष्पों से भगवान का सेहरा श्रृंगार किया जाता है, जिसके प्रात: काल से मध्यान्ह तक दर्शन होते है।

 

होली उत्सव

होली पूजन में गुलाल, हार-फूल, फल-प्रसाद विशेष विजया (भांगे) से अभिषेक भोग और भांग प्रसाद (ठंडार्इे) का वितरण होता है।

 

चढ़ावे के फूलों से बनी जैविक खाद:

उज्‍जैन 19 मई। भूतभावन महाकाल मंदिर देश के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक स्‍वयंभू एवं दक्षिणमुखी ज्योतिर्लिंग के रूप में पूरे विश्व में प्रसिद्ध हैं। लाखों श्रद्धालु प्रतिदिन महाकाल के दर्शन करने आते हैं। लेकिन यह बहुत कम लोगों को मालूम होगा कि महाकाल मंदिर में चढ़ाए जाने वाले फूलों एवं पत्तियों से मंदिर परिसर में ही जैविक खाद तैयार की जाती है। यह जैविक खाद 150 रूपये किलो एवं 1500 क्विंटल की दर पर पैकिंग करके इंदौर भेजी जाती है। इस जैविक खाद का फसलों में उपयोग करने से जहाँ जमीन की उर्वरक शक्ति बढ़ती है, वहीं रासायनिक खाद की अपेक्षा पोषण तत्‍वों से भरपूर खाद का उत्‍पादन भी होता है।

बाबा महाकाल को चढ़ाये जाने वाले फूलों एवं पत्तियों के सदुपयोग के लिए इसी शिवरात्रि से जैविक खाद बनाने के लिए 18 लाख रुपये की लागत से एक कंपोजटिंग मशीन की स्थापना की गई। यहां प्रतिदिन लगभग 600 किलो फूल एवं पत्तियां चढ़ाई जाती हैं। इन फूलों और पत्तियों को मिलाकर रखने पर 10 दिन में जैविक खाद बन जाती है। खाद की आकर्षक तरीके से पैकिंग करके इसे इंदौर के बाजारों में विक्रय के लिए भेज दिया जाता है। इस जैविक खाद की डिमाण्ड दिनों-दिन बढ़ रही है

 

पूजा के प्रकार

निर्धारित शुल्क

1

सामान्य पूजा

51.00

2

शिव महिम्न पाठ

101.00

3

शिव महिम्न स्त्रोत/११ पाठ/वैदिक पूजा/१ ब्राम्हणं द्वारा

151.00

4

रूद्रपाठ एक आवर्तन/एक ब्राम्हण द्वारा

251.00

5

रूद्र पाठ ११ आवर्तन/एक ब्राम्हण द्वारा

501.00

6

लघुरूद्राभिषेक

1500.00

7

महारूद्राभिषेक /११ ब्राम्हण द्वारा

11000.00

8

महामृत्युंजय

15000.00

9

भांगश्रंगार

101.00

 

 

विशेष – पूजन/अभिषेक कराने के लिये कृपया ईमेल करे

: admin@mahakaleshwar.nic.in

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By sonali rathi August 1, 2017 10 min read
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