
पवित्र कुरान इस्लाम धर्म की नींव है। इस्लाम की मान्यताओं के अनुसार क़ुरान ( हिंदी में पूरी कुरान ) का अल्लाह के दूत जिब्रील द्वारा मुहम्मद साहब को सन् ६१० से सन् ६३२ में उनकी मृत्यु तक खुलासा किया गया था। क़ुरान मे कुल कल्मात (शब्द) की तादाद 86423 है। कुरान मे कुल हुरुफ (अक्षर) की तादाद 323760 है। कुरान मे 114 सुरह है। क़ुरान मे 540 रुकू है। कुरान मे 14 सज्दे है। कुरान मे कुल आयात की तादाद 6666 है। कुरान मे बिस्मिल्लाह हिर्रह्मानेर्र्हीम 114 बार आया है।
पढ़े हिंदी में पूरी कुरान
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कुरान की मान्यताएँ
इस आरंभिक विचार के बाद यह समझ लें कि क़ुरान के अनुसार इस धरती पर मनुष्य की क्या स्थिति है?
अल्लाह ने इस धरती पर मनुष्य को अपना प्रतिहारी (ख़लीफ़ा) बनाकर भेजा है। भेजने से पूर्व उसने हर व्यक्ति को ठीक-ठीक समझा दिया था कि वे थोड़े समय के लिए धरती पर जा रहे हैं, उसके बाद उन्हें उसके पास लौट कर आना है। जहाँ उसे अपने उन कार्यों का अच्छा या बुरा बदला मिलेगा जो उसने धरती पर किए। इस लिए कुरान में सकारात्मक कार्य करने को कहा गया है , जैसे जीव हत्या, अनावश्यक हरे पेड़ों की कटाई ,किसी को व्यर्थ आघात पहुँचाना, व्यर्थ जल बहाना, आदि कुरान के अनुसार पाप हैं ।
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इस धरती पर मनुष्य को कार्य करने की स्वतंत्रता है। धरती के साधनों को उपयोग करने की छूट है। अच्छे और बुरे कार्य को करने पर उसे तक्ताल कोई दण्ड या पुरस्कार नहीं है। किन्तु इस स्वतंत्रता के साथ ईश्वर ने धरती पर बसे मनुष्यों को ठीक उस रूप में जीवन गुज़ारने के लिए ईश्वरीय आदेशों के पहुंचाने का प्रबंध किया और धरती के हर भाग में उसने अपने दूत (पैग़म्बर) भेजे, जिन्होंने मनुष्यों तक ईश्वर का संदेश भेजा। कहा जाता है कि ऐसे ईशदूतों की संख्या १,८४,००० के लगभग रही।
हज़ारों वर्षों तक निरंतर आने वाले पैग़म्बरों का चाहे वे धरती के किसी भी भाग में अवतरित हुए हों, उनका संदेश एक था, उनका लक्ष्य एक था, ईश्वरीय आदेश के अनुसार मनुष्यों को जीना सिखाना। हज़ारों वर्षों का समय बीतने के कारण ईश्वरीय आदेशों में मनुष्य अपने विचार, अपनी सुविधा जोड़ कर नया धर्म बना लेते और मूल धर्म को विकृत कर एक आडम्बर खड़ा कर देते और कई बार तो ईश्वरीय आदेशों के विपरित कार्य करते। क्यों कि हर प्रभावी व्यक्ति अपनी शक्ति के आगे सब को नतमस्तक देखना चाहता था।
आख़िर अंतिम नबी हज़रत मुहम्मद (सल्ल.) क़ुरआन के साथ इस धरती पर आए और क़ुरआन ईश्वर की इस चुनौती के साथ आई कि इसकी रक्षा स्वयं ईश्वर करेगा। १५०० वर्षों का लम्बा समय यह बताता है कि क़ुरान विरोधियों के सारे प्रयासों के बाद भी क़ुरान के एक शब्द में भी परिवर्तन संभव नहीं हो सका है। यह पुस्तक अपने मूल स्वरूप में प्रलय तक रहेगी। इसके साथ क़ुरान की यह चुनौती भी अपने स्थान पर अभी तक बैइ हुई है कि जो इसे ईश्वरीय ग्रंथ नहीं मानते हों तो वे इस जैसी पूरी पुस्तक नहीं बल्कि उसका एक छोटा भाग ही बना कर दिखा दें।
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क़ुरान के इस रूप को जानने के बाद यह जान लिया जाना चाहिए कि यह पुस्तक रूप में हज़रत मुहम्मद (सल्ल.) को नहीं दी गई कि इसे पढ़कर लोगों को सुना दें और छाप कर हर घर में रख दें। बल्कि समय-समय पर २३ वर्षों तक आवश्यकता अनुसार यह पुस्तक अवतरित हुई और हज़रत मुहम्मद (सल्ल.) ने ईश्वर की इच्छा से उसके आदेशों के अनुसार धरती पर वह समाज बनाया जैसा ईश्वर का आदेश था।
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पश्चिमी विचारक ऍच॰ जी॰ वेल्स के अनुसार इस धरती पर प्रवचन तो बहुत दिए गए किन्तु उन प्रवचनों के आधार पर एक समाज की रचना पहली बार हज़रत मुहम्मद (सल्ल.) ने करके दिखाई। कुरान के अनुसार किसी अन्य धर्म का अपमान नहीं करना चाहिए बल्कि उस धर्म कि सकारात्मक बात को गृहण कर लेना चाहिए।
हिंदी में पूरी कुरान
वैज्ञानिक तथ्य जो अब तक हमें ज्ञात हैं, क़ुरान में छुपे हैं और ऐसे सैकड़ों स्थान है जहां लगता है कि मनुष्य ज्ञान अभी उस सच्चाई तक नहीं पहुंचा है। बार-बार क़ुरान आपको विचार करने की दावत देता है। धरती और आकाश के रहस्यों को जानने का आमंत्रण देता हैं।
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एक उलझन और सामने आती है। क़ुरान के दावे के अनुसार वह पूरी धरती के मनुष्यों के लिए और शेष समय के लिए है, किन्तु उसके संबोधित उस समय के अरब दिखाई देते हैं। सरसरी तौर पर यही लगता है कि क़ुरान उस समय के अरबों के लिए ही अवतरित किया गया था किन्तु आप जब भी किसी ऐसे स्थान पर पहुंचें जब यह लगे कि यह बात केवल एक विशेष काल तथा देश के लिए है, तब वहां रूक कर विचार करें या इसे नोट करके बाद में इस पर विचार करें तो आप को हर बार लगेगा कि मनुष्य हर युग और हर भू भाग का एक है और उस पर वह बात ठीक वैसी ही लागू होती है, जैसी उस समय के अरबों पर लागू होती थी।
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विश्वास इस्लाम का आधार बनता है
साभार – विकीपीडिया
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