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जन्मदिन विशेष : आचार्य बालकृष्ण – दास्तान एक संन्यासी की

जन्मदिन विशेष : आचार्य बालकृष्ण – दास्तान एक संन्यासी की

जन्मदिन विशेष : आचार्य बालकृष्ण – दास्तान एक संन्यासी की
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जन्मदिन विशेष : आचार्य बालकृष्ण – दास्तान एक संन्यासी की

आचार्य बालकृष्ण – दास्तान एक संन्यासी की

संन्यासी से कर्मयोगी तक का सफ़र

पैरों में मामूली चप्पल और तन पर सफेद लिबास। आचार्य बालकृष्ण की बस यही पहचान नहीं है. वो एक ऐसे कर्मयोगी के तौर पर जाने जाते हैं जिन्होंने आयुर्वेद की ताकत को प्राचीन किताबों से निकालकर आम लोगों के लिए सेहत का रामबाण बना दिया है. गुरुकुल के आश्रमों से लेकर जंगलों और पहाड़ों तक आयुर्वेद का जो ज्ञान बालकृष्ण ने हासिल किया. वो महज किताबों तक सीमित नहीं रहा बल्कि उत्पाद की शक्ल लेकर बाजार में भी उतरा, और देखते ही देखते लोगों के जहन पर छा गया. लेकिन इस चमकती कामयाबी के साथ कहीं पीछे छूट गई, एक सन्यासी की जिंदगी और चमकने लगा एक कर्मयोगी का चमत्कार.

आचार्य बालकृष्ण का जन्म

शून्य से शिखर के सफर की ये दास्तान 46 साल पहले उत्तराखंड से शुरु होती है. हरिद्वार में 4 अगस्त 1972 को बालकृष्ण का जन्म एक नेपाली परिवार में हुआ था. जब बालकृष्ण तीन महीने के थे तब उनका परिवार उन्हें लेकर अपने वतन नेपाल वापस लौट आया था. नेपाल की राजधानी काठमांडू से करीब दो सौ किलोमीटर दूर इन्ही पहाड़ों के बीच भरुआ गांव मौजूद है. नेपाल के इसी भरुआ गांव में बालकृष्ण का बचपन गुजरा है. हालांकि बालकृष्ण के जन्म के बाद भी उनके पिता जय वल्लभ भारत में रोजागार की तलाश में भटकते रहे. शहर दर शहर उन्होंने क्लर्क से लेकर चौकीदार और चौकीदार से लेकर चपरासी तक छोटी-मोटी नौकरियां की. और फिर नेपाल के अपने पुश्तैनी गांव में ही आकर बस गए. आज भी बालकृष्ण के माता–पिता अपने गांव में ही साधारण जीवन गुजार रहे है.

संघर्ष में गुज़रा बचपन

बालकृष्ण का बचपन बेहद अभाव में गुजरा है. नेपाल के संजिया जिले में मौजूद यही वो प्राथमिक स्कूल है जहां से उन्होंने पांचवी कक्षा तक पढ़ाई की है. तब बालक़ृष्ण का बालक मन स्कूल की पढ़ाई में कम और हिंदू शास्त्रों में ज्यादा रमता था. यूं तो उन्हें घूमने–फिरने का शौक था लेकिन साथ ही उनका ध्यान सांसारिक बातों से हटता जा रहा था. बालकृष्ण का पूरा बचपन नेपाल में ही गुजरा है. लेकिन जब वो नौ साल के थे तब उनके पिता ने अपने एक रिश्तेदार के पास उन्हें वापस भारत भेज दिया था.

आर्ष गुरुकुल में हुयी स्वामी रामदेव से मुलाकात

नौ साल के बालकृष्ण पहले अपने पिता के साथ नेपाल से मुंबई आए और फिर मुंबई से अपने एक रिश्तेदार के यहां हरियाणा चले आए थे. हरियाणा के महेंद्रगढ़ जिले में खानपुर का यही वो आर्ष गुरुकुल है जहां आगे पढ़ाई के लिए बालकृष्ण का दाखिला करा दिया गया था. खुद बालकृष्ण बताते हैं कि प्राचीन ऋषि मुनियों के ज्ञान को हासिल करने की चाहत उन्हें गुरुकुल के दरवाजे तक खींच लाई थी. 90 के दशक का ये वो दौर था. जब खानपुर के इसी आश्रम में पहली बार बालकृष्ण की मुलाकात उस शख्स से हुई थी जिसे दुनिया बाबा रामदेव के नाम से जानती है.

तन पर सफेद कपडे, जमीन का बिछौना और गुरु के हर आदेश का मुस्तैदी से पालन करना, यही गुरुकुल की रीत होती है. गुरुकुल की इस परंपरा को बालक बालकृष्ण ने भी बखूबी निभाया. लेकिन आश्रम में पढ़ाई के दौरान उनका रुझान जहां आयुर्वेद की तरफ बढता चला गया वहीं बाबा रामदेव का योग में.

अक्टूबर 1992 में गुरुकुल की शिक्षा समाप्त हो गई. और यही से रामदेव और बालकृष्ण की राहें भी जुदा हो गई थी. बाबा रामदेव ने संन्यास के रास्ते पर कदम आगे बढ़ा दिए थे वहीं बालकृष्ण ने आय़ुर्वेद की राह पकड़ ली थी. बालकृष्ण, आश्रम से निकलकर आगे की पढ़ाई करने बनारस चले आए. वक्त धीरे–धीरे गुजरता रहा. बाबा रामदेव ने हरियाणा के किशनगंज में ही प्राचार्य का पद संभाल लिया. वो घासड़ा गुरुकुल में बच्चों को पढ़ाने लगे. उधर बालकृष्ण ने जड़ी–बूटियों की तलाश में हिमालय को अपना कर्मक्षेत्र बना लिया. लेकिन इस बीच दोनों के बीच खतों का सिलसिला भी चलता रहा.

योग और आध्यात्म का सफ़र

हिमालय की गुफाओं में योग और आध्यात्म का नया सिलसिला शुरु हो चुका था. हड्डियों को थर्रा देने वाली ठंड और बर्फीले पहाडों के बीच जिंदगी कितनी दुश्वार होती है इस बात अहसास ही रोंगेटे खडा करने के लिए काफी है. लेकिन सुनसान औऱ अंधेरी गुफाओं को रामदेव और बालकृष्ण ने अपना नया ठिकाना बना लिया था. हिमालय की कंदराओं में सत्य की खोज करते हुए अभी कुछ ही वक्त गुजरा था, तभी एक बार फिर जिंदगी ने ऐसी करवट ली कि इन संन्यासियों को पहाडों की शरण छोड़कर मैदान में उतरना पडा. लेकिन गंगा की तरह ही हिमालय से उतर कर जब बाबा रामदेव और बालकृष्ण ने भी हरिद्वार पर दस्तक दी तो उनके सामने ढेरों चुनौतियां खड़ी हो गई.

हरिद्वार के कनखल इलाके में बना शंकर देव महाराज का आश्रम हिमालय से लौटने के बाद बालकृष्ण और रामदेव का ठिकाना बना था. इसी आश्रम में बाबा रामदेव और बालकृष्ण ने साल 1995 में दिव्य योग मंदिर ट्र्स्ट बनाया था. आयुर्वेदिक दवाएं बनाने के लिए कनखल के आश्रम में ही दिव्य फॉर्मेसी की शुरुआत भी की गई थी लेकिन ये शुरुआत आसान नहीं थी. 1995 में जब रामदेव और बालकृष्ण ने दिव्य फॉर्मेसी की शुरुआत की थी उस वक्त हरिद्वार में ही आयुर्वेदिक दवाएं बनाने वाली 30 से ज्यादा फॉर्मेसी मौजूद थी. कनखल के आश्रम में दिव्य फ़ॉर्मेसी का वो खस्ताहाल कमरा आज भी मौजूद है इसी कमरे में बैठकर बाबा रामदेव और बालकृष्ण मरीजों का इलाज किया करते थे. इसी आश्रम में दिव्य फॉर्मेसी की एक लैब भी बनाई गई थी जहां रामदेव और बालकृष्ण आयुर्वेदिक दवाएं बनाते थे. ये लैब आज भी काम कर रही है और इसी लैब से हजारों करोड़ रुपये के पतंजलि ग्रुप की जड़ें जुड़ी है.

दुनिया में जितना शोर रामदेव के योग को लेकर मचा उससे कहीं ज्यादा विवाद उनकी आयुर्वेदिक दवाओं को लेकर खड़ा हुआ है. 21 साल पहले इसी दिव्य योग मंदिर ट्रस्ट के साथ बालकृष्ण और रामदेव की दवाईयों की कहानी शुरु हुई थी. दवा का कारोबार और योग का चमत्कार. इन दो अचूक हथियारों से लैस होकर जब रामदेव और बालकृष्ण की जोड़ी कारोबार के मैदान में उतरी तो उनकी शोहरत का ग्राफ तेजी से ऊपर चढ़ा. देश में दूर- दराज इलाकों तक रामदेव का नाम एक ब्रैंड की शक्ल अख्तियार करने लगा. बाबा रामदेव ने पहले योग को अपना ब्रैंड बनाया. फिर अपनी आयुर्वेदिक दवाइयों को. और फिर वो खुद ही एक ब्रैंड बाबा में तब्दील हो गए. साल 2002 में जब रामदेव ने टीवी के परदे पर कदम रखा तो देश और दुनिया में एक नया बाबा ब्रैंड बना. लेकिन बाबा रामदेव की ये चमत्कारी कामयाबी, बालकृष्ण की अटूट मेहनत, निष्ठा और लगन के बगैर अधूरी है.

साढे तीन हजार रुपये से पच्चीस हजार करोड़ रुपये का सफर तय करने वाले रामदेव के सहयोगी बालकृष्ण की तेज रफ्तार कामयाबी आज एक मिसाल बन चुकी हैं. साल 2006 में शुरु हुए पतंजलि ग्रुप का सालाना कारोबार 5 हजार करोड़ रुपये तक जा पहुंचा है. जहां रामदेव पतंजलि का चेहरा हैं वहीं बालकृष्ण पंतजलि ग्रुप के टॉप बॉस हैं. वो कंपनी के सीईओ यानी मुख्य कार्यकारी अधिकारी हैं.  इसीलिए फोर्ब्स पत्रिका ने पतंजलि ग्रुप के प्रमुख की हैसियत से बालकृष्ण को सौ सबसे रईस भारतियों की सूची में शामिल किया है. लेकिन आचार्य बालकृष्ण के मुताबिक ना तो वो कंपनी से एक रुपये का वेतन लेते हैं और ना ही एक दिन की छुट्टी. बस बिना रुके, बिना थके वो दिन – रात काम करते हैं.

बीस साल में बहुत कुछ रचने वाले आचार्य बालकृष्ण की जिंदगी जरा भी बदली नहीं है. उनती सादगी और लोगों से सीधे जुड़े रहने की कला ही उनकी सफलता की पहली वजह है।

आचार्य बालकृष्ण की जिदंगी हर उस शख्स के लिए आज एक मिसाल बन चुकी हैं जो जिंदगी में कुछ कर गुजरना चाहता है लेकिन बालकृष्ण की जिंदगी से जुड़ा एक सच अभी और बाकी है और वो सच है हवन. दरअसल सुबह काम पर निकलने से पहले वो आश्रम में हवन करना कभी नहीं भूलते है. बालकृष्ण का कहना है कि आयुर्वेद की तरह हवन की ये रीत भी उन्हें अपनें पुरखों से विरासत में मिली है.

आचार्य बालकृष्ण की कहानी, एक जर्रे के आसमान बनने की दास्तान है. एक संन्यासी भी कैसे अरबों का आर्थिक साम्राज्य खड़ा कर सकता है. बालकृष्ण, इसकी जीती-जागती मिसाल हैं. आयुर्वेद को लोगों की सेहत का रामबाण बनाने वाले, बालकृष्ण की जिंदगी, सबके सामने है इसीलिए एक अहम सवाल ये भी है कि क्या इतिहास उन्हें, आयुर्वेद के ऋषियों धन्वंतरि, चरक और पतंजलि की तरह ही याद रखेगा.

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By Shweta August 4, 2017 8 min read
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