पितरों का श्रद्धापूर्वक तर्पण ही है श्राद्ध
इस वर्ष पितृपक्ष 6 सितंबर से 20 सितंबर 2017 तक आरम्भ होने जा रहे हैं. श्राद्ध, पूजा, महत्व, श्राद्ध की महिमा एवं विधि का वर्णन विष्णु, वायु, वराह, मत्स्य आदि पुराणों एवं महाभारत, मनुस्मृति आदि शास्त्रों में यथास्थान किया गया है. श्राद्ध का अर्थ अपने देवों, परिवार, वंश परंपरा, संस्कृति और इष्ट के प्रति श्रद्धा रखना है. श्राद्धों के वक्त आपके पूर्वज किसी भी तरह घर आ सकते हैं तो किसी भी आने वाले को घर से बाहर न भगाएं. उज्जैन के ज्योतिषाचार्य पं. दयानन्द शास्त्री ने बताया की पितृ पक्ष में पशु पक्षियों को पानी और दाना दे. पितृ पक्ष के दौरान मांस-मदिरा का प्रयोग नहीं करना चाहिए. तर्पण में काले तिल और जो तथा दूध का का प्रयोग करें. पितृ पक्ष में ब्राह्मणों को भोजन करवाएं. इस अवधि में भूलकर भी कुत्ते, बिल्ली, और गाय को भगाना या हानि नहीं पहुंचानी चाहिए.
आखिर श्राद्ध है क्या

व्यक्ति का अपने पितरों के प्रति श्रद्धा के साथ अर्पित किया गया तर्पण अर्थात जलदान पिंडदान पिंड के रूप में पितरों को समर्पित किया गया भोजन यही श्राद्ध कहलाता है. धर्म शास्त्रों की ऐसी मान्यता है सूर्य के कन्या राशि में आने पर परलोक से पितर अपने स्वजनों यानी पुत्र, पौत्रों के साथ रहने आ जाते हैं इसलिए इसे कनागत भी कहा जाता है. देवताओं से तुलना करने पर व्यक्ति के तीन पीढ़ी के पूर्वज गिने जाते हैं .इसमें पिता को वसु के समान, रुद्र दादा के समान तथा आदित्य को परदादा के समान माना गया गया है. श्राद्ध के समय सभी पूर्वजों के प्रतिनिधि माने जाते हैं. श्राद्ध तीन पीढ़ियों तक करने का विधान बताया गया है.
कहां से शुरू हुयी श्राद्ध की परंपरा
महाभारत के अनुशासन पर्व में उल्लेख मिलता है कि सर्वप्रथम श्राद्ध का उपदेश महर्षि निमि को महातपस्वी अत्रि मुनि ने दिया था. इस तरह सबसे पहले महर्षि निमि ने श्राद्ध का आरंभ किया.
समय के साथ इसे अन्य ऋषि-मुनियों ने अपनाया और धीरे-धीरे यह चार वर्णों यानी ब्राह्मण, क्षत्रिए, वैश्य और शूद्र लोग भी श्राद्ध परंपरा का निर्वाहन करने लगे.
उज्जैन के ज्योतिषाचार्य पं. दयानन्द शास्त्री ने बताया की हिंदू शास्त्रों में कहा गया है कि जो स्वजन अपने शरीर को छोड़कर चले गए हैं चाहे वे किसी भी रूप में अथवा किसी भी लोक में हों, उनकी तृप्ति और उन्नति के लिए श्रद्धा के साथ जो शुभ संकल्प और तर्पण किया जाता है, वह श्राद्ध है. माना जाता है कि सावन की पूर्णिमा से ही पितर मृत्यु लोक में आ जाते हैं और नवांकुरित कुशा की नोकों पर विराजमान हो जाते हैं. ऐसी मान्यता है कि पितृ पक्ष में हम जो भी पितरों के नाम का निकालते हैं, उसे वे सूक्ष्म रूप में आकर ग्रहण करते हैं. केवल तीन पीढ़ियों का श्राद्ध और पिंड दान करने का ही विधान है. पुराणों के अनुसार मुताबिक मृत्यु के देवता यमराज श्राद्ध पक्ष में जीव को मुक्त कर देते हैं, ताकि वे स्वजनों के यहां जाकर तर्पण ग्रहण कर सकें. श्राद्ध पक्ष में मांसाहार पूरी तरह वर्जित माना गया है. श्राद्ध पक्ष का माहात्म्य उत्तर व उत्तर-पूर्व भारत में ज्यादा है. तमिलनाडु में आदि अमावसाई, केरल में करिकडा वावुबली और महाराष्ट्र में इसे पितृ पंधरवडा नाम से जानते हैं. श्रद्धा से कराया गया भोजन और पवित्रता से जल का तर्पण ही श्राद्ध का आधार है.
क्या है श्राद्ध की विधि
ज्यादातर लोग अपने घरों में ही तर्पण करते हैं. श्राद्ध का अनुष्ठान करते समय दिवंगत प्राणी का नाम और उसके गोत्र का उच्चारण किया जाता है. हाथों में कुश की पैंती (उंगली में पहनने के लिए कुश का अंगूठी जैसा आकार बनाना) डालकर काले तिल से मिले हुए जल से पितरों को तर्पण किया जाता है. मान्यता है कि एक तिल का दान बत्तीस सेर स्वर्ण तिलों के बराबर है. परिवार का उत्तराधिकारी या ज्येष्ठ पुत्र ही श्राद्ध करता है. जिसके घर में कोई पुरुष न हो, वहां स्त्रियां ही इस रिवाज को निभाती हैं. परिवार का अंतिम पुरुष सदस्य अपना श्राद्ध जीते जी करने के लिए स्वतंत्र माना गया है. संन्यासी वर्ग अपना श्राद्ध अपने जीवन में कर ही लेते हैं. श्राद्ध पक्ष में शुभ कार्य वर्जित माने गए हैं. यात्रा में जा रहे व्यक्ति, रोगी या निर्धन व्यक्ति को कच्चे अन्न से श्राद्ध करने की छूट दी गई है. कुछ लोग कौओं, कुत्तों और गायों के लिए भी अंश निकालते हैं. कहते हैं कि ये सभी जीव यम के काफी नजदीकी हैं और गाय वैतरणी पार कराने में सहायक है.
क्या हैं तीन ऋण
हिंदू धर्म ग्रंथों में मनुष्य के ऊपर तीन तरह के ऋण बताए गए हैं. देव, ऋषि तथा पितृ ऋण और इन सभी में पितृ ऋण के निवारण के लिए 15 दिनों के पितृ पक्ष में पितृ यज्ञ करने यानी श्राद्ध कर्म का वर्णन किया गया है. भाद्रपद शुक्ल पक्ष पूर्णिमा से अश्विन कृष्ण पक्ष अमावस्या तक के समय को पितृ पक्ष कहा जाता है और इसी 15 दिनों के अंदर श्राद्ध कर्म कर पितरों को जलदान, पिंड दान की प्रक्रिया की जाती है. उज्जैन के ज्योतिषाचार्य पं. दयानन्द शास्त्री ने बताया की श्राद्ध पितृ पक्ष के अंतिम दिन यानी अमावस्या या महालया अमावस्या के रूप में जानी जाती है. जिन लोगों को अपने पूर्वजों या पितरों की पुण्यतिथि का सही दिन ज्ञात नहीं होता है.ऐसे पूर्वजों को इस दिन श्रद्धांजलि और भोजन समर्पित कर याद किया जाता है.
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क्यों आवश्यक है श्राद्ध करना
हिंदू धर्म शास्त्रों में इस बात का उल्लेख है कि पितृ पक्ष में तर्पण व श्राद्ध करने से व्यक्ति के पूर्वज प्रसन्न होते हैं और उसे आशीर्वाद प्रदान करते हैं इससे घर के अंदर सुख शांति का वातावरण बनता है.इसके साथ ही समृद्धि भी होती है .इसके साथ यह भी मान्यता है कि अगर पितृ नाराज हो जाएं तो ऐसे व्यक्ति को जीवन में कई तरह की समस्याओं का सामना भी करना होता है. पितरों के रुष्ट होने से धन हानि और संतान पक्ष से समस्याओं का सामना मनुष्य को करना होता है.संतानहीनता के मामलों में यह कहा जाता है कि ज्योतिषी से कुंडली के पितृ पक्ष (घर) को दिखवा लें और उसका सम्मान भी करें. ज्योतिषी पितृदोष को देखकर पितृ दोष शमन की व्यवस्था करा देते हैं. पितृ पक्ष के दौरान श्राद्ध अवश्य करनी चाहिए. माना जाता है कि यमराज 15 दिनों के लिए प्रत्येक वर्ष श्राद्ध पक्ष दौरान सभी जीवो को मुक्त कर देते हैं. जिससे यह सभी जीव अपने स्वजनों के पास पहुंचकर तर्पण, भोजन इत्यादि ग्रहण कर पाते हैं. शास्त्रों में ऐसा वर्णित है कि पितर ही अपने कुल की रक्षा करते हैं.
कब से कब तक है श्राद्ध

हिंदुओं में श्राद्ध पितरों का सबसे पड़ा पर्व माना जाता है. पूर्णिमा से अमावस्या तक यह 16 दिन का होने से इसे सोलह श्राद्ध कहते हैं. लेकिन तिथियां घटने-बढ़ने के साथ इसके दिन कम-ज्यादा होते हैं. उज्जैन के ज्योतिषाचार्य पं. दयानन्द शास्त्री के अनुसार 2016 के बाद इस वर्ष 2017 में भी सोलह श्राद्ध 15 दिन के होंगे.
6 सितंबर 2017 (बुधवार) को सूर्योदय से पूर्णिमा होने से सुबह पूर्णिमा का श्राद्ध होगा. इस दिन दोपहर 12.32 से प्रतिपदा तिथि लग जाएगी इसके चलते कई लोग इस दिन प्रतिपदा का श्राद्ध भी करेंगे क्योंकि श्राद्ध पूजन व ब्राह्मण भोज का समय दिन का बताया है. पितृ पक्ष का एक दिन कम होगा.वहीं कुछ पंडित बीच में पंचमी तिथि का क्षय होना भी बता रहे हैं.इस तरह पितृ पक्ष का पूरा एक दिन घटने से श्राद्ध के पूरे 16 दिन नहीं होंगे.
उज्जैन के ज्योतिषाचार्य पं. दयानन्द शास्त्री ने बताया की श्राद्ध में हमारे पितृ प्रसन्न होकर आशीर्वाद देते हैं.इसमें खरीदी से कोई नुकसान नहीं होता है. पं. दयानन्द शास्त्री ने बताया कि श्राद्ध के दौरान 8 सितंबर को दोपहर 12.31 से अमृत सिद्धि योग, 11 सितंबर को सुबह 09.21 से रवि योग, 12 सितंबर को सुबह 06.16 से सर्वार्थसिद्धि योग, 14 सितंबर को रात 2 बजे से सर्वार्थसिद्धि योग लगेगा जो 15 सितंबर तक रहेगा. 17 सितंबर को भी मंगल उदय हो रहा है.इन योग में पूजा, दान, खरीदारी आदि कर सकते हैं.
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