सर्वपितृ अमावस्या पर कैसे करें पितरों का श्राद्ध

श्राद्ध पक्ष में अमावस्या का बड़ा महत्व है. आश्विन मास की अमावस्या पितरों की शांति का सबसे अच्छा मुहूर्त है. पितरों के शाप से मुक्ति और भविष्य में भी इससे पूरी तरह मुक्त रहने के लिए पितृ श्राद्ध किया जाता है. सर्वपितृ अमावस्या अर्थात श्राद्ध-पक्ष के आखिरी दिन किया गया श्राद्ध कर्म हर प्रकार के पितृदोषों से मुक्ति दिलाता है.
ज्योतिषाचार्य प्रदीप भट्टाचार्य बताते हैं कि “जिन लोगों ने अपने पूर्वजों का तीन वर्ष तक श्राद्ध न किया हो, उनके पितर पितृ योनि से वापस प्रेत योनि में आ जाते हैं अत: उनकी शांति के लिए तीर्थस्थान में त्रिपिण्डी श्राद्ध किया जाता है.” ऐसी मान्यता है कि इस दिन यदि किसी कारण से पितरों का श्राद्ध करने से भूल गए है तो इस तिथि पर पितरों का एक साथ श्राद्ध करने से उन्हें मोक्ष की प्राप्ति होती है.
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ज्योतिषाचार्य प्रदीप भट्टाचार्य कहते हैं कि “जिन पितरों की तिथि का हमें पता नहीं होता है, अमावस्या के दिन एक साथ सभी पितरों का श्राद्ध एक साथ किया जा सकता है.” श्राद्ध पक्ष की अमावस्या को श्राद्ध का पहला भोग कौओं को अर्पित किया जाना चाहिए. कौए को पितर पक्ष में भोजन खिलाने से पितृदोष का नाश होता है.
प्रदीप भट्टाचार कहते हैं कि मान्यता है कि पीपल में पितरों का वास माना जाता है. इसलिए सर्वपितृ मोक्ष अमावस्या में पीपल के पेड़ पर जल चढ़ाएं. इस अमावस्या पर नदी या किसी जलाशय पर जाकर काले तिल के साथ पितरों को जल अर्पित करें इससे घर में हमेशा पितरों का आशीर्वाद बना रहता है और घर में खुशहाली और शांति आती है.
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संकल्प का मंत्र
ज्योतिषाचार्य प्रदीप भट्टाचार्य ने बताया कि पितरों के लिए जो भी दान करना चाहते हैं उससे पहले संकल्प मंत्र पढ़ना चाहिए. यह मंत्र इस प्रकार है- ॐ विष्णुर्विष्णुर्विष्णु नम: परमात्मने पुरुषोत्तमाय ॐ तत्सत् अद्य ब्रह्मणो द्वितीय परार्धे श्री श्वेत वराह कल्पे वैवस्वत मन्वन्तरे अष्टाविंशतितमे कलियुगे कलि प्रथम चरणे जम्बुद्वीपे भारतवर्षे भरत खण्डे… क्षेत्रे… पराभव नाम संवत्सरे उत्तरायणे/ दक्षिणायने,—- ऋतौ, — मासे, —पक्षे, —तिथौ (तिथि),—वासरे (दिन) —गौत्र: शर्मा/ वर्मा/ गुप्तोअहं. शास्त्रोक्त फल प्राप्ति द्वारा मम समस्त पितृ शान्त्यर्थे श्री परमेश्वर प्रीत्यर्थं… दान (या गौ/ भूमि इत्यादि) निष्क्रय द्रव्यं चाहं करिष्ये.‘ ॐ तत्सत्.
ये चीजें दान कर सकते हैं
ज्योतिषाचार्य प्रदीप भट्टाचार्य ने बताया कि पितरों की शांति के निमित्त तर्पण, ब्राह्मण भोजन, साधा (कच्चा अन्न), वस्त्र, भूमि, गोदान, स्वर्ण दान इत्यादि कर्म किए जाते हैं.
गोदान पांच प्रकार का होता है. प्रथम- ऋण धेनु, द्वितीय- पापापनोदधेनु, तृतीय- उत्क्रांति धेनु, चतुर्थ- वैतरणी धेनु, पंचम- मोक्ष धेनु
जो भी दान करना हो, हाथ में त्रिकुश, जल, अक्षत, पुष्प तथा कुछ द्रव्य (धन) लेकर संकल्प कर जल छोड़ें. दक्षिणा का संकल्प भी करें. इसके साथ ही ब्राह्मण भोज भी कराना चाहिए.
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