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महारास – शरद पूर्णिमा – ज्ञान विज्ञान

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महारास – शरद पूर्णिमा – ज्ञान विज्ञान

महारास – शरद पूर्णिमा- ज्ञान विज्ञान


भारतीय सनातन संस्कृति ज्ञान विज्ञान से भरपूर है। यह संस्कृति आध्यात्म एवं विज्ञान परक है। इस संस्कृति में सबसे महत्वपूर्ण है- ‘प्रकृति का सम्मान’। हमारे ऋषि मुनियों ने अपने अनुसंधान से मानवजाति के लिए बहुत ही अनमोल रत्न देकर गए हैं। पश्चिम देशों की तरह धर्म और विज्ञान का आपसी संघर्ष भारतीय इतिहास में नजर नहीं आता। यहाँ हमारे ऋषि मुनियों ने प्रकृति का सुक्ष्म अध्ययन कर के हमें योग, आयुर्वेद, ज्योतिष जैसी उपयोगी विद्यायें एवं विधान प्रदान किये है। आवश्यकता है, उन्हें सही से जानने और पह्चानाने की। आज आधुनिकता के अंधी दौड़ में कई लोग इस बहुमूल्य मानव कल्याणी ज्ञान-विज्ञान से अनभिज्ञ रह जाते हैं | भारतीय वैदिक परम्परा में मनाये जाने वाले पर्व-त्यौहार के पीछे भी आध्यात्मिक वैज्ञानिक कारण हैं। ग्रह-नक्षत्रों के आधार पर तिथियों का निर्धारण एवं मनुष्य के जीवन और स्वास्थय पर पड़ने वाले प्रभाव का सूक्ष्म अध्ययन बहुत ही लाभकारी सिद्ध होता है। हमारे ऋषि मुनियों द्वारा प्रदत एक ऐसी ही तिथि है-शरद पूर्णिमा की तिथि जो हमारे जीवन एवं स्वास्थ्य के लिए अत्यन्त महत्वपूर्ण है।

शरद-पूर्णिमा के दिन चंद्रमा की रौशनी में औषधीय गुण होता है। ज्योतिष अध्ययन के अनुसार चन्द्रमा वर्ष में सिर्फ एक बार षोडश कलाओं के साथ आकाश में उदित होता है | शरद पूर्णिमा की तिथि में चंद्रमा अन्य दिनों की तुलना पृथ्वी के ज्यादा नजदीक आ जाता है | मध्य रात्री में चंद्रमा के दर्शन से चंद्रमा के चारो और एक वृताकार-घेरा स्पष्ट नजर आती है | शरद पूर्णिमा के दिन औषधियों की स्पंदन क्षमता बढ़ जाती है | मान्यता है कि स्वयं इस दिन चन्द्रमा से अमृत बरसता है | इस तिथि को सारी रात चंद्रमा के दर्शन हर प्रकार के रोगों में लाभ पहुंचाता है और रोग-रोधक क्षमता को बढ़ा देता है |

पौराणिक कथानुसार एक समय ब्रह्मा के पुत्र प्रजापति दक्ष ने चंद्रमा को क्षय रोग से ग्रसित होने का श्राप दिया था, जिससे चंद्रमा का अमृत सूखने लगा तब चंद्रमा ने अपनी तपस्या से भगवान् शिव को प्रसन्न कर फिर से अमृत प्राप्त किया और वह शरद पूर्णिमा की ही शुभ तिथि है;

जिस दिन भगवान् शिव ने चंद्रदेव को सोम अर्थात अमृत प्रदान किया था |भगवान् शिव की इसी लीला और कृपा के कारण उन्हें सोमनाथ कहा जाता है और चन्द्र-देव पर हुई इस महान कृपा के स्मरण में ही प्रथम ज्योतिर्लिंग की स्थापना सोमनाथ के नाम से हुई |

यह वही महान दिन है जिस दिन द्वापर्युगावतार- भगवान् श्री कृष्ण ने यमुना तीरे महा-रास रचा था और अपने प्रेमी गोप-गोपियों को अधरामृत का पान कराया था | कहते हैं – यमुना तीरे शरद पूर्णिमा की श्वेत-रात्री में श्री कृष्ण ने अपने बांसुरी की ऐसी तान छेड़ी कि उसको सुनने वाले उनके प्रेमी भक्त अपना सुध बुध खो बैठे थे | गोपिया जिस अवस्था में थी वो कृष्ण की ओर भाग पड़ती | कोई गोपी अपने पति के सेवा में थी तो कोई भोजन बना रही थी कोई अपने बच्चों को खिला-पिला रही थी | कोई अभी बालिका ही थी तो कोई तरुणी, कोई युवा तो कोई वृद्धा अवस्था को भी प्राप्त हो चुकी थी| सब बेसुध हो मनमोहन की मोहक बंसी-तान को सुन कर दौड़ पड़ी थी |सब की निद्रा दूर जा चुकी थी, आज स्वयं परमेश्वर प्रेमावतार रूप धारण करके प्रेमामृत से अपने भक्तों को सराबोर करने के लिए उत्सुक नजर आ रहे थे | सांसारिक तामसिक मोह माया की निद्रा तो जैसे छू:मंतर हो गई हो |गोप-गोपियों को सिर्फ श्री कृष्ण का मनमोहक रूप ही नजर आ रहा था |उनके जन्म जन्म की तपस्या एवं भक्ति का फल उन्हें प्राप्त हो रहा था | अतः शरद पूर्णिमा को महारास पूर्णिमा के नाम से भी जानते हैं | इस तिथि को लक्ष्मी पूजा के नाम से भी देश के कई भागो में मनाया जाता है |

भगवान् श्री कृष्ण की इस महान लीला को कई बार कुछ विकृत मानसिकता के लोग वासनात्मक रूप देने का प्रयास करते हैं | कहते हैं,जिसकी जैसी बुद्धि होती है वो वैसी ही सृष्टि कर लेता है, और ऐसे लोग श्रीकृष्ण के अधरामृत पान को गलत ही समझ लेते हैं | अधरामृत से उनका तात्पर्य मात्र अधरों से ही होता है, परन्तु यह अधरा अमृत का अर्थ है “अधरा- अर्थात जो इस धरा का नहीं है ” | वह तो चंद्रमा से आने वाला अमृत है, यह तो चंद्रमा का सोमरस है जो शरद पूर्णिमा के दिन बरसता है |और इसी प्राकृतिक लाभ को प्राप्त करने के लिए शरद पूर्णिमा के उजाली रात में प्रेमावतार भगवान् श्री कृष्ण ने महारास की अमृतमयी लीला अपने भक्तो के साथ संपन्न की थी |

अतः शरद पूर्णिमा के रात्री में चंद्रमा की रौशनी में बैठना अत्यंत ही कल्याणकारी होता है | यह कई बिमारियो को दूर करता है | इस रात्री में अगर खीर बना कर चंद्रमा की रौशनी में रख दिया जाए तो वह खीर औषधीय गुणों से भरपूर हो जाता है | विशेष कर कफ विकार ( खांसी,नजला, दमा, फेफड़े में टी बी, पुरानी खासी, काली खासी, सर्दी-बुखार,थायरायड)  से होने वाली सारी बीमारियों के लिए राम बाण औषधि है |इन रोगियों को चाहिए कि खीर के साथ पीपल और पीपली का चूर्ण खीर में मिलाकर चंद्रमा की रौशनी में बैठकर मध्यरात्री में खाए | एक बार इस औषधि को नियम पूर्वक खाने से पुरे वर्ष इसका प्रभाव रहता है | लेकिन नियम को किसी जानकार विद्वान अथवा आयुर्वेद के किसी वैध से अवश्य समझ लें  तभी पूरा लाभ प्राप्त होगा |

अतः पाठक गण से आग्रह है कि इस तिथि को ना भूले और इसका पूरा लाभ उठाएं और अन्य सभी को भी प्रेरित करें और हमारे ऋषि मुनियों की इस महान खोज और संस्कृति की महान गाथा को गाएं |

— मनीष देव (दिव्य सृजन समाज)

http://divyasrijansamaaj.blogspot.in/

RW

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By Religion World October 5, 2017 5 min read
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