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दीपावली को कैसे मनाया मुस्लिम बादशाहों ने : दीपावली के इतिहास का प्रकाशभरा पहलू

दीपावली को कैसे मनाया मुस्लिम बादशाहों ने : दीपावली के इतिहास का प्रकाशभरा पहलू

दीपावली को कैसे मनाया मुस्लिम बादशाहों ने : दीपावली के इतिहास का प्रकाशभरा पहलू
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दीपावली को कैसे मनाया मुस्लिम बादशाहों ने : दीपावली के इतिहास का प्रकाशभरा पहलू

दीपावली को कैसे मनाया मुस्लिम बादशाहों ने : दीपावली के इतिहास का प्रकाशभरा पहलू

दिल्ली और आसपास के इलाके में प्रदूषण के चलते सुप्रीम कोर्ट द्वारा पटाखों पर प्रतिबन्ध लगाया गया. लेकिन इस प्रतिबन्ध को कुछ लोगों ने धार्मिक रंग देने का प्रयास किया है. जिसका रिलिजन वर्ल्ड बिलकुल समर्थन नहीं करता. ऐसा दावा किया जा रहा है कि मुस्लिमों शासकों द्वारा दीपावली मनाने की इस परंपरा पर औरंगजेब ने रोक लगाई. आतिशबाज़ी और दीया जलाने पर औरंगज़ेब ने 1665 में रोक लगा दी थी. इसके लिए उन्होंने बाकायदा एक फरमान जारी किया जिसमें आतिशबाजी पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया था. न केवल आतिशबाजी बल्कि उन्होंने दिया जलाने की परम्परा को अन्धविश्वास करार दिया और हिन्दुओं को भी यह त्यौहार मनाने पर रोक लगायी गयी. लेकिन १७०७ में औरंगजेब की मृत्यु के उपरांत इस त्योहार उसी पुरानी परंपरा के साथ मनाया जाने लगा. परन्तु आज 350 साल के बाद पुनः सुप्रीम कोर्ट द्वारा पटाखों पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया है. ऐसा माना जा रहा है कि इतिहास दोहराया जा रहा है.

ऐसे में यह बेहद ज़रूरी हो जाता है कि इस बात को लोग समझें कि भारतवर्ष में दीपावली की परम्परा का इतिहास कितना गौरवशाली है. चलिए आज आप से दीपावली से जुड़े हुए कुछ ऐतिहासिक परम्पराएं साझा करते हैं.

सबसे पहली बात तो यह कि दीपावाली का अर्थ दीप मालाओं से जुड़ा हुआ है यानि दीपमालाओं द्वारा की गयी रोशनी… इसका उदहारण आज भी हमें बनारस जैसे शहर में देव दीपावली जैसे दीपोत्सव में देखने को मिलता है. दीपावली का उल्लेख स्कन्द पुराण में भी देखने को मिलता है. इसके अतिरिक्त 7वीं शताब्दी में राजा हर्षवर्धन के नाटक में दीपोत्सव का उल्लेख है और 10वीं शताब्दी में राजशेखर के काव्यमीमांसा में भी इसका ज़िक्र किया गया है.

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कैसी होती थी मुस्लिम बादशाहों की दिवाली
दीपावली केवल हिन्दुओं का ही त्योहार नहीं है, बल्कि अन्य धर्मों द्वारा भी इसे मनाया जाता रहा है. और इसका इतिहास काफी दिलचस्प रहा है.

मोहम्मद बिन तुगलक की दिवाली


मुस्लिम बदशाहों द्वारा दीपावली को धूमधाम से मनाने का उल्लेख है.14वीं शताब्दी में मोहम्मद बिन तुग़लक दिवाली मनाते थे. वे अपने अंतरमहल में दीपवाली मानते थे और काफी बड़ा भोज रखते थे. जश्न भी होता था लेकिन आतिशबाजी का उल्लेख उनके शासनकाल में कहीं नहीं मिलता है.

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बादशाह अकबर की दीपावली


16वीं शताब्दी में अकबर ने पहली बार धूम-धाम से दिवाली मनाते थे. इनके शासनकाल में दीपावली के दिन दरबार को सजाया जाता था. अकबर ने रामायण का फारसी में अनुवाद कराया था जिसका पाठ भी किया जाता था और इसके बाद श्रीराम की अयोध्या वापसी का नाट्य मंचन होता था. इसके अलावा अपने मित्र राजाओं के यहाँ दीपवाली के अवसर पर मिठाइयों का वितरण भी करवाते थे. आतिशबाजी की हल्कीफुल्की शुरात हो चुकी थी. महल शांडिल्य और झाद्फनूस की रोशनी से सराबोर रहता था.

शाहजहां की दिवाली

अकबर के बाद 17वीं शताब्दी में शाहजहां ने दीपवाली के रूप में और परिवर्तन किया. वे दीपावली के इस अवसर पर 56 राज्यों से अलग-अलग मिठाई मंगाकर 56 प्रकार की थाल सजाते थे. शाहजहाँ के दौरान अपने शहीदों को याद करते हुए सूरजक्रांत नाम के पत्थर पर सूर्य किरण लगाकर उसे पुनः रोशन किया जाता जो साल भर जलता था. इसके अलावा एक 40 फुट का आकाश दिया जलाया जाता जिसमें 40 मन कपास के बीज का तेल भी डाला जाता था. शाहजहाँ के शासनकाल में भव्य आतिशबाजी होती थी. जिसमें महिलाओं के लिए अलग तरह से आतिशबाजियां होती थी और आम जनता के देखने के लिए भी आतिशबाजियां होती थी. शाहजहाँ के काल में दिल्ली में आतिशबाजियों की धूम हुआ करती थी. इस पर्व को पूरी तरह हिंदू तौर-तरीकों से मनाया जाता था. भोज भी एकदम सात्विक होता था.

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मोहम्मद शाह की दिवाली

मोहम्मद शाह को रोशन अख्तर भी कहते थे. उनका शासन 1719 से 1748 तक रहा. वह संगीत और साहित्य को प्रेमी थे. उन्होंने मोहम्मद शाह रंगीला को नाम से जाना जाता था. रंगीला नाम से ही समझ आ रहा है कि वह काफी शौक़ीन मिजाज़ राजा थे. दीपावाली पर वह अपनी तस्वीर बनवाते थे. और अकबर और शाहजहाँ से भी दोगुने चौगुने अंदाज़ में दीपावली का जश्न मनाते थे. उन्होंने दीपावली को त्योहार को और ज्यादा भव्यता दी. उनके शासनकाल में लाल किले को सजाया जाता था. अलग अलग तरह के ल ज़ीज़ पकवान बनते थे. यह पकवान सिर्फ महल के लिए नहीं बल्कि आम जनता में भी बांटे जाते थे. और ऐसा कहा जाता है जो दीपावली की परम्परा मोहम्मद शाह रंगीला ने शुरू की थी उसी परंपरा का निर्वाह हम आज भी कर रहे हैं.

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ऐसा नहीं है की सिर्फ मुगलकाल में ही दीवाली का उत्साह देखने को मिलता था. भारत में अंग्रेजों के आने के बाद भी दिवाली पर आतिशबाजी की जाती थी और अंग्रेज़ शासक भी उसका आनंद उठाते थे.
बताने का मकसद सिर्फ इतना है कि दीपावली खुशियों का त्यौहार है, खुशियां बांटने का त्यौहार है इसे धर्म का जामा न पहनाएं. तो इस दिवाली पटाखों से नहीं दियों की रोशनी से खुशियां बांटें….इंसान नहीं.

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By Shweta October 11, 2017 5 min read
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