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Dhanteras : क्या है धनतेरस का शुभ मुहूर्त और पूजा विधि

Dhanteras : क्या है धनतेरस का शुभ मुहूर्त और पूजा विधि

Dhanteras : क्या है धनतेरस का शुभ मुहूर्त और पूजा विधि
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Dhanteras : क्या है धनतेरस का शुभ मुहूर्त और पूजा विधि

Dhanteras : क्या है धनतेरस का शुभ मुहूर्त और पूजा विधि

इस वर्ष धनत्रयोदशी का पर्व आकाश मण्डल के बारहवें नक्षत्र उत्तराफाल्गुनी के साये तले मनाया जाएगा। उत्तराफाल्गुनी के स्वामी सूर्यदेव हैं। लिहाज़ा इस बार का धनतेरस का पर्व प्रतिष्ठा, स्वास्थ्य और आनंद लेकर आ रहा है। संध्या 5 बजकर 58 मिनट तक ब्रह्म योग रहेगा। उसके पश्चात् ऐन्द्र या इंद्रा योग घटित होगा। माया की विपरीत ऊर्जा ब्रह्म के योग में पूजन, जहां शिक्षा में आशातीत परिणाम प्रदायक और विद्या के विकास के साथ आध्यात्मिक उन्नति के लिए जाना जाता है, वहीं संतान की उन्नति और मान-सम्मान में वृद्धि के लिए भी पहचाना जाता है। प्राचीन ग्रंथों में इंद्र के योग ऐन्द्र या इंद्रा में पूजन जहां ऐश्वर्य प्रदायक कहा गया है, वहीं इसे राजनैतिक सफलता के साथ सुख, आनन्द, वैभव और उत्तम वाहन देने वाला माना गया है।

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धनत्रयोदशी का आरम्भ 17 अक्टूबर, 2017  को मध्यरात्रि शून्य बजकर 26 मिनट पर होगा जो 18 अक्टूबर, 2017 को शून्य बजकर 8 मिनट तक रहेगा। राहु काल शाम 3 बजे से 4 बजकर 30 मिनट तक और प्रदोष काल संध्या 5 बजकर 45 मिनट से 8 बजकर 17 मिनट तक होगा। इस वर्ष धनतेरस पूजन मुर्हुत संध्या 7 बजकर 43 मिनट से रात्रि 9 बजकर 44 मिनट तक रहेगा।

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धनतेरस की पूजा विधि 

प्रातःकाल 8.35 से 10.45 बजकर गृह के धन के साथ दैविक शक्तियों का पूजन स्थायित्व प्रदान करता है।इसी मुहूर्त में बही खाता क्रय करना चाहिए। अन्यथा संध्या के पूजन मुहूर्त में भी बही खाता ख़रीदा जा सकता है। सूर्यास्त के पश्चात अकाल मृत्यु से बचने के लिए घर के मुख्य द्वार पर बाहर की ओर 4 बातियों का दीप दान यानि दीप का प्रज्जवलन करना चाहिए। धनतेरस पर रजत यानि चांदी ख़रीदना सौभाग्य कारक माना जाता है। कहते हैं कि इस दिन ख़रीदे हुए रजत में नौ गुने की वृद्धि हो जाती है। चांदी के अभाव में ताम्र क्रय किया जा सकता है। रात्रि में इस दिन आरोग्य के लिए भगवान धन्वन्तरि तथा समृद्धि के लिए कुबेर के साथ लक्ष्मी गणेश का पूजन करके भगवती लक्ष्मी को नैवेद्य में धनिया, गुड़ व धान का लावा अवश्य अर्पित करना चाहिए। रात्रि में ध्यान में प्रविष्ट होकर भजन के द्वारा यानि बाह्य कर्ण बंद कर आत्मा के कानों से ब्रम्हाण्डिय ध्वनियों के श्रवण का अभ्यास आंतरिक व मानसिक बल प्रदान करेगा।

साभार: सदगुरु स्वामी आनन्द जी

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By Shweta October 17, 2017 3 min read
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