Dalai Lama, Acharya Lokesh Muni, Gopal Gaur and Interfaith leaders addressed Ideas of Harmonious Coexistence: Religions & Philosophies of India
Addressing a conference on Ideas of Harmonious Coexistence: Religions and Philosophies of India organised by Dawoodi Bohra Community here, Dalai Lama said he would dedicate the rest of his life to revive the ancient Indian knowledge.

- दलाई लामा, आचार्य लोकेश ने जे.एन.यु. में आयोजित संगोष्ठी
- ‘सामंजस्य पूर्ण सहअस्तित्व के विचार : भारत के धर्म एवं दर्शन’ में भाग लिया
- विश्व कल्याण व मानव विकास के लिए शांति आवश्यक – दलाई लामा
- शांतिपूर्ण सहस्तित्व भारत की बहुलतावादी संस्कृति की पहचान – आचार्य लोकेश
- मौजूदा दौर में अंतरधार्मिक संवाद जरुरी – सैयदना ताहिर
नई दिल्ली, 28 दिसम्बर 2017: जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित संगोष्ठी ‘सामंजस्यपूर्ण सह–अस्तित्व के विचार : भारत के धर्म एवं दर्शन’ ने बौद्ध धर्म के तिब्बती धर्मगुरु दलाई लामा ने कहा कि भारत एक स्थिर और लोकतांत्रिक देश है, और ये विशव विकास में बहुत योगदान दे सकता है। उनहोने गुस्से को भावना का अहम हिस्सा बताया और प्राचीन भारतीय ज्ञान से इसे नियंत्रित किया जा सकता है। 82 साल के दलाई लामा ने कहा कि उनके जीवन का अब जो भी साल बचे हैं, वो प्राचीन भारतीय ज्ञान को आगे लाने में ही लगेंगे।
“मुझे ऐसा लगता है कि भारत शांति की दिशा में बहुत कुछ कर सकता है. शांति के विचार से सही शांति आ सकती है। ये देश बहुत आबादी वाला है, पर ये लोकतांत्रिक और स्थिर है। डर के खतरनाक भावना से निकलने के लिए हमें प्रेम की भावना को मजबूत करना होगा” – दलाई लामा
दाउदी बोहरा समुदाय के तकरीब श्रंख्ला के तहत दिलली के जेएनयू में एक खास आयोजन किया गया, जिसमें पहली बार सर्वधर्म में बेहतरीन काम के लिए एक सम्मान की शुरूआत की गई। आज Syedna Qutbuddin Harmony Prize से दलाई लामा को दाउदी बोहरा समुदाय के 54वें प्रमुख Syedna Taher Fakhruddin Saheb ने सम्मानित किया।






अहिंसा विश्व भारती के संस्थापक प्रख्यात जैन आचार्य डा. लोकेश मुनि ने भाग लेते हुए कहा कि पर्यावरण प्रदुषण से ज्यादा वैचारिक प्रदुषण खतरनाक है। शांतिपूर्ण सहस्तित्व भारत की बहुलतावादी संस्कृति की पहचान है। अनेकता में एकता उसकी मौलिक विशेषता है, सर्वधर्म संवाद इसका मूल मंत्र है | सर्वधर्म सद्भाव को अपने जीवन में उतरना विश्व शांति के लिए आवश्यक है | धर्म हमें जोड़ना सिखाता है तोड़ना नहीं| धर्म के क्षेत्र में हिंसा, घृणा और नफरत का कोई स्थान नहीं हो सकता| हिंसा और आतंकवाद किसी समस्या का समाधान नहीं है| हिंसा प्रतिहिंसा को जन्म देती है।


सैयदना ताहिर फक्करुद्दीन साहिब ने कहा कि मौजूदा समय में हम जिस दौर से गुजर रहे है, आज न केवल भारत बल्कि समस्त विश्व हिंसा व आतंकवाद से प्रभावित है। आये दिन धर्म, जाति व सम्प्रदाय के नाम पर बेगुनाहों का कत्लेआम हो रहा है| ऐसे समय में अंतरधार्मिक संवाद की बहुत आवश्यकता है।
जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित संगोष्ठी में श्री गौर गोपालदास, श्री ईई. मालेकर, श्री मंजीत सिंह जी.के., डा. ऐ.के. मर्चेंट, आर्चबिशप अनिल जोसेफ थॉमस, भारत के पूर्फ़ चीफ जस्टिस अहमदी ने संगोष्ठी को संबोधित किया। विश्व भर विभिन्न धर्मों के महान धर्माचार्य, राजनेताओं, शिक्षाविदों, साहित्यकारों, पत्रकारों, कलाकारों ने भाग लिया।
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