‘गंगा मेला’ के बिना अधूरी है कानपूर की होली
कानपूर, 9 मार्च; देशभर में रंगों के पर्व होली की मस्ती का दौर भले ही थम गया हो मगर उत्तर प्रदेश के औद्योगिक नगर कानपुर में होली की खुमारी गुरूवार को ‘गंगा मेला’ के साथ अभी भी बरकरार है. कानपुर में होली खेलने की यह परम्परा देश प्रेम की भावना से प्रेरित है. स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान वर्ष 1942 में हुई एक घटना के बाद से अनुराधा नक्षत्र के दिन होली खेलने की परम्परा की शुरूआत हुई जो पिछले आठ दशकों से चली आ रही है.
कानपुर में लोग होली के दिन रंग खेले ना खेले मगर अनुराधा नक्षत्र के दिन होली जरूर खेलते हैं. बरसों से चली आ रही इस परम्परा को हर साल निभाया जाता है. ‘गंगा मेला’ के दिन यहां भीषण होली होती है. इस मौके पर ठेले पर होली का जुलूस निकाला गया है. ये जुलूस हटिया बाज़ार से शुरू होकर नयागंज, चौक सर्राफा सहित कानपुर के करीब एक दर्जन पुराने मोहल्ले में घूमता है. इसके बाद शाम को सरसैया घाट पर गंगा मेला का आयोजन किया जाता है. जहां शहर भर के लोग इकठ्ठा होते है और एक दूसरे को होली की बधाई भी देते हैं. इस कार्यक्रम में जिले के आलाधिकारी भी शामिल हुए.

क्यों मनाते हैं ‘गंगा मेला’
‘गंगा मेला’ की नींव साल 1942 में पड़ी थी. स्वतंत्रता आंदोलन की आग से थर्राये अंग्रेज हुक्मरानों ने क्रांतिकारियों के गढ़ कानपुर में होली न खेलने की चेतावनी जारी की थी मगर होली के दिन हटिया बाजार में स्थित रज्जन बाबू पार्क में नौजवान क्रांतिकारियों ने अंग्रेजी हुकूमत की परवाह किए बगैर पहले तिरंगा फहराया, फिर जमकर होली खेली. इसकी भनक जब अंग्रेजी हुक्मरानों को लग गई जिसके बाद करीब एक दर्जन से भी ज्यादा अंग्रेज सिपाही घोड़े पर सवार होकर आए और झंडा उतारने लगे. जिसको लेकर होली खेल रहें नौजवानों के बीच संघर्ष भी हुआ. अंग्रेज हुक्मरानों 40 क्रांतिकारियों को गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया.
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क्रांतिकारियों के सामने टेके घुटने
क्रांतिकारियों को गिरफ्तार करना अंग्रेजी हुक्मरानों के लिए गले की हड्डी बन गया. गिरफ्तारी के विरोध में कानपुर का पूरा बाजार बंद हो गया. मजदूरों ने फैक्ट्री में काम करने से मना कर दिया. ट्रांसपोर्टरों ने चक्का जाम कर सड़कों पर ट्रकों को खड़ा कर दिया. सरकारी कर्मचारी हड़ताल पर चले गए. हटिया बाजार में सौ से ज्यादा घरों में चूल्हा जलना बंद हो गया. मोहल्ले की महिलाएं और छोटे-छोटे बच्चे उसी पार्क में धरने पर बैठ गए. समूचे शहर की जनता ने अपने चेहरे से रंग नहीं उतारे, यूं ही लोग घूमते रहे.
आखिरकार हारी अंग्रेजी हुकूमत
शहर के लोग दिनभर हटिया बाजार में ही इक्कठा हो जाते और पांच बजे के बाद ही लोग अपने घरों में वापस चले जाते. इस आंदोलन की आंच दो दिन में ही दिल्ली तक पहुंच गई. जिसके बाद पंडित नेहरू और गांधी ने इनके आंदोलन का समर्थन कर दिया. अनुराधा नक्षत्र के दिन जब नौजवानों को जेल से रिहा किया जा रहा था. पूरा शहर उनको लेने के लिए जेल के बाहर इकठ्ठा हो गया था. जेल से रिहा हुए क्रांतिवीरों के चहरे पर रंग लगे हुए थे. जेल से रिहा होने के बाद जुलुस पूरा शहर घूमते हुए हटिया बाज़ार में आकर खत्म हुआ. उसके बाद क्रांतिवीरों के रिहाई की खुशी में यहां जमकर होली खेली गई.
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