RELIGION WORLD — THE INDEPENDENT SCIENTIFIC & INTERFAITH JOURNAL
Navigation

© 2026 Religion World Foundation.

Global Faith • Scientific Heritage • Human Ethics

आनंदमयी मां – महान साधिका और शक्तिस्वरूपा संत

आनंदमयी मां – महान साधिका और शक्तिस्वरूपा संत

आनंदमयी मां – महान साधिका और शक्तिस्वरूपा संत
Visual Archive

आनंदमयी मां – महान साधिका और शक्तिस्वरूपा संत

आनंदमयी मां – महान साधिका और शक्तिस्वरूपा संत

पुण्यभूमि भारत में वैसे तो ऐसे अनेक संत हुए हैं जिन्होंनें ज्ञान, भक्ति, कर्म के माध्यम से ईश्वर को प्राप्त किया लेकिन करुणा को अपनी उपासना पद्धति बना कर ईश्वरीय सत्ता का साक्षात्कार करने और करवाने वाली संतों में श्री आनंदमयी मां का स्थान सबसे अनूठा है। मां को कोई शिव का भक्त कहता था तो किसी को लगता था कि वो आधुनिक युग की मीरा हैं जिनके रोम रोम में कृष्ण भक्ति है, तो कोई कहता था कि उनमें साक्षात महाकाली वास करती हैं तो किसी के मत में वो भाव समाधि के द्वारा किसी को भी निराकार ब्रह्म का साक्षात्कार करवा सकती हैं। श्री आनंदमयी मां श्रीमद् भगवतगीता में वर्णित साक्षी भाव को प्राप्त करने वाली ऐसी संत थी जिन्होंने अपनी आत्मा और शरीर को पृथक देखने का सामर्थ था। वो अक्सर खुद के शरीर को अपनी आत्मा से अलग देख कर अपने भक्तों को कर्ता भाव के निष्काम कर्म मार्ग पर चलने की प्रेरणा देती थीं। निष्काम और साक्षी भाव को प्राप्त मां आनंदमयी मां अपनी सर्वोच्च समाधि की स्थिति में भी करुणा रस का प्रवाह अपने भक्तों में करती रहती थी। इस संदर्भ में वो करुणावतार भगवान बुद्ध के काफी सन्निकट थीं।

श्री आनंदमयी मां का जन्म 30 अप्रैल 1896 को वर्तमान बंग्लादेश के ब्राह्णण बारिया जिले के खेउरा ग्राम में हुआ था। उनके पिता बिपिन बिहारी भट्टाचार्य और मां मोक्षदा सुंदरी दोनों ही वैष्णव मत को मानने वाले थे । श्री आनंदमयी मां का मूल नाम निर्मला सुंदरी था । भाव अवस्था में भक्ति उन्हें अपनी मां से विरासत में मिली थी। उनकी मां मोक्षदा सुंदरी भी अक्सर ईश्वर की प्रार्थना में भाव समाधि में चली जाती थी। कहा जाता है कि जब आनंदमयी मां अपनी माता के गर्भ में ही थीं तब अनेक देवी देवताओं ने उनकी मां के स्वप्न में दर्शन दिये थे और ये निर्देश दिया था कि उनके घर में एक महान संत का जन्म होने वाला है। और ऐसा ही हुआ भी मां आनंदमयी में एक महान संत के सारे लक्षण बचपन से ही दिखने लगे थे । अपनी माता पिता के मुख से भगवान कृष्ण के भजन सुनते ही वो सुध बुध खो बैठती थीं। भाव समाधि की उच्च अवस्था में बिना किसी प्रयास के लिए वो यौगिक क्रियाएं करने लगती थीं।

13 वर्ष की उम्र में रमानी मोहन चक्रवर्ती से हुआ । लेकिन विवाह के बाद छह वर्षों तक वो अपने जेठ के घर पर ही रहीं । वहां भी घर के काम काज करते वक्त वो अपनी सुध बुध खो बैठतीं और भाव समाधि में चली जातीं । ढाका स्थित इसी घर में उन्हें एक व्यक्ति ने मां का नाम दिया। मां आनंदमयी सासांरिक कामनाओं और वासनाओं से कोसो दूर थीं। उनके पति ने जब उन्हें सांसारिक कामनाओं में लाने का प्रयास किया तो उन्होंने एक दिन अपने पति को अपने अंदर मां काली का स्वरुप दिखा दिया। इसके बाद उनके पति ने भी उनका शिष्यत्व स्वीकार किया और भोलानाथ के नाम से प्रसिद्ध हुए। 1916 में जब वो अपने पीहर वापस आ गईं तो वो शैव और वैष्णव भक्ति की तरफ उन्मुख हो गईं।

कहा जाता है कि एक बार जब वो एक मस्जिद के पास से गुज़र रही थी तो अनायास ही वो कुरान शरीफ की आयतें बोलने लगीं और भाव समाधि में पहुंच कर उन्होंने नमाज की सारी क्रियाएं कर दीं। धीरे धीरे मां आनंदमयी की सिद्धियों और उनकी साधना की चर्चा पूरे देश में होने लगीं और हजारों की तादाद में लोग उनके दर्शनों को आने लगें । मां पूरे देश में भ्रमण करने लगीं । इसी दौरान विश्व प्रसिद्ध संत योगानंद से उनकी मुलाकात हुई जिसका जिक्र परमहंस योगानंद जी ने अपनी विश्व प्रसिद्ध पुस्तक ‘एन ऑटोबायोग्राफी ऑफ ए योगी’ पुस्तक में किया है। इस पुस्तक के जरिए पूरी दुनियां में मां का नाम प्रसिद्ध हो गया और विश्व के कोने कोने से लोग उनके दर्शनों को आने लगे।

आनंदमयी मां और परमहंस योगानंद जी

मां के भक्तों में स्वर्गीय पूर्व प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी भी थी। कहा जाता है कि इंदिरा गांधी को उन्होंने एक रुद्राक्ष की माला दी थी जिसे उनकी जीवन रक्षा के लिए हमेशा पहने रखने का आदेश दिया था। इंदिरा जी की हत्या के दिन वो माला इंदिरा जी ने नहीं पहनी थी और उसे मरम्मत के लिए उतार दिया था। श्री मां और राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के बीच भी आध्यात्मिक संबंध थे । मां उन्हें पिताजी कह कर बुलाती थीं और बापू उन्हें मां कहते थे। देश के प्रथम राष्ट्रपति डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद भी मां के परम भक्तों में एक थे। गांधी जी के निधन के बाद मां ने उनकी तुलना ईसा मसीह से की थी।

मां को ईश्वरीय सिद्धियां बिना गुरु के ही भक्ति से प्राप्त हो गईं थी। कहा जाता है कि वो लोगों के मन की बात जान लेती थीं और उन्हे वो भी सारी चीजें दिखती थी जो किसी को भी नजर नहीं आती थीं।  1955 के वक्त एक दिन जब मां आनंदमयी विध्यांचल आईं तो उन्होंने वहां के जिलाधिकारी को आदेश दिया कि वो जिस स्थान पर ठहरी हैं वहां खुदाई करवाई जाए। मां का कहना था कि वहां कई देवी देवताओं की मूर्तियां दबी पड़ीं है। मां के इन देवी देवताओं की तरफ से संदेश आया था कि उन मूर्तियों को जमीन के अंदर से निकाला जाए। खुदाई के बाद वहां दो सौ से भी ज्यादा मूर्तियां निकली । श्री मां के चमत्कारों से संबंधित असंख्य कहानियां है ।

इस लेख के लेखक के पिता श्री अभय कुमार मिश्रा ने भी दो वाकये कुछ प्रत्यक्ष देखे थे जो श्री मां के द्वारा ही संभव थे। श्री मां बिहार के गया जिले से होकर गुजर रही थीं। वहां ट्रेन बमुश्किल दो मिनट रुकती थी। वहां के नगरसेठ श्री शिवराम डालमिया मां के बड़े भक्त थे। अभय जी और डालमिया जी दोनों मां के दर्शन करने जब ट्रेन के पास पहुंचे तो मां ने डालमिया जी से कहा कि किरासन का तेल खत्म हो गया है खाना कैसे बनेगा। डालमिया जी तुरंत आदेश का पालन करने के लिए ट्रेन से उतर पड़े । एक घंटे बाद जब डालमिया जी किरासन का तेल लेकर लौटे तब तक ट्रेन बिना किसी वजह से रुकी हुई थी। जैसे ही उन्होंने किरासन तेल दिया ट्रेन अचानक चल पड़ी। इस दौरान मां ने अभय जी से पूछा कि किसकी अराधना करते हो। अभय जी की इष्ट मां काली थी। मां ने कहा कि कृष्ण और काली एक ही हैं। दोनों का बीज मंत्र भी एक ही है (कृष्ण और काली का बीज मंत्र क्लीं है) । दोनो नामों का अर्थ भी काला ही होता है। फिर अभय जी से मां ने पूछा कि तुम मां काली के लिए क्या त्याग कर सकते हो। अभय जी एक ब्राह्णण परिवार से आते थे जिनके लिए यज्ञोपवित का बहुत महत्व था। उन्होंने कहा कि मैं अपने यज्ञोपवित का त्याग करता हूं। मां के कहा कि बिल्कुल ठीक है क्योंकि मां काली श्मशान वासिनी है वहां किसी तरह के कर्मकांड की आवश्यकता नहीं होती। मां काली कर्मकांड पसंद नहीं करती । जाओ तुम्हे मेरा आशीर्वाद है।

श्री आनंदमयी मां को सिर्फ भक्तों का ही प्रेम हासिल नहीं था। मां को देश का कोई ऐसा संत नहीं था जो उनकी आध्यात्मिकता को नमन नहीं करता था। कुँभ के दौरान देश के सारे संत मां के दर्शन करने उनके कैंप में आते रहते थे। 1982 के इलाहाबाद कुंभ का उद्घाटन मां के ही श्री कमलों से सभी संतों ने करवाया था। श्री मां के भक्तों में महामहोपाध्याय श्री गोपीनाथ कविराज भी थे जिन्होंने श्री मां को एक दैवी अवतार बताया था। मां को उनके बचपन में ही ढाका प्रवास के दौरान लोग मानुषी काली अर्थात मां काली के मनुष्य रुप मानते थे। जब मां नर्मदा की यात्रा पर गईं तो वहां भक्तों ने उन्हें मां नर्मदा का अवतार करार दिया। मदुरै के भक्तों के लिए वो देवी मीनाक्षी का अवतार थीं । 27 अगस्त 1982 को उनकी महासमाधि के बाद देश के सभी संप्रदायों के संतों ने उन्हें आधुनिक काल की सबसे महान संत का सम्मान दिया और हरेक संप्रदाय ने उनकी जीवन में इस्तेमाल की गई वस्तुओं को अपने मठो में स्थापित करवाया।

===========

लेखक – अजीत मिश्रा ( ajitkumarmishra78@gmail.com)

RW

Editorial Review Note

Religion World is the country's only website that provides complete information on all religions. Religion World will always present information about all religions impartially. You can send us all kinds of information, news, updates, opinions, and suggestions at religionworldin@gmail.com.You can also follow us on X (Twitter), Facebook, and YouTube.

By Religion World July 12, 2018 7 min read
Share:

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *