रक्षाबंधन का वास्तविक अर्थ
- राजयोगिनी दादी जानकी

हम हर वर्ष रक्षाबंधन का पावन पर्व मनाते हैं। वर्तमान समय इस पर्व का जो साधारण-सा उद्देश्य रह गया है, उसे देखकर कई प्रश्न उत्पन्न होते हैं। एक तो यह कि क्या बहन राखी नहीं बाँधेगी तो भाई रक्षा नहीं करेगा क्या? सनातनी संस्कृति को छोडक़र बाकी किसी भी संस्कृति (बौद्ध, क्रिश्चियन, मुस्लिम आदि) में राखी नहीं बाँधी जाती परंतु भाइयों द्वारा अपनी लौकिक बहनों की रक्षा तो वहाँ भी होती है।
दादी जानकी बोध के लिए कोई और त्योहार क्यों नहीं?
यदि कोई कहे, यह त्योहार भाई-बहन के बीच प्रेम बढ़ने का प्रतीक है तो भी प्रश्न उठता है कि क्या राखी ना बाँधी जाए तो बहन-भाई का प्रेम समाप्त हो जायेगा क्या? भाई-बहन को हिन्दी में सहोदर-सहोदरी भी कहा जाता है जिसका संधिविच्छेद करें तो अर्थ निकलता है, एक ही उदर (पेट) से जन्म लेने वाले; जो एक उदर से जन्म लें, एक ही गोद में पलें, उनमें आपस में स्नेह ना हो, यह कैसे हो सकता है। सफर के दौरान कोई यात्री हमारे साथ एक ही वाहन में होता है, उसे सहयात्री कहते हैं। दो-चार घंटे एक ही गाड़ी में सफर करने वाले से भी इतना स्नेह हो जाता है कि हम उसका पता ले लेते हैं, पुन मिलने का वायदा भी कर लेते हैं तो क्या सहोदर-सहोदरी में स्वाभाविक स्नेह नहीं होगा जो उन्हें प्रेम जागृत करने के लिए राखी का सहारा लेना पड़े। फिर यह भी प्रश्न उठता है कि रिश्ते तो और भी हैं, क्या उनमें भी कत्र्तव्य बोध जागृत करने के लिए कोई त्योहार मनाया जाता है क्या? क्या पिता अपने बच्चों की पालना करे, इसके लिए कोई त्योहार है, माँ अपने बच्चों को खुशी-शान्ति दे, इसके लिए कोई त्योहार है क्या? फिर भाई, बहन की रक्षा करे, इसके लिए त्योहार क्यों? निष्पाप नकारों से देखो
वास्तव में इस त्योहार का रूप, इसके प्रारंभ में एक बहुत ही ऊँची और बेहद की भावना लिए हुए था जो समय के अंतराल में धूमिल हो हद में बदल गई। भारतीय संस्कृति वसुधैव कुटुम्बकम् में विश्वास करती है। वसुधैव कुटुम्बकम् अर्थात् सारा विश्व ही परिवार है। भाई-बहन का नाता ऐसा नाता है जो कहीं भी, कभी भी बनाया जा सकता है। आप किसी भी नारी को बहन रूप से निसंकोच संबोधित कर सकते हैं। बहुत छोटी आयु वाली को, हो सकता है, माता ना कह सकें पर बहन तो बच्ची, बूढ़ी हरेक को कह सकते हैं। वसुधैव कुटुम्बकम् हमें यही सिखाता है कि संसार की हर नारी को बहन मानकर निष्पाप नकारों से देखो और हर नर को भाई मानकर निष्पाप नकारों से देखो।
सगी बहन है सब नारियों की प्रतिनिधि
इस निष्पाप वैश्विक संबंध की याद दिलाने यह त्योहार आता है और इसके लिए निमित्त बनती है सगी बहन क्योंकि बहन-भाई के नाते में लौकिक बहन का नाता स्वाभाविक रूप से पवित्रता लिए रहता है। बहन जब अपने लौकिक भाई की कलाई पर राखी बाँधती है तो यही संकल्प देती है कि भाई, जैसे तुम अपनी इस बहन को पवित्रता की नकार से देखते हो, दुनिया की सभी नारियों को, कन्याओं को ऐसी ही नकार से निहारना। संसार की सारी नारियाँ तुझे राखी नहीं बाँध सकती पर मैं उन सबकी तरफ से बाँध रही हूँ। वो सब मुझमें समाई हुई हैं, उन सबका प्रतिनिधि बनकर मैं आपसे निवेदन करती हूँ, आपको प्रतिज्ञाबद्ध करती हूँ कि आप निष्पाप बनें। मेरी सुरक्षा भी तभी होगी जब
आप औरों की बहनों की सुरक्षा करेंगे। यदि आपके किसी कर्म से संसार की कोई भी बहन असुरक्षित हो गई तो आपकी यह बहन भी किसी के नीच कर्म से असुरक्षित हो सकती है। आपसे कोई अन्य बहन न डरे और अन्य किसी भाई से आपकी इस बहन को कोई डर न हो, यही राखी का मर्म है। कोई भी पर्व अनादि नहीं है कोई भी पर्व अनादि नहीं है, न ही आदिकालीन है। सभी पर्व मध्यकाल अर्थात् द्वापरयुग से प्रारंभ हुए हैं।
आदिकाल में तो नारी इतनी सशक्त थी कि उसे किसी से रक्षा की कारूरत ही नहीं थी। नारायण से भी पहले जिनका नाम आता है, उन श्रीलक्ष्मी को बिना पर्दे के, भरे दैवी दरबार में देव-पुरुषों के बीच नारायण के संग बैठे दिखाया जाता है क्योंकि वहाँ कुदृष्टि-वृत्ति का कोई भय ही नहीं था। द्वापरयुग में भी प्रारंभ में नारी सुरक्षित थी। फाह्यान, ह्वेनसांग आदि विदेशी यात्रियों के वर्णनों से स्पष्ट पता चलता है कि उस समय के भारत में कोई नारी अकेली, आधी रात को भी जेवर पहने, जंगल से भी गुजरे तो भी बाल-बांका नहीं होता था। घरों में ताले नहीं लगते थे, तामसिक खान-पान नहीं था, राजा-प्रजा का पिता-पुत्र जैसा नाता था। पर विदेशी आक्रमण के समय (द्वापर का अंत और कलि का आरंभ) से मूल्यों में गिरावट आई, जो कलियुग के अंत तक पूर्ण पतन में बदल गई। जन्म देने से बड़ा हो गया संहार करना
जब विधर्मी और विदेशियों के साथ युद्ध करने पड़े तो युद्धों में पुरुषों के शारीरिक बल का बोलबाला हो जान्के कारण उसकी भूमिका ऊँची मानी जाने लगी और कोमलांगी नारी दूसरे दर्जे की बना दी गई। नारी जन्म देती है और युद्ध में सहार होता है। कैसी विडंबना है कि जन्म देने वाली की भेंट में युद्ध में संहार करने वालों की महिमा होने लगी। जन्म देने से बड़ा कार्य हो गया संहार करना। कमकाोर नारी ने ईश्वर को पुकारा पर वह समय भगवान के सृष्टि पर अवतरित होने का नहीं था इसलिए ऐसे सहारे को, ऐसे संबंध को सामने लाया गया जो नजदीक हो, आयु में भी समकक्ष हो और नारी की इज्जत पर भी हाथ ना डाले। यूं तो पिता का नाता भी पवित्र है, पुत्र का नाता भी पवित्र है पर पिता पिछली पीढ़ी का और पुत्र अगली पीढ़ी का प्रतीक है। बूढ़े और बच्चे से रक्षा करवाई नहीं जाती, की जाती है इसलिए समकक्ष पीढ़ी वाले भाई को ही इस जिम्मेवारी के अनुकूल माना गया।
शिक्षा कहती है, बचपन में पिता, जवानी में पति और बुढ़ापे में पुत्र, नारी की रक्षा करे। परंतु ये हद के रिश्ते हैं और हद के जीवन के भरण-पोषण की बात इनके द्वारा कही गई है। बेहद के दृष्टिकोण से देखें तो हम हर किसी को पिता, पति, पुत्र नहीं बना सकते पर हर एक आत्मिक नाते से भाई-भाई हैं और दैहिक नाते से बहन-भाई हैं इसलिए राखी का संबंध, रक्षा का संबंध भाई से जोड़ दिया गया।
असुरक्षित समाज में जी रहे हैं हम वर्तमान समय सुरक्षा के नाम पर रक्षा मंत्रालय बना हुआ है पर उसके प्रभारी रक्षामंत्री की रक्षा की भी कोई गारंटी थोड़े ही है। सुरक्षा के नाम पर पुलिस और सेना पर देश के बजट का एक बड़ा भाग व्यय होने पर भी देश के अन्दर या सीमा पर पूर्ण सुरक्षा की कोई गारंटी नहीं है। हम एक ऐसे असुरक्षित समाज में जी रहे हैं जहाँ काल आकर कभी भी किसी को दबोच सकता है। ऐसे में हमारे धन, धर्म, शरीर और सम्मान की रक्षा की किाम्मेवारी कौन ले सकता है?
ब्राह्मणों और बहनों का स्वार्थ
प्राचीनकाल में ब्राह्मण लोग यजमानों और राजाओं को राखी बाँधते थे। उस समय के ब्राह्मण पवित्र रहते थे, वे अनासक्त थे। राखी के बदले राजा से स्थूल प्राप्ति की कामना नहीं रखते थे। राजा बलि की कहानी में प्रसंग है कि जब वामन रूपधारी भगवान ने केवल तीन पैर पृथ्वी दान में माँगी तो राजा बलि ने कहा, ब्राह्मण, तुम क्या माँग रहे हो, मैं राजा हूँ, कम से कम मेरी हैसियत के अनुसार तो माँग। तब वामन रूपधारी भगवान ने कहा, ब्राह्मण को उतना ही लेना चाहिए, जितनी उसको आवश्यकता है, नहीं तो ब्राह्मणत्व कलंकित हो जाता है। परंतु धीरे-धीरे ब्राह्मण भी गृहस्थी बनते चले गए। बहुतों ने तो ब्राह्मण-कर्म छोड़ ही दिया, जो थोड़ा बहुत बचा है, उसमें भी परहित के स्थान पर स्वहित अर्थात् स्वार्थ आ गया है। अब राखी के बदले यजमान से बुराइयाँ त्याग कराने के बजाय मनचाहा धन पाना ही उद्देश्य रह गया है। वर्तमान समय बहनों ने भी, राखी के बदले भाइयों से धन-प्राप्ति का लक्ष्य बना लिया है। अब वे भी इस बात के लिए चिन्तित नकार नहीं आती कि उनके भाई की दृष्टि-वृत्ति कैसी है बल्कि इस बात में ज्यादा रुचि लेने लगी हैं कि राखी के बदले उन्हें कितना धन मिलने वाला है।
मर्यादा की रक्षा ही स्वयं की रक्षा
जब ब्राह्मण और बहनें, दोनों ही अपने कत्र्तव्य से विमुख हो जाते हैं और मूल्यों में ऐसी गिरावट आ जाती है तो इस गिरे हुए समाज को पुन सिरताज और ऊँच बनाने के लिए स्वयं भगवान को अवतरित होना पड़ता है और वे मानव मात्र (चाहे ी चाहे पुरुष) को मर्यादा तथा पवित्रता की पालना करने के लिए प्रतिज्ञाबद्ध करते हैं। यह रक्षा-सूत्र उसी प्रतिज्ञा का प्रतीक है। जैसे यादगार शा रामायण में सीता के सामने लकीर खींची गई थी कि इससे बाहर पाँव मत निकालना, नहीं तो रावण ले जायेगा, यह रक्षा-सूत्र भी इसी प्रकार एक प्रतीक है कि इससे जुड़ी पवित्रता की प्रतिज्ञा को मत तोड़ना, नहीं तो कोई भी रक्षा नहीं करेगा। मानव की रक्षक उसकी मर्यादा है। कहा गया है, तुम मर्यादा की रक्षा करो, मर्यादा तुम्हारी रक्षा करेगी।
भगवान को कहा जाता है कि वे करनहार भी हैं और करावनहार भी। वे राखी बाँधने के लिए ऐसी आत्माओं को निमित्त बनाते हैं जो बहन और ब्राह्मण दोनों का कत्र्तव्य निभाती हैं, जो पवित्र कन्यायें भी हैं और उच्च महान धारणाओं में सच्चे ब्राह्मण समान भी हैं। जो निॢवकारी भी हैं और अनासक्त भी। ऐसी बहनें हैं ब्रह्माकुमारी बहनें जो भगवान का प्रतिनिधि बनकर, जन-जन को राखी बाँध उनसे विकारों और बुराइयों का दान लेती हैं।
तिलक और मिठाई
इस दिन राखी के साथ-साथ मस्तक पर तिलक लगाने की भी प्रथा है। यह तिलक विजय का प्रतीक है। जब हम आत्म-स्वरूप में टिककर दूसरे को भी आत्मा की नकार से देखते हैं तो बुराइयों पर हमारी विजय निश्चित है।
मीठी वाणी का प्रतीक है मिठाई। मीठी वस्तु खाने के दो-चार मिनट बाद मुख पुन फीका हो जाता है पर मीठा बोल लंबे समय तक हमारे मन को मीठा रखता है। इस प्रकार रक्षाबंधन के वास्तविक रहस्य को जानकर इसे मनायेंगे तो यह सच्चे अर्थों में विषतोडक़ पर्व सिद्ध होगा।
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राजयोगिनी दादी जानकी
मुख्य प्रशासिका, ब्रह्माकुमारीज
Editorial Review Note
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