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क्यों पसंद है धन की देवी लक्ष्मी जी को उल्लू की सवारी ?

क्यों पसंद है धन की देवी लक्ष्मी जी को उल्लू की सवारी ?

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क्यों पसंद है धन की देवी लक्ष्मी जी को उल्लू की सवारी ?

क्यों पसंद है धन की देवी लक्ष्मी जी को उल्लू की सवारी ?

भारतीय सांस्कृतिक में उल्लू को बहुत महत्व दिया जाता है, क्योंकि यह पक्षी मां लक्ष्मी का वाहन है।उल्लू को किसी भी धर्मग्रंथ में मूर्ख नहीं माना गया है। लिंगपुराण में कहा गया है कि नारदमुनि ने मानसरोवरवासी उलूक से संगीत शिक्षा ग्रहण करने के लिए उपदेश दिया था।

वाल्मीकि रामायण में उल्लू को मूर्ख के स्थान पर अत्यन्त चतुर कहा गया। भगवान श्रीराम जब रावण को मारने में सफल नहीं हो पाते उसी समय उनके पास रावण का भाई विभीषण आता है। तब सुग्रीव राम से कहते हैं कि उन्हें शत्रु की उलूकचतुराई से बचकर रहना चाहिए।

ऋषियों ने गहरे अवलोकन तथा समझ के बाद ही उलूक को श्रीलक्ष्मी का वाहन बताया था। उन्हें मालूम था कि पाश्चात्य संस्कृति में भी उल्लू को विवेकशील माना है। तंत्र शास्त्र अनुसार जब लक्ष्मी एकांत, सूने स्थान, अंधेरे, खंडहर, पाताल लोक आदि स्थानों पर जाती हैं, तब वह उल्लू पर सवार होती हैं। तब उन्हें उलूक वाहिनी कहा जाता है।

एक पौराणिक मान्यता है कि लक्ष्मीजी समुद्र से प्रकट हुई और भगवान विष्णु की सेवा में लग गईं। लक्ष्मीजी का स्वभाव चंचल माना गया। इसलिए उनकी आराधना व उपयोग के मामले में भी सावधानी की आवश्यकता होती है। लक्ष्मी का वाहन उल्लू स्वभाव से रात में देखने में सक्षम होता है। उल्लू अज्ञान का प्रतीक है। वह अंधकार में ही जाग्रत होता है। लक्ष्मी उल्लू पर बैठी है, इसका अर्थ यह है कि वे अज्ञान की सवारी करती हैं और सही ज्ञान को जाग्रत करने में सहयोगी होती हैं।यदि लक्ष्मी का उपयोग अज्ञान के साथ होगा तो वह भोग और नाश तक ही सीमित रह जाएगा। यदि ज्ञान के साथ होगा तो दान व परोपकार की दिशा में लगेगा। संकेत यही है कि रीति से कमाया हुआ धन नीति से खर्च करें। 

भगवान विष्णु की प्रिय लक्ष्मी गुरुड़ पर बैठकर अपने भक्त के यहां धार्मिक कृत्य होने पर सदा आती हैं। परंतु जब कोई मात्र लक्ष्मी का ही ध्यान करता है। सतर्माग को छोड़कर, सामदामदण्ड का भेद से मात्र लक्ष्मी को ही जीवन का उद्देश्य बना लेता है तो वह व्यक्ति चरित्रहीन होकर श्री हीन हो जाता है। ऐसे व्यक्ति के यहां लक्ष्मी उल्लू पर बैठकर अकेली ही आती है। उल्लू अमंगल कारक पक्षी है। जबकि गरुड़ जी सर्व अमंगलों के नाशक हैं। तथा भगवान विष्णु तथा लक्ष्मी जी के परम पुनीत वाहन है।

अत:जहां जपपूजा पाठ, देव पितृ कर्म दान पुण्य व अतिथि सत्कार होता हैं वहां लक्ष्मी विष्णु सहित गरुड़् जी पर सवार होकर पघाटी है और जहां अनाचार, पापाचार, अत्याचार, शराब, वेश्यामगन डॉक्टर, वकील व मुकद्दमेबाजी में रुपया खर्च हो तो जानों की लक्ष्मी अकेली उल्लू पर बैठकर आयी हैं।

ज्योतिषाचार्य पण्डित दयानन्द शास्त्री ने बताया कि देवी महालक्ष्मी जी मूलतः शुक्र ग्रह की अधिष्टात्री देवी हैं तथा लक्ष्मी जी की हर सवारी गरुड़, हाथी, सिंह और उल्लू सभी राहू घर को संबोधित करते हैं। कालपुरुष सिद्धांत के अनुसार शुक्र धन और वैभव के देवता हैं और व्यक्ति की कुण्डली में शुक्र धन और दाम्पत्य के स्वामी है।

कामपुरुष सिद्धांत के अनुसार राहू को पाताल का स्थान प्राप्त है तथा कुण्डली में राहू का पक्का घर छठा स्थान होता है और राहू को कुण्डली के भाव नंबर आठवें, तीसरे और छठे में श्रेष्ठ स्थान में माना गया है। कुण्डली में काला धन अथवा छुपा हुआ धन छठे और आठवें भाव से दिखता है।

लक्ष्मीजी को उल्लू को वाहन बनाने के पीछे यह कथा

एक बार सभी देवी देवता अपना अपना वाहन चुन रहे थे। जब लक्ष्मी जी की बारी आई तो वे सोचने लगीं कि किसे अपना वाहन चुनें। लक्ष्मी जी जब अपना वाहन चुनने में सोचविचार कर रहीं थीं उतनी देर में पशुपक्षी लक्ष्मी जी का वाहन बनने की होड़ में आपस में लड़ाई करने लगे। इस पर लक्ष्मी जी ने उन्हें चुप कराया और कहा कि प्रत्येक वर्ष कार्तिक अमावस्या के दिन मैं पृथ्वी पर विचरण करने आती हूं। उस दिन मैं आप में से किसी एक को अपना वाहन बनाऊंगी।

कार्तिक अमावस्या के रोज सभी पशुपक्षी आंखें बिछाए लक्ष्मी जी की राह निहारने लगे। रात्रि के समय जैसे ही लक्ष्मी जी धरती पर पधारी उल्लू ने अंधेरे में अपनी तेज नजरों से उन्हें देखा और तीव्र गति से उनके समीप पंहुच गया और उनसे प्रार्थना करने लगा की आप मुझे अपना वाहन स्वीकारें।

लक्ष्मी जी ने चारों ओर देखा उन्हें कोई भी पशु या पक्षी वहां नजर नहीं आया तो उन्होंने खुशीखुशी उसे अपना वाहन स्वीकार कर लिया। लक्ष्मी जी ने उल्लू को अपना वाहन बनाकर धरती की परिक्रमा की और तब से लक्ष्मी जी का वाहन उल्लू हो गया।

  • भारतीय सांस्कृतिक उल्लू को बहुत महत्व दिया जाता है, क्योंकि यह पक्षी मां लक्ष्मी जी का वाहन है।
  • उल्लू को किसी भी धर्म ग्रंथ में मूर्ख नहीं माना गया है यानी उल्लू, उल्लू नहीं है। लिंगपुराण में (2, 2.7-10) कहा गया है कि नारद मुनि ने मानसरोवरवासी उलूक से संगीत शिक्षा ग्रहण करने के लिए उपदेश लिया था। इस उलूक की हू हू हू सांगीतिक स्वरों में निकलती थी।
  • वाल्मीकि रामायण (6.17.19) में उल्लू को मूर्ख के स्थान पर अत्यन्त चतुर कहा गया। भगवान श्रीराम जब रावण को मारने में सफल नहीं हो पाते उसी समय उनके पास रावण का भाई विभीषण आता है। तब सुग्रीव राम से कहते हैं कि उन्हें शत्रु की उलूकचतुराई से बचकर रहना चाहिए।
  • ऋषियों ने गहरे अवलोकन तथा समझ के बाद ही उलूक को श्रीलक्ष्मी का वाहन बताया था।उन्हें मालूम था कि पाश्चात्य संस्कृति में भी उल्लू को विवेकशील माना है।
  • तंत्र शास्त्र अनुसार जब लक्ष्मी एकांत, सूने स्थान, अंधेरे, खंडहर, पाताल लोक आदि स्थानों पर जाती हैं, तब वह उल्लू पर सवार होती हैं। तब उन्हें उलूक वाहिनी कहा जाता है। उल्लू पर विराजमान लक्ष्मी अप्रत्यक्ष धन अर्थात काला धन कमाने वाले व्यक्तियों के घरों में उल्लू पर सवार होकर जाती हैं।
  • आजकल कुछ  लोग इन दुर्लभ प्रजाति के उल्लुओं के पंख और नाखून आदि को लेकर तांत्रिक कार्य करने लगे हैं।
  • कुछ लोग तो उल्लू की बलि दीपावली की रात को चढ़ाते हैं जिसकी वजह से इस पक्षी पर संकट और भी गहरा हो गया है। ऐसा  करने से रही सही लक्ष्मी भी दूर चली जाती है और व्यक्ति पहले से भी गहरे संकट में फसता जाता है।
  • रहस्यमी प्राणी जब पूरी दुनिया सो रही होती है तब यह उल्लू जागता है। उल्लू अपनी गर्दन को 170 अंशतकघुमासकताहै।
  • रात्री में उड़ते वक्त ये  पंख की आवाज नहीं निकालता है और इसकी आंखें कभी भी नहीं झपकती है। उल्लू का हू हू हू करना एक उच्चारण मंत्र है।

जानिए उल्लू के प्रभाव (लाभ और हानि)

भारत में प्रत्येक परिवार में उल्लू शुभ व अशुभ दायरे में विद्यमान है। कहते हैं कि उल्लू को संकट से पूर्व में ही अनुभव हो जाता है। इसलिए इसे अपशकुन का प्रतीक माना जाता है।

ज्योतिर्विद पण्डित दयानन्द शास्त्री ने बताया कि उल्लू के निम्र संकेतों को शुभ व लाभदायक माना है।

कहते हैं कि यदि किसी रोगी व्यक्ति को प्राकृतिक रूप से उल्लू छूले तो वह शीघ्र ही स्वस्थ हो जाता है।

सुबहसवेरे उल्लू की वाणी सुनना लाभदायक व मंगलकारी है।

यदि उल्लू किसी गर्भवती औरत को छूता है तो पुत्री होने का संकेत है।

पूर्व दिशा में और वृक्ष पर बैठे उल्लू को देखने और उसकी आवाज सुनने वाले व्यक्ति को धनलाभ होता है।

दक्षिण दिशा में उल्लू की आवाज सुनने पर उस व्यक्ति के शत्रुओं का नाश होता है।

उल्लू का प्राकृतिक स्पर्श पाने वाले व्यक्ति का जीवन सुख ऐश्वर्य से व्यतीत होता है।

यदि यात्रा करते समय उल्लू पीछे उड़ रहा हो या आवाज कर रहा हो तो यात्रा शुभ होती है। यदि उल्लू  उत्तर दिशा की ओर आवाज करे तो सुनने वाले को भयंकर बीमारी होने की संभावना होती है।

रात को यदि उल्लू पास बैठकर आवाज करे तो यह मंगल कार्य का सूचक होता है।

उल्लू यदि किसी विशेष स्थान पर आकर रोजरोजरोएतोयहभयंकरदुखदायीघटनाकासूचकहै।

यदि उल्लू घर के आंगन में मरा मिले तो पारिवारिक कलह का सूचक है।

पश्चिम दिशा की ओर बैठे उल्लू की आवाज सुनने वाले व्यक्ति को भयंकर धन हानि होती है।

चीनी वास्तु शास्त्र फेंगशुई में उल्लू को सौभाग्य और सुरक्षा का भी पर्याय माना जाता है। जापानी लोग उल्लू को कठिनाइयों से बचाव करने वाला मानते हैं। उल्लू को निशाचर यानी रात का प्राणी माना जाता है और यह अंधेरी रात में भी न सिर्फ देख सकता है बल्कि अपने शिकार पर दूर दृष्टि बनाए रख सकता है।

तंत्र शास्त्र के अनुसार लक्ष्मी वाहन उल्लू रहस्यमयी शक्तियों का स्वामी है। प्राचीन ग्रीक में उल्लू को सौभाग्य और धन का सूचक माना जाता था। यूरोप में उल्लू को काले जादू का प्रतीक माना जाता है। भारत में उल्लूक तंत्र सर्वाधिक प्रचलित है।

इस प्रकार उल्लू हमेशा हमें शुभ और अशुभ संकेत देकर सतर्क करते है।

जानिए उल्लू के मुख्य गुण

उल्लू के अंदर 5 प्रमुख गुण होते हैं :  उल्लू की दृष्टि बहुत तेज होती है। दूसरा गुण है उसकी नीरवउड़ान> तीसरा गुण इस में शीत ऋतु में भी उड़ने की क्षमता। चौथी है उसकी विशिष्ट श्रवणशक्ति। पांचवीं योग्यता बहुत धीमे उड़ने की भी योग्यता। इन्हीं गुणों के कारण ये अन्य सभी पक्षियों से अलग है। उसकी इसी योग्यता को देखकर ही अब वैज्ञानिक इसी तरह का विमान बनाने में लगे हुए हैं।

उल्लू ही एक ऐसा पक्षी है जो किसानों के लिए अच्छा साबित हो सकता है।

इसके खेत में होने के कारण खेत में सांप,चूहे, बिच्छू आदी नहीं आ सकते।और छोटे मोटे कीड़ो के लिए भी उल्लू एकदम हानिकारी पक्षी है। हमारे देश में लगभग साठ जातियों के उल्लू पाए जाते हैं।

 

 

लेखक – ज्योतिषाचार्य पण्डित दयानन्द शास्त्री

RW

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By Religion World October 27, 2018 8 min read
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