शाही स्नान क्या है और इसका इतिहास क्या है?

एक बार फिर प्रयागराज की पावन भूमि पर साधु संतों से लेकर आम जनमानस का जमावड़ा होने वाला है। कुंभ जिसका शाब्दिक अर्थ होता है घड़ा। कुंभ को मात्र एक घड़े से अलंकृत करना इसके महत्व एवं पराकाष्ठा को कम आंकने जैसा है।
ऐसा कुम्भ जो भारतीयों की धार्मिक सांस्कृतिक सामाजिक और राजनीतिक भावनाओं से लबालब भरा हुआ है जिस प्रकार पानी की बूंद से घड़ा भरता है उसी प्रकार प्रयागराज में लगने वाला कुंभ जल रूपी भावना एवं रहस्य से भरा हुआ है चलिए जाननेे का प्रयास करते हैं इन भावनाओ एवं परंपराओं को जानने की जिज्ञासा हर किसी के अन्तःमन में होती है।
शाही स्नान क्या है इस स्नान का इतिहास क्या है?

शाही स्नान जिसे राजयोग स्नान भी कहते हैं इसकी शुरुआत 14 वीं से 16वीं शताब्दी में हुई। अर्थात शाही स्नान वैदिक नहीं बल्कि एक परंपरा है। 14वीं शताब्दी के आसपास विदेशी आक्रांताओं द्वारा भारत पर अपना सिक्का जमाना शुरू हुआ। भारत में किसी भी प्रकार की केंद्रीय सत्ता का अभाव था। सभी राज्य के खेमे बने हुए थे, जो किसी भी प्रकार से अपने राज्य की रक्षा करना चाहते थे। इस प्रकार राज्य की रक्षा करने के लिए साधु संतों से रक्षा की गुहार लगाई गई। बदले में उन्हें राज सुख सुविधाएं प्रदान करने का वादा किया गया । संतों का प्रतिनिधित्व भी किसी संत विशेष के हाथ में था, इसलिए राजा और धर्म प्रतिनिधि में संधि होती थी और बदले में संतों द्वारा राष्ट्र की रक्षा का वचन दिया गया। राजाओं द्वारा दी गई भौतिक सुख सुविधाओं के लिए रोजमर्रा के संन्यास जीवन में कोई उपयोग नहीं था। इसलिए उपहार या स्नेह से राजाओं द्वारा दिए गए तोहफे कुछ खास मौकों पर ही काम आते थे। सोने चांदी के सामान, या हाथी घोड़ें का उपयोग संत केवल किसी खास मेले आदि में ही कर पाते थे। यही से आगाज होता है शाही स्नान परंपरा का। विभिन्न अखाड़ों से ताल्लुक रखने वाले साधु संत सोने चांदी की पालकी हाथी घोड़े के साथ पवित्र नदी में नियत तिथि पर स्नान करते हैं।
राजाओं के समय से चली आ रही दान की परंपरा से संतों को जमीन और धन प्राप्त होते थे। आज कुम्भ में महत्वपूर्ण तेरह अखाड़ों को विशिष्ट सम्मान प्राप्त है। शैव, वैष्णव एवं उदासीन पंथ के मान्यता प्राप्त कुल 13 अखाड़े हैं। वैसे अखाड़ा शब्द मुगल काल से शुरू हुआ था।अखाड़ा का अर्थ वो स्थान जहां पहलवान अपनी कसरत करते थे। संतों के अखाड़ो में साधुओं का वह दल होता था जो शस्त्र विद्या में भी पारंगत हो।
- प्रयागराज से अर्चना की रिपोर्ट
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