रामलीला विशेष: जानिये क्यों नहीं होती इस गांव में रामलीला
देशभर में इस समय रामलीलाएं चल रही हैं। 8 अक्टूबर को दशहरे पर असत्य पर सत्य की जीत के रूप में रावण के पुतला दहन भी किया जाएगा। लेकिन उत्तर प्रदेश के बागपत जिले के बड़ागांव उर्फ रावण में न तो रामलीला का मंचन होता है और न ही दशानन का पुतला दहन किया जाता है।
इस गांव के लोग रावण दहन को अशुभ मानते हैं, मान्यता है कि इस गांव से लंकापति का सीधे तौर पर जुड़ाव रहा है, जिसके कारण गांव का नाम रावण पर रखा गया है। इसके अलावा और भी कई तरह की किवदंतियां हैं, जिस कारण यहां रावण का आदर किया जाता है।
बागपत जनपद के राजस्व रिकॉर्ड में भी इस गांव का नाम रावण उर्फ बड़ागांव दर्ज है। गांव के ऊंचे टीले पर बने मां मनसा देवी मंदिर से तो लंकापति रावण का सीधा नाता बताया जाता है। किवदंती है कि लंकापति रावण अपनी ससुराल से मां मनसा देवी की मूर्ति लेकर लंका के लिए चला था।

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मां मनसा देवी ने उसके सामने शर्त रखी थी कि उनकी मूर्ति को वे रास्ते में कहीं भी जमीन पर नहीं रखेगा और लंका में ले जाकर ही कंधे से उतारेगा। यदि रास्ते में कहीं भी कहीं भी मूर्ति को जमीन पर रखा तो वे वहीं पर विराजमान हो जाएंगी।
लंकापति रावण ने मनसा देवी की इस शर्त को स्वीकार कर लिया और उन्हें लेकर लंका के लिए चल पड़ा। बागपत के बड़ागांव के पास रावण को तेज लघुशंका लगी, जिस कारण रावण को देवी की मूर्ति को वहीं टीले पर रखनी पड़ी। वापस आने पर रावण ने जब मंशा देवी माता की मूर्ति उठानी चाही तो वह उससे नहीं उठी।
लंकापति रावण ने देवी की मूर्ति उठाने के तमाम जतन किए लेकिन सफल नहीं हो पाया, तब माता ने उन्हें शर्त याद दिलाई।
इसके बाद लंकापति रावण माता की मूर्ति को वहीं पर छोड़कर लंका के लिए प्रस्थान कर गया, तभी से इस टीले पर मां मनसा देवी का मंदिर बना हुआ है। काफी अरसे तक इस मंदिर में माता की वही मूर्ति विराजमान रही। इसके बाद वह खंडित हो गई।
ग्रामीणों ने उसकी जगह वहां संगमरमर की नई मूर्ति विराजमान करा दी। गांव का नाम लंकापति रावण से जुड़ा होने के कारण ग्रामीण उनके पुतले के दहन को अशुभ मानते हैं। इसलिए गांव में रामलीला का मंचन भी नहीं होता है। गांव के बुजुर्गों का कहना है कि गांव में न तो रामलीला का मंचन होता है और न ही रावण के पुतले का दहन। इसका एक बड़ा कारण यह भी है कि उनके गांव की पहचान रावण के नाम से है।
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