लोहड़ी का त्यौहार अहम त्योहारों में से एक है. वैसे तो इसकी धूम देश के कई राज्यों में देखने को मिलती है है लेकिन पंजाब में लोहड़ी का उत्साह देखते ही बनता है. पंजाब में इस पर्व को नयी फसलों से जोड़कर भी देखा जाता है.
जानें क्या है लोहड़ी का अर्थ

लोहड़ी का अर्थ है- ल (लकड़ी), ओह (गोहा यानी सूखे उपले), ड़ी (रेवड़ी)। लोहड़ी के पावन अवसर पर लोग मूंगफली, तिल व रेवड़ी को इकट्ठठा कर प्रसाद के रूप में इसे तैयार करते हैं और आग में अर्पित करने के बाद आपस मे बांट लेते हैं। जिस घर में नई शादी हुई हो या फिर बच्चे का जन्म हुआ हो वहां यह त्योहार काफी उत्साह व नाच-गाने के साथ मनाया जाता है।
लोकगीत गाकर दुल्ला भट्टी को करते हैं याद

सुंदर मुंदरिए हो, तेरा कौन विचारा हो, दुल्ला भट्टी वाला हो, दुल्ले दी धी बयाही हो..। लोहड़ी का यह सबसे लोकप्रिय गीत है। लोहड़ी जैसे ही आने वाली होती है तो यही गीत के बोल हर किसी की जुबां पर होते हैं। इस लोकगीत से एक पुरातन कहानी भी जुड़ी हुई है। इस पुरानी कहानी में दुल्ला भट्टी नाम के एक डाकू ने पुण्य का काम किया था। ऐसा कहा जाता है कि सुंदर व मुंदर नाम की दो लड़कियां थी और वह अनाथ थीं। इन लड़कियों के चाचा ने दोनों को किसी शक्तिशाली सूबेदार को सौंप दिया था।
दुल्ला भट्टी नाम के डाकू को जब इस बात का पता चला तो उसने सुंंदर व मुंदर दोनों लड़कियों को मुक्त करवाया और दो अच्छे लड़के ढूंढकर इनकी शादी करवा दी। कहा जाता है कि जब इन दोनों लड़कियोंं की शादी हुई थी तो आसपास से लकडि़यां एकत्रित कर आग जलाई गई थी और शादी में मीठे फल की जगह गुड़, रेवड़ी व मक्के जैसी चीजों का इस्तेमाल किया था। उसी समय से दुल्ला भट्टी की अच्छाई को याद करने के लिए यह त्योहर मनाया जाता है। दुल्ला भट्टी कहने को तो एक डाकू था, लेकिन अमीर व घूसखोरी करने वाले लोगों से पैसे लूटकर गरीबों में बांट दिया करता था।
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ऐसे की जाती है पूजा

लोहड़ी पर्व की रात को परिवार व आसपड़ोस के लोग इकट्ठे होकर लकड़ी जलाते हैं। इसके बाद तिल, रेवड़ी, मूंगफली, मक्का व गुड़ अन्य चीजेेंं अग्नि को समर्पित करते हैं। इसके बाद परिवार के लोग आग की परिक्रमा कर सुख-शांति की कामना करते हैं। अग्नि परिक्रमा की पूजा के बाद बचे हुए खाने के सामान को प्रसाद के रूप में सभी लोगों को वितरित किया जाता है।
लोहड़ी पर्व का धार्मिक महत्व

माना जाता है कि इस दिन धरती सूर्य से अपने सुदूर बिन्दु से फिर दोबारा सूर्य की ओर मुख करना प्रारम्भ कर देती है। यह पर्व खुशहाली के आगमन का प्रतीक भी है। साल के पहले मास जनवरी में जब यह पर्व मनाया जाता है उस समय सर्दी का मौसम जाने को होता है। इस पर्व की धूम उत्तर भारत खासकर पंजाब, हरियाणा और दिल्ली में ज्यादा होती है।
कृषक समुदाय में यह पर्व उत्साह और उमंग का संचार करता है क्योंकि इस पर्व तक उनकी वह फसल पक कर तैयार हो चुकी होती है जिसको उन्होंने अथक मेहनत से बोया और सींचा था। पर्व के दिन रात को जब लोहड़ी जलाई जाती है तो उसकी पूजा गेहूं की नयी फसल की बालों से ही की जाती है।
इस दिन जगह−जगह युवक एकत्रित होकर ढोल की थाप पर भांगड़ा करते हैं और एक दूसरे को लोहड़ी की बधाइयां देते हैं। महिलाएं भी खेतों की हरियाली के बीच अपनी चुनरी लहराते हुए उमंगों को नयी उड़ान देती हुई प्रतीत होती हैं। महिलाएं इस पर्व की तैयारी कुछ दिन पहले से ही शुरू कर देती हैं और समूहों में एकत्रित होकर एक दूसरे के हाथों में विभिन्न आकृतियों वाली मेहंदी रचाती हैं।
पंजाब में नई बहू और नवजात बच्चे के लिए तो लोहड़ी का विशेष महत्व होता है। इस दिन रेवड़ी और मूंगफली वितरण के साथ ही मक्के की रोटी और सरसों के साग का भोज भी आयोजित किया जाता है।शहर चाहे कोई भी हो, सुबह से ही गुरुद्वारों में श्रद्धालु एकत्रित होना शुरू हो जाते हैं। शाम को कहीं डीजे पार्टी का आयोजन कर तो कहीं भांगड़ा आदि का आयोजन कर जमकर मस्ती की जाती है।
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