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जल और ज्योतिष शास्त्र का सम्बंध

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जल और ज्योतिष शास्त्र का सम्बंध

जल और ज्योतिष शास्त्र का सम्बंध

वैदिक ज्योतिष शास्त्र के अनुसार जल का किस ग्रह से है गहरा संबंध, प्रयोग के नियम भी जान लें। सभी बारह राशियों को तत्वों के आधार पर चार भागों में बाँटा गया है. यह चार तत्व अग्नि,पृथ्वी, वायु तथा जल है. जो राशि जिस तत्व में आती है उसका स्वभाव भी उस तत्व के गुण धर्म के अनुसार हो जाता है।

ज्योतिषाचार्य पण्डित दयानन्द शास्त्री जी ने बताया कि कर्क, वृश्चिक एवं मीन राशि का तत्व जल है. जल-तत्व में ग्रहण करने की क्षमता होती है, इसलिए जल-तत्व प्रधान राशियों में आत्मविश्लेषण, खोज एवं ग्रहण करने का विशेष गुण होता है। इन तीन रशियों में जल के स्वभाव भी हैं। साथ ही इन राशियों का चंद्रमा से गहरा संबंध होता है। जल तत्त्व से संबंध रहने के कारण इन राशियों में ज्ञान, उदारता और कल्पना शक्ति की अधिकता होती है। ऐसा माना जाता है कि ये राशियां जिस कार्य में जुट जाती हैं, उसमें सफलता की प्रबल संभावना होती है।

उदाहरण के लिए किसी जातक की राशि जलतत्व है तब उसके स्वभाव में जल के गुण पाएं जाएंगे जैसे कि वह स्वभाव से लचीला हो सकता है और परिस्थिति अनुसार अपने को ढालने में सक्षम भी हो सकता है।

चन्द्रमा सौम्य ग्रह हैं। इसमें जल तत्व है। इसका रंग सफेद हैं। यह स्त्री प्रधान हैं। इसमें वैश्य और ब्राह्मण के तत्व मौजूद हैं। इसकी दिशा उत्तर पश्चिम हैं।

जीवन के निर्माण के लिए पांच तत्वों की आवश्यकता होती है. उसमे से एक महत्वपूर्ण तत्व, जल तत्त्व है. जल मूर्त वस्तुओं में सबसे ज्यादा मूल्यवान और चमत्कारी है. जल से केवल व्यक्ति का जीवन ही नहीं चलता, बल्कि उसकी भावनाएं, उसकी क्षमता और उसकी आध्यात्मिकता निर्धारित होती है। जल शरीर में पोषण संचार का कारक है और शुक्राणु जल में जीवित रहकर सृष्टि के विकास तथा निर्माण में सहायक होता है। अत: जल तत्व की कमी से आलस्य और तनाव उत्पन्न कर शरीर की संचार व्यवस्था पर विपरीत प्रभाव डालती है।

  • आप अपने घर अपने वाले मेहमानों को आप ठंडा पानी पिलाकर राहु को सही रख सकते हो।
  • रोज सुबह उठकर घर में लगे पौधों को पानी देने से आपकी कुंडली में बुध, शुक्र, सूर्य और चंद्रमा ग्रह अच्‍छे परिणाम देंगे।
  • घर का मंदिर किसी भी स्‍थिति में गंदा नहीं होना चाहिए। यदि ऐसा है तो आपका बृहस्‍पति कभी भी शुभ फल नहीं दे सकता।
  • आपके घर का मंदिर हर हाल में साफ-सुथरा रहना चाहिए।
  • देर रात तक जागने से चंद्रमा के अशुभ फल मिलते हैं।
  • बाथरूम में अनावश्‍यक पानी बिखेरना और गंदे कपड़े रखने से चंद्रमा रुष्ट रहता है। इससे चंद्रमा से कभी शुभ फल नहीं मिलता।

जीवन के निर्माण के लिए पांच तत्वों की आवश्यकता होती है. उसमे से एक महत्वपूर्ण तत्व, जल तत्त्व है. जल मूर्त वस्तुओं में सबसे ज्यादा मूल्यवान और चमत्कारी है. जल से केवल व्यक्ति का जीवन ही नहीं चलता, बल्कि उसकी भावनाएं, उसकी क्षमता और उसकी आध्यात्मिकता निर्धारित होती है।

जल की तरह नरम होगा तथा भावनाएँ भी कूट-कूटकर भरी होगी इसलिए शीघ्र भावनाओं में बहने वाला होगा.आज जानिए जल तत्व की अधिकता वाले जातकों के बारे में.

इन राशियों का चंद्रमा से गहरा संबंध होता है. जल तत्त्व से संबंध रहने के कारण इन राशियों में ज्ञान, उदारता और कल्पना शक्ति की अधिकता होती है ऐसा माना जाता है कि ये राशियां जिस कार्य में जुट जाती हैं, उसमें सफलता की प्रबल संभावना होती है.

जल तत्त्व से संबंधित राशियों से जुड़ी रोचक बातें

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार जल तत्व की पहली राशि कर्क है इस राशि का स्वामी ग्रह चंद्रमा है साथ ही यह राशि चंचल और सुंदर भी होती है. इस राशि में कल्पना, दया, सुन्दरता और ज्ञान ये चार गुण विशेष रूप से मौजूद होते हैं। यह चर राशि हैं। स्ञी गुण प्रधान, जल स्वभाव, लाल श्वेत मिश्रित वर्ण वाली, उच्चाभिलाषी, प्रगतिशील, गुर्दे, पेट का कारक राशि हैं। इसका स्वामी चन्द्रमा होता हैं।

इस राशि का एक कमजोर पक्ष भावुकता है इस राशि का वैवाहिक जीवन या प्रेम का जीवन अच्छा नहीं होता है. ज्योतिष के जानकारों के मुताबिक इस राशि कि ज्योतिषीय सलाह पर ओपल अथवा मोती धारण करना अच्छा होता है साथ ही शिव की उपासना करने से लाभ मिलते हैं.

जल तत्त्व की दूसरी राशि वृश्चिक है इस राशि का स्वामी मंगल है इस राशि का चंद्रमा बहुत कमजोर होता है. इस राशि में कला, लेखन, शिक्षा और राजनीति का अच्छा ज्ञान होता है ऐसा देखा गया है कि इस राशि के लोग अच्छे डॉक्टर भी होते हैं.ज्योतिष शास्त्र के अनुसार इस राशि वालों को प्रायः माता का सुख नहीं मिलता है। यह राशि एक स्थिर राशि हैं।यह राशि अर्ध जल राशि होने से दम्भी, जिद्दी, स्वाभिमानी, क्रुर और स्ञी के गुप्त अंगों की कारक राशि हैं। यह उत्तर दिशा की राशि हैं।

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इसके अलावा इस राशि वाले जातकों को जीवनसाथी अच्छा मिलता है इस राशि के जातकों में सबसे बड़ा अवगुण दूसरों से प्रतिशोद लेना होता है इस राशि के जातकों को ज्योतिषीय सलाह पर माणिक अथवा मूंगा धारण करना अच्छा होता है.

जल तत्त्व की तीसरी राशि मीन है. मीन राशि का स्वामी देव गुरु बृहस्पति हैं. इस राशि का चंद्रमा संतुलित होता है इस राशि में ज्ञान, कला और शिक्षा का अच्छा ज्ञान होता है इस राशि के लोग अच्छे हीलर होते हैं। यह राशि द्विस्वभावी राशि हैं। उत्तर दिशा की स्वामी, जल तत्व, दया, दाद की प्रतीक हैं। इस राशि के द्वारा पैरों का विचार किया जाता हैं। इस राशि का स्वामी गुरु होता हैं।

इस राशि के जातक प्रायः युवावस्था में भटक जाते हैं लेकिन बाद में सही राह पर आकर खूब तरक्की करते हैं इनकी तरक्की का अनुमान लगाना मुश्किल हो जाता है इस राशि में एक अवगुण होता है कि ये सब चीज को पसंद करते हैं ज्योतिषीय सलाह पर इन्हें पुखराज, मोती या पन्ना धारण करना चाहिए।

जल तत्व राशि या लग्न होने पर रुद्राभिषेक , जल में दूध प्रवाहित करना जैसे जल सम्बंधित उपाय ओर टोटके लाभकारी सिद्ध होते है।

जल को जादुई या चमत्कारी क्यों माना जाता है ?

  • जल,सकारात्मक और नकारात्मक, दोनों उर्जाओं को सोख सकता है.
  • यही वजह है कि जल को मंत्र से अभिमंत्रित करने की क्रिया की जाती है.
  • शरीर का जल तत्त्व ही आपको शक्तिशाली और दिव्य बना सकता है.
  • जल के प्रयोग से वास्तविक और काल्पनिक दोनों समस्याएं दूर की जा सकती हैं.
  • जीवन में जल का सही और संतुलित प्रयोग आपको स्वस्थ और विषमुक्त रखता है.
  • यह भावनाओं को बहने से नियंत्रित करता है और आपको आध्यात्मिक बनाता है.

वैदिक दर्शनों में ”यथा पिण्डे तथा ब्रहाण्डे का सिद्धांत प्रचलित है, जिसके अनुसार सौर जगत में सूर्य और चंद्रमा आदि ग्रहों की विभिन्न गतिविधियों एवं क्रिया-कलापों में जो नियम है वही नियम मानव शरीर पर है, जिस प्रकार परमाणुओं के समूह से ग्रह बनें हैं उसी प्रकार से अनन्त परमाणुओं जिन्हें शरीर विज्ञान की भाषा में कोशिकाएं कहते हैं हमारा शरीर निर्मित हुआ है। ग्रह नक्षत्रों तथा शरीर सतत संबंध में हैं उनकी स्थिति तथा परिवर्तन का प्रभाव पड़ता है, इसका साक्ष्य जलवायु परिवर्तन से महसूस किया जा सकता है।



पौराणिक आख्यानों में जल के जन्म के बारे में पहला ही जवाब मिला कि ‘ब्रह्मा की तरलता से जल बना।’ निश्चित रूप से पौराणिक आख्यान अथवा पुराण कथाएँ आदिम कथाओं से बहुत आगे की चीज हैं।

पौराणिक मानव ने कार्य-कारण विधि से विचार कर जल और अन्य मिथकों को बहुत अधिक व्यवस्थित रूप दिया। इस काल में सारे निकष तर्कपूर्ण तरीके से खोजे गये। आदिम मिथकों के संकेत मात्र इन कथाओं में और अधिक विस्तारित हुए। यही कारण है कि इन मिथकों पर लोगों का अधिक विश्वास देखा जाता है। लोग इन्हें सच की तरह लेते हैं और उस सच की पूजा करते हैं। प्रलय की कथा मूल रूप से जल की ही कथा है। अन्त में जल ही बचता है और फिर शुरु होती है सृष्टि बनने की नई कहानी। सृजन की नई संभावनाओं के बीज प्रलय के बाद जल में बचे होते हैं। ब्रह्मा की इच्छा से जल (नर) में विष्णु का जन्म हुआ। जल यानी नार ही जलायन हो गया, जो ‘नारायण’ कहलाया। नार यानी जल ही जिनका घर हो, वह ‘नारायण’ है।

‘क्षीरसागर के आदि जल में भगवान विष्णु शेषनाग की शैय्या पर आनन्दपूर्वक सोये थे। एक दिन उनके मन में यह भावना उत्पन्न हुई कि मैं ‘एक हूँ – अनेक हो जाऊँ।’ तभी उनकी नाभि से एक कमलनाल उत्पन्न हुआ, जिसके फूल में से ब्रह्मा का जन्म हुआ, जिसे प्रजापति कहा गया। इन प्रजापति ने समूची सृष्टि का निर्माण किया। ब्रह्मा ने देवताओं की सृष्टि करने के बाद जल के जीव उत्पन्न किये परन्तु उनके पास खाने के लिए कुछ न था, अतः वे ब्रह्मा के पास गये औऱ उन्होंने उनसे भोजन जुटाने की प्रार्थना की। आवश्यक प्रबन्ध करने के बाद ब्रह्मा ने अपनी संतान से कहा कि उन्हें जल की रक्षा करनी चाहिए। यह सुनकर जल के जीवों में से कुछ ने कहा कि वे जल की उपासना करेंगे औऱ दूसरों ने प्रजापति को जल की रक्षा का वचन दिया। इस पर प्रजापति ब्रह्मा ने जल के जीवों को दो जातियों में विभाजित कर दिया। जल की उपासना करने वालों को उन्होंने यक्ष कहा और जल की रक्षा करने वालों को राक्षस। (विश्व प्रसिद्ध मिथक एवं पुराण कथाएँ से)



भारतीय मिथकों में त्रिदेव-ब्रह्मा, विष्णु, महेश तीनों की सर्वाधिक महत्ता है। शिव सबसे अधिक लोकप्रिय और प्रमुख मिथक पात्र हैं। ऋग्वेद में शिव को रूद्र कहा गया है। प्रलय की कथा का लय अन्ततः जलराशि में होता है। हिमालय की सबसे ऊँची चोटी का केवल शिखर बचता है। जहाँ सृष्टि बीजों से भरी मात्र एक नाव मनु के साथ बचती है। धीरे-धीरे जल की बाढ़ उतरती जाती है। और पृथ्वी का भाग खुलता जाता है। अन्त में समुद्र और झीलों में पृथ्वी का तीन-चौथाई पानी रह जाता है। यही औसत जीवन के लिए सार्थक होता है और प्रलय के बाद दुनिया की फिर शुरुआत होती है। मनु-शतरुपा सर्वत्र बीज डालते हैं औऱ मनु से मनुष्य की उत्पत्ति होती है। यही कथा आदम और हव्वा के साथ दोहराई जाती है। आदम से आदमी बना। बाइबिल में सात दिन में सृष्टि बनने की कथा कही गई है। प्रथम दिन स्वर्ग और पृथ्वी का निर्माण हुआ।

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आश्चर्यजनक यह है कि बाइबिल में पृथ्वी से पहले स्वर्ग के निर्माण का नाम गिनाया गया है अथवा दोनों एक साथ बने होंगे। पहले स्वर्ग की कल्पना अद्भुत है। अंधकार को विदा करके प्रकाश की स्थापना हुई। प्रकाश को दिन औऱ अंधकार को रात कहा गया। दूसरे दिन जमीन के नीचे और आकाश के ऊपर का जल बना। यहाँ भी बाइबिल की यह बहुत सुन्दर कथा बुनी गई है कि जमीन का पानी और पृथ्वी का पानी अलग-अलग हैं। हालाकि सच यह है कि पृथ्वी का ही पानी आसमान में पहुँचता है, लेकिन इससे बारिश की जबर्दस्त कल्पना बनती है। तीसरे दिन अंतरिक्ष, सूर्य, चन्द्र, तारे आदि बनाये। इस प्रकार पेड़-पौधे, जीव और मनुष्य से सात दिन में पृथ्वी भर गई। बेबीलोनिया कथा में लगातार सात दिन और सात रात प्रलय मचने की बात कही गई है। उत्तानपिश्तिम (मनु) की विशाल नौका उमड़ते हुए बाढ़ के जल पर तूफानी हवाओं से भटकती और हिचकोले खाती रही।

जल में ‘नारायण’ का पहली बार जब प्रवेश हुआ तब नारायण की शक्ति से एक विराट स्वर्ण अण्ड का प्रादुर्भाव हुआ। नारायण जल में शेषनाग की शैय्या पर एक वर्ष रहे। उस समय के वर्ष में कितने दिन हो सकते हैं, इस बात से ही पता लग सकता है कि उस समय ब्रह्मा का एक दिन एक हजार वर्ष के बराबर होता था, इसे अधिक विस्तारित करने के लिए ब्रह्मा के एक पल तक में एक हजार वर्ष की मिथकों में कल्पना की गई है। भारतीय माइथालॉजी में समय को लेकर बहुत गंभीरता से हजारों वर्षों तक विचार-मंथन किया गया है। यहाँ तक कि भारतीय समय के यथार्थ को वैज्ञानिकता के दर्जे तक पहुँचा दिया गया है।



ज्योतिष समय का सबसे विश्वसनीय वैज्ञानिक सच है। जल, समय और ज्योतिष का बहुत गहरा सम्बन्ध है। जल के ज्वार भाटे का सम्बंध चन्द्रमा से है। सूर्य-चन्द्र ब्रह्मा की आँखें हैं। विराट स्वर्ण अण्ड को स्वयं ब्रह्मा ने दो टुकड़े कर दिये थे. ऐसा माना जाता है कि ब्रह्मा का जन्म भी इसी स्वर्ण अण्ड से हुआ है। इसलिए उन्हें हिरण्यगर्भ भी कहा जाता है। स्वर्ण अण्ड के उन दो टुकड़ों में से एक से आकाश बनाया और दूसरे टुकड़े से पृथ्वी का निर्माण किया। पृथ्वी को जल पर स्थापित किया गया।

जीवन के लिए जल एक अनिवार्य पदार्थ है। वनस्पति की उत्पत्ति और कृषि, जल पर ही निर्भर है। हमारा देश कृषि प्रधान देश है, इसलिए खेती के लिए वांछित जल की आवश्यकता सदा बनी रहती है। मनुष्य के जीवन के लिए और खेती बाड़ी के लिए हमें नदियों, तालाबों और कुओं से जल मिलता है। नदियाँ अथवा तालाब प्रत्येक गाँव, कस्बे तथा नगर में उपलब्ध नहीं है और सरलता से हर कहीं बनाये भी नहीं जा सकते इसलिए पानी की आवश्यकता को पूरा करने के लिए लोग कुआँ खोदते हैं। हमारे देश में प्राचीनकाल में ही समाजसेवी विद्वानों ने मनुष्यों की इस परम और अनिवार्य आवश्यकता का अनुभव कर भू गर्भ के जल का पता लगाने के अनेक प्रयास और प्रयोग के भू-भागों में निरन्तर चलते रहे। इस विषय का जो ग्रन्थ मुद्रित उपलब्ध होता है वह आचार्य वराहमिहिर की वृहत्संहिता है। वृहत्संहिता ज्योतिष का ग्रन्थ है। इस ग्रन्थ का 53वाँ अध्याय-दृकार्गल है। इसमें भू-गर्भ के जल का ज्ञान करने-पता लगाने की विधि बताई गई है। वराहमिहिर ने इस विज्ञान को दृकार्गल कहा है, जिसका अर्थ है भूमि के अन्दर के जल (उदक, दक) का अर्गला-लकड़ी की छड़ी के माध्यम से निश्चय करना-पता लगाना। आचार्य वराहमिहिर ने पानी की खोज में जिन विषयों-विज्ञानों को आधार बनाया है। इस पुस्तक का अनुवाद करने में आवश्यक था कि उन विज्ञानों के जानकार विद्वानों से चर्चा की जाये और आधुनिक विज्ञान कहाँ तक पुरानी खोजों और प्रयोगों का समर्थन करते हैं।


ज्योतिषाचार्य पण्डित दयानन्द शास्त्री जी ने बताया कि यदि किसी जातक की जन्मकुण्डली में कर्क राशि का मंगल अष्टम भाव में बैठा हो तो जातक पानी में डूबकर आत्महत्या कर लेता है ।।

यदि शनि, कर्क एवं चन्द्रमा मकर राशि में हो तो जल से अथवा जलोदर से मृत्यु होती है । शनि चतुर्थस्थ, चन्द्रमा सप्तमस्थ और मंगल दशमस्थ हो तो कुएं में गिरने से मृत्यु होती है ।।

यदि स्त्री जातक की जन्म कुण्डली में सूर्य एवं चन्द्रमा लग्न से तृतीय, षष्ठम, नवम अथवा द्वादश भाव में स्थित हो और पाप ग्रहों की युति या दृष्टि हो तो ऐसी महिला फाँसी लगाकर या जल में कूद कर आत्म हत्या कर लेती है ।।

यदि किसी महिला की जन्मकुण्डली में मंगल दुसरे भाव में हो, चन्द्रमा सप्तम भाव में हो और शनि चतुर्थ भाव में हो तो स्त्री कुएं, बाबड़ी अथवा तालाब में कूद कर अपने प्राण गँवा देती है ।

जल के प्रयोग के नियम और सावधानियां क्या हैं ?

  • जल का अधिक से अधिक प्रयोग करने से आप स्वस्थ रह सकेंगे.
  • दिन के समय ज्यादा जल और रात के समय कम पानी पीयें.
  • खड़े होकर और एक बार में ढेर सारा जल न पीयें.
  • सामान्य तापमान का जल ही औषधि और जीवन की भांति कार्य करता है.
  • जल की रक्षा और संरक्षण करने से चंद्रमा और मन दोनों ही मजबूत होते हैं.
  • अगर जल की बर्बादी की जाए, उसका दुरूपयोग किया जाए तो आर्थिक और मानसिक दोनों तरह की क्षतियां होती हैं.
  • जिन लोगों के घर में जल की बर्बादी होती है, जल बहता रहता है या टपकता रहता है, वहां पर मानसिक समस्याएं और आर्थिक समस्याएं खूब आती हैं.

ज्योतिष में सूर्य को प्रसन्न करने हेतु जल का प्रयोग

हिन्दू धर्म में ज्योतिष शास्त्र का विशेष महत्व बताया गया है। ज्योतिष में भगवान सूर्यदेव को सभी ग्रहों का राजा माना जाता है। इसी कारण सूर्य की पूजा से कुंडली के सभी ग्रह दोष दूर हो सकते हैं। वहीं जातक का आने वाला कल शुभदायी हो जाता है। भगवान सूर्य को मनाने का सबसे सरल और कारगर उपाय है कि रोजाना अलसुबह नित्यक्रिया से निवृत्त होकर सबसे पहले स्नान करें।



फिर भगवान सूर्य को अर्घ्य अर्पित करें। जो लोग ये छोटा सा कार्य हर रोज करते हैं, वे घर-परिवार और समाज में मान-सम्मान प्राप्त करते हैं। सूर्य की कृपा से घर में खुशहाली आती है। अधूर कार्य जल्द पूर्ण होते है। यहां मैहर के ज्योतिर्विद पं. मोहनलाल द्विवेदी के अनुसार सूर्य को जल चढ़ाने की विधि और सूर्य के सरल मंत्र बताए गए है। जिसके माध्यम से आप सूर्य भगवान को प्रसन्न कर सकते है।

इस तरह करें दिन की शुरुआत

  • सबसे पहले अलसुबह सूर्योदय में उठें। फिर स्नान करें।
  • नहाने के पानी में थोड़ा सा गंगाजल भी डालें। और साफ वस्त्र धारण करें।
  • इसके बाद सूर्यदेव के सामने आसन बिछाएं।
  • आसन पर खड़े होकर तांबे के बर्तन में पवित्र जल भरें।
  • उस जल में थोड़ी सी मिश्री भी मिलाएं। मान्यता है कि सूर्य को मीठा जल चढ़ाने से जन्मकुंडली के मंगल दोष दूर होते हैं।
  • जब सूर्य से नारंगी किरणें निकली रही हों यानी सूर्योदय के समय दोनों हाथों से तांबे के लोटे से जल ऐसे चढ़ाएं कि सूर्य जल की धारा में दिखाई दे।

जल चढ़ाते समय सूर्य मंत्र भी बोलना चाहिए।

1. सूर्य अघ्र्य मंत्र
ऊँ ऐही सूर्यदेव सहस्त्रांशो तेजो राशि जगत्पते।
अनुकम्पय मां भक्त्या गृहणाध्र्य दिवाकर:।।
सूर्याय नम:, आदित्याय नम:, नमो भास्कराय नम:।
अघ्र्य समर्पयामि।।

2. सूर्य ध्यान मंत्र
ध्येय सदा सविष्तृ मंडल मध्यवर्ती।
नारायण: सर सिंजासन सन्नि: विष्ठ:।।
केयूरवान्मकर कुंडलवान किरीटी।
हारी हिरण्यमय वपुधृत शंख चक्र।।
जपाकुसुम संकाशं काश्यपेयं महाधुतिम।
तमोहरि सर्वपापध्नं प्रणतोऽस्मि दिवाकरम।।
सूर्यस्य पश्य श्रेमाणं योन तन्द्रयते।

सूर्यदेव को सभी ग्रहों का राजा माना जाता है। इसी कारण सूर्य की पूजा से कुंडली के सभी ग्रह दोष दूर हो सकते हैं। भोर में नित्यक्रिया से निवृत्त होकर सबसे पहले स्नान करें फिर भगवान सूर्य को अघ्र्य चढ़ाएं। रोजाना इस विधि से पूजा करने के बाद कुंडली से सभी ग्रह दशाएं दूर हो जाती हैं।

जल का ज्योतिष में किस ग्रह से सम्बन्ध है?

  • जल मुख्य रूप से चन्द्रमा और शुक्र से सम्बन्ध रखता है.
  • कुछ मात्रा में इसका सम्बन्ध मंगल से भी होता है.
  • जल का सही प्रयोग करके चन्द्रमा और शुक्र को मजबूत किया जा सकता है.
  • अगर जल का सही प्रयोग न किया जाए तो चन्द्रमा और शुक्र दोनों खराब हो सकते हैं.
  • चन्द्रमा को मजबूत करने के लिए और मानसिक शांति के लिए किस प्रकार करें जल का प्रयोग ?
  • घर में ढेर सारे फूलों के पौधे लगाएं.
  • नियमित रूप से उनमे जल डालें.
  • बरसात का पानी एक कांच के बोतल में भरकर अपने बेडरूम में रखें.
  • चांदी के गिलास में पानी पीने से भी चन्द्रमा काफी मजबूत होता है.
  • चन्द्रमा की मजबूती के लिए स्नान करते समय पहले नाभि पर पानी डालकर स्नान करें.

शुक्र को मजबूत करने के लिए कैसे करें जल का प्रयोग?

  • जहां तक हो सके दोनों वेला स्नान करें.
  • नियमित रूप से सुगन्धित जल से स्नान करें.
  • कांच के गिलास से जल पीयें.
  • शुक्र खराब हो तो पानी के बर्तन कभी भी किसी को उपहार में न दें.
  • ज्योतिष के आधार पर जल सुख और धन का कारक है । जितना हम पानी का दुरूपयोग करेंगे उतना नुक़सान सहना पड़ेगा । जिनकी कुंडली में चंद्र नीच स्थान,पाप ग्रह के साथ एवं अष्ठम स्थान पर हो उन्हें इसका अधिक ध्यान देना चाहिए।

खुशियों के साथ शरीर को स्वस्थ रखने के लिए होली मनाई जाती है इसलिए हमें संकल्प लेना चाहिए की हम प्राकृतिक रंगो से त्यौहार मनाए।

प्राकृतिक रंगो को शरीर में लगाने से रोग दूर भागते है , केमिकल से बने रंगों को शरीर से छुड़ाने में पानी भी अधिक बर्बाद होता है।

लेखक – पं. दयानंद शास्त्री, ज्योतिषाचार्य, उज्जैन

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By Religion World February 16, 2020 17 min read
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