महिलाओं को जितना सम्मान वैदिक काल में मिला था आज उसकी कल्पना करना भी बेमानी है. वास्तव में यह सोचने का विषय है कि हमारा देश हजारों साल पहले इतना विकसित और समृद्ध होते हुए भी आज अपनी सशक्देत छवि नहीं रख पा रहा है . मुख्य रूप से स्त्री सम्बंधित मुद्दों के मामले में।
जहाँ आज महिला शिक्षा दर मात्र 65 फीसदी है वहीँ प्राचीन काल में शिक्षा और अन्य कई स्तरों पर लिंगभेद बिल्कुल नहीं था, इसका सबसे प्रमुख उदहारण है हमारे वेद। जहाँ बाकी सभ्यताओं में स्त्री-पुरुष भेदभाव हमेशा से किया जाता रहा है, हमने इसे अपने आक्रांताओं से अनुग्रहित किया। पर्दा प्रथा, सती प्रथा, बाल विवाह और अनेक कुरीतियां वैदिक काल के बाद प्रचलित हुईं।
प्राचीन भारत में शिक्षा, राजनीति, युद्ध, संगीत, कला, लेखन और हर अन्य क्षेत्र में महिलाओं की पूरी और बिना रोक-टोक पहुँच थी, इसीलिए 50 से अधिक विद्वान महिलाओं के नाम हमारे इतिहास का हिस्सा हैं। आइये जानते हैं कुछ विदुषियों के नामों और उनसे जुड़ी कथाओं बारे में–
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वाचकन्वी गार्गी

वेदों की ऋचाओं को गढ़ने में भारत की बहुत-सी स्त्रियों का योगदान रहा है उनमें से ही एक है गर्गवंश में वचक्नु नामक महर्षि की पुत्री ‘वाचकन्वी गार्गी. गार्गी राजा जनक की सभा में उपस्थित विद्वानों में से एक थीं। उनको वेदों का अच्छा ज्ञान था। उनके और महर्षि याज्ञवल्क्य के बीच हुए शास्त्रार्थ (बृहदारण्यक उपनिषद – 3.6) के प्रसंग से सिद्ध होता है कि वह एक प्रभावशाली व्यक्तित्व की स्वामिनी थीं। गार्गी के प्रश्न ‘आसमान से ऊँचा और पृथ्वी से नीचे क्या है’ ने सभा में उपस्थित सभी लोगों को सोच में डाल दिया था।
गार्गी का पहला प्रश्न ‘स्पेस’ और दूसरा ‘टाइम’ के बारे था। स्पेस और टाइम के बाहर भी कुछ है क्या? नहीं है, इसलिए गार्गी ने बाण की तरह पैने इन दो प्रश्नों के जरिए यह पूछ लिया कि सारा ब्रह्माण्ड किसके अधीन है?
जिसके उत्तर में याज्ञवल्क्य ने कहा- एतस्य वा अक्षरस्य प्रशासने गार्गी।’ यानी कोई अक्षर, अविनाशी तत्व है जिसके प्रशासन में, अनुशासन में सभी कुछ ओतप्रोत है। गार्गी ने पूछा कि यह सारा ब्रह्माण्ड किसके अधीन है तो याज्ञवल्क्य का उत्तर था- अक्षरतत्व के! इस बार याज्ञवल्क्य ने अक्षरतत्व के बारे में विस्तार से समझाया।
इस बार गार्गी अपने प्रश्नों के जवाब से इतनी प्रभावित हुई कि जनक की राजसभा में उसने याज्ञवल्क्य को परम ब्रह्मिष्ठ मान लिया।
गार्गी वेदज्ञ और ब्रह्माज्ञानी थी तो वे सभी प्रश्नों के जवाब जानती थी। यहां इस कहानी को बताने का तात्पर्य यह है कि अर्जुन की ही तरह गार्गी के प्रश्नों के कारण ‘बृहदारण्यक उपनिषद‘ की ऋचाओं का निर्माण हुआ। यह उपनिषद वेदों का एक हिस्सा है।
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ब्रह्मवादिनी वेदज्ञ ऋषि मैत्रेयी
मैत्रेयी मित्र ऋषि की कन्या और महर्षि याज्ञवल्क्य की दूसरी पत्नी थी। महर्षि याज्ञवल्क्य पहली पत्नी भारद्वाज ऋषि की पुत्री कात्यायनी थीं। एक दिन याज्ञवल्क्य ने गृहस्थ आश्रम छोड़कर वानप्रस्थ जाने का फैसला किया। ऐसे में उन्होंने दोनों पत्नियों के सामने अपनी संपत्ति को बराबर हिस्से में बांटने का प्रस्ताव रखा। कात्यायनी ने पति का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया, लेकिन बेहद शांत स्वभाव की मैत्रेयी की अध्ययन, चिंतन और शास्त्रार्थ में रुचि थी।
वे जानती थीं कि धन-संपत्ति से आत्मज्ञान नहीं मिलता। इसलिए उन्होंने पति की संपत्ति लेने से इंकार करते हुए कहा कि मैं भी वन में आपके साथ जाऊंगी और ज्ञान और अमरत्व की खोज करूंगी। इस तरह कात्यायनी को ऋषि की सारी संपत्ति मिल गई और मैत्रेयी अपने पति के साथ जंगल में चली गई। ‘वृहदारण्य उपनिषद्’ में मैत्रेयी का अपने पति के साथ बड़े रोचक संवाद का उल्लेख मिलता है।
आज हमारे लिए स्त्री शिक्षा बहुत बड़ा मुद्दा है, लेकिन हजारों साल पहले मैत्रेयी ने अपनी विद्वता से न केवल स्त्री जाति का मान बढ़ाया, बल्कि उन्होंने यह भी सच साबित कर दिखाया कि पत्नी धर्म का निर्वाह करते हुए भी स्त्री ज्ञान अर्जित कर सकती है।
मैत्रेयी को भारतीय विदुषियों का प्रतीक माना जाता है। वह एक वैदिक दार्शनिक थीं और उनको अद्वैत दर्शन में निपुणता प्राप्त थी। बृहदारण्यक उपनिषद (2.4.2–4 और 2.4.5b) में उनके और ऋषि याज्ञवल्क्य के बीच हुआ एक संवाद लिखित है, जिसमे वह आत्मन और ब्राह्मण के अंतर पर चर्चा करती हैं। माना जाता है कि मैत्रेयी ने तत्वमीमांसा जैसे विषयों पर गहन अध्ययन किया था। उस समय धर्म और शिक्षा, दोनों ही क्षेत्रों में मैत्रेयी को विशेष स्थान प्राप्त था।
लोपामुद्रा
लोपामुद्रा वैदिक काल की एक दार्शनिक थीं और महर्षि अगस्त्य की पत्नी थीं। ऋग्वेद की 179वीं सूक्त उनके और उनके पति के बीच हुए एक संवाद को दर्शाता है। पंचदशी के मन्त्रों से ले कर यज्ञ संपन कराने तक लोपामुद्रा, पारिवारिक जीवन का महत्त्व समझाने से लेकर ललित सहस्त्रनाम के प्रचार-प्रसार और महाभारत में लोपामुद्रा का नाम आता है।
पॉलोमी / शचि / इंद्राणी
राजा पॉलोम की पुत्री और इंद्र की पत्नी, शचि इंद्र के दरबार में मौजूद 7 मन्त्रिकाओं में से एक थीं। बुद्धिमान और शक्ति से संपन्न होने के कारण शचि को विशेषाधिकार प्राप्त थे। कुछ ग्रंथों में इंद्र को शचिपति कहकर सम्बोधित किया जाना यह दर्शाता है कि वह उस समय एक महत्वपूर्ण शख्सियत थीं। ऋग्वेद (ऋचा, 10-159) में एक सूक्त में शचि ने अपनी शक्तियों का वर्णन किया है ।
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घोषा
मंत्रदिका, यानी मन्त्रों में निपुण, होने के साथ ही घोषा को आध्यात्म और दर्शन का भी अच्छा ज्ञान था। ऋग्वेद के दसवें मंडल के दो सूक्त (39 और 40), जिनमें कुल चौदह-चौदह पद्य (verses) हैं, घोषा द्वारा कहे गये हैं। घोषा को वैदिक विज्ञान, जैसे मधु विद्या, का भी ज्ञान था। यह उसने अश्विनी पुत्रों से सीखी थी, जो उस समय के त्वचा विशेषज्ञ थे।
अपाला
अपाला अत्रि मुनि की बेटी थीं। ऋग्वेद में लिखे हुए आठवें मंडल के साथ 7 सूक्त (8.91) उनके द्वारा इंद्र से कही गयी प्रार्थना और वार्तालाप की हैं। प्रचलित कथाओं के अनुसार, अपाला अपनी बुद्धिमत्ता के कारण पूरे राज्य में प्रसिद्ध थीं।
इनके अतिरिक्त, पौराणिक काल की प्रसिद्ध विद्वान् महिलाओं में रावण की पत्नी मंदोदरी का नाम भी जोड़ा जा सकता है, जिन्होंने रावण के युद्ध के प्रति लगाव को देखते हुए शतरंज का खेल बनाया। द्रौपदी के संवादों और विज्ञपुरुषों के द्वारा उसकी सहायता ना करने पर कसे गये तंजों की गूढ़ता को देखकर यह समझा जा सकता है कि उनको भी वेदों और पुराणों का अच्छा ज्ञान था।
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