आदि शंकराचार्य एक महान हिन्दू दार्शनिक एवं धर्मगुरु थे. आदि शंकराचार्य जी का जन्म 788 ईसा पूर्व केरल के कालड़ी में एक नंबूदरी ब्राह्मण परिवार में हुआ था.
इसी उपलक्ष में वैशाख मास की शुक्ल पंचमी के दिन आदि गुरु शंकराचार्य जयंती मनाई जाती है. इस वर्ष आद्यगुरू शंकराचार्य जयंती
28 अप्रैल 2020, के दिन मनाई जाएगी.
हिन्दू धार्मिक मान्यता अनुसार इन्हें भगवान शंकर का अवतार माना जाता है यह अद्वैत वेदान्त के संस्थापक और हिन्दू धर्म प्रचारक थे. आदि शंकराचार्य जी जीवनपर्यंत सनातन धर्म के जीर्णोद्धार में लगे रहे उनके प्रयासों ने हिंदु धर्म को नव चेतना प्रदान की.
आदि शंकराचार्य जयन्ती के पावन अवसर पर शंकराचार्य मठों में पूजन हवन का आयोजन किया जाता है. देश भर में आदि शंकराचार्य जी को पूजा जाता है.
अनेक प्रवचनों एवं सतसंगों का आयोजन भी होता है. सनातन धर्म के महत्व पर की उपदेश दिए जाते हैं और चर्चा एवं गोष्ठी भी कि जाती है.
मान्यता है कि इस पवित्र समय अद्वैत सिद्धांत का पाठ करने से व्यक्ति को परेशानियों से मुक्ति प्राप्त होती है. इस दिन धर्म यात्राएं एवं शोभा यात्रा भी निकाली जाती है.
आदि शंकराचार्य जी ने अद्वैत वाद के सिंद्धांत को प्रतिपादित किया जिस कारण आदि शंकराचार्य जी को हिंदु धर्म के महान प्रतिनिधि के तौर पर जाना जाता है, आदि शंकराचार्य जी को जगद्गुरु एवं शंकर भगवद्पादाचार्य के नाम से भी जाना जाता है.
आदि शंकराचार्य जन्म कथा
असाधारण प्रतिभा के धनी आद्य जगदगुरू शंकराचार्य का जन्म वैशाख शुक्ल पंचमी के पावन दिन हुआ था. दक्षिण के कालाड़ी ग्राम में जन्में शंकर जी आगे चलकर ‘जगद्गुरु आदि शंकराचार्य’ के नाम से विख्यात हुए.
इनके पिता शिवगुरु नामपुद्रि के यहाँ जब विवाह के कई वर्षों बाद भी कोई संतान नहीं हुई, तो इन्होंने अपनी पत्नी विशिष्टादेवी सहित संतान प्राप्ति की इच्छा को पूर्ण करने के लिए से दीर्घकाल तक भगवान शंकर की आराधना की इनकी श्रद्धा पूर्ण कठिन तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें स्वप्न में दर्शन दिए और वरदान मांगने को कहा.
शिवगुरु ने प्रभु शंकर से एक दीर्घायु सर्वज्ञ पुत्र की इच्छा व्यक्त की. तब भगवान शिव ने कहा कि ‘वत्स, दीर्घायु पुत्र सर्वज्ञ नहीं होगा और सर्वज्ञ पुत्र दीर्घायु नहीं होगा अत: यह दोनों बातें संभव नहीं हैं तब शिवगुरु ने सर्वज्ञ पुत्र की प्राप्ति की प्रार्थना की और भगवान शंकर ने उन्हें सर्वज्ञ पुत्र की प्राप्ति का वरदान दिया तथा कहा कि मैं स्वयं पुत्र रूप में तुम्हारे यहाँ जन्म लूंगा.
इस प्रकार उस ब्राह्मण दंपती को संतान रूप में पुत्र रत्न की प्राप्त हुई और जब बालक का जन्म हुआ तो उसका नाम शंकर रखा गया शंकराचार्य ने शैशव में ही संकेत दे दिया कि वे सामान्य बालक नहीं है.
सात वर्ष की अवस्था में उन्होंने वेदों का पूर्ण अध्ययन कर लिया था, बारहवें वर्ष में सर्वशास्त्र पारंगत हो गए और सोलहवें वर्ष में ब्रह्मसूत्र- भाष्य कि रचना की उन्होंने शताधिक ग्रंथों की रचना शिष्यों को पढ़ाते हुए कर दी अपने इन्हीं महान कार्यों के कारण वह आदि गुरू शंकराचार्य के नाम से प्रसिद्ध हुए.
आदि शंकराचार्य जयंती का महत्व
आदि शंकराचार्य जयन्ती के दिन शंकराचार्य मठों में पूजन हवन किया जाता है और पूरे देश में सनातन धर्म के महत्व पर विशेष कार्यक्रम किए जाते हैं. मान्यता है कि आदि शंकराचार्य जंयती के अवसर पर अद्वैत सिद्धांत का किया जाता है.
इस अवसर पर देश भर में शोभायात्राएं निकली जाती हैं तथा जयन्ती महोत्सव होता है जिसमें बडी संख्या में श्रद्वालु भाग लेते हैं तथा यात्रा करते समय रास्ते भर गुरु वन्दना और भजन-कीर्तनों का दौर रहता है.
इस अवसर पर अनेक समारोह आयोजित किए जाते हैं जिसमें वैदिक विद्वानों द्वारा वेदों का सस्वर गान प्रस्तुत किया जाता है और समारोह में शंकराचार्य विरचित गुरु अष्टक का पाठ भी किया जाता है.
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अद्वैतवाद के प्रवर्तक
आदि शंकराचार्य भारत के उन महान दार्शनिकों में हैं जिन्होंने संसार को मिथ्या बताकर इस चर-अचर जीव जगत में एकमात्र परब्रह्म की सत्ता को स्वीकार कर अद्वैतवाद को स्थापित किया था।
शंकराचार्य के अनुसार यह संपूर्ण जगत परब्रह्म, निर्गुण निराकार है। यह जगत सत्य रूप में हमें उसी तरह जान पडता है जिस प्रकार सर्प में रज्जू यानि रस्सी का आभास होता हैं।
हम अज्ञानवश इस जगत को सत्य समझ रहे हैं, जिस दिन यह भ्रांति, इस अज्ञान का पर्दा हमारी आंखों के सामने से हट जाता है, इस संपूर्ण जगत में हम सिर्फ और सिर्फ परब्रह्म को ही पाते हैं।
अद्वैतवाद को हालांकि भारत में शंकराचार्य से पहले भी कई दार्शनिकों, महात्माओं ने जगत के सामने रखा था किन्तु शंकराचार्य ने इसे अपनी सरल, स्पष्ट समीक्षाओं, दार्शनिक दृष्टि और तर्क संगत रूप से ठोस और दृढ़ रूप में जगत में स्थापित किया।
शंकराचार्य ने हिन्दुओं के महान ग्रंथों उपनिषद, गीता, ब्रह्मसूत्र इत्यादि पर भाष्य लिखकर अद्वेत के आधार पर उनकी सरल और सटीक व्याख्या की।
भारत में सनातन धर्म और अद्वैतवाद के प्रचार प्रसार के लिए शंकराचार्य ने भारत के चारों कोनों में चार प्रमुख मठों दक्षिण में श्रृंगेरी मठ, पश्चिम में द्वारिका शारदा मठ, पूर्व में जगन्नाथपुरी गोवर्द्धन मठ, और उत्तर में ज्योतिर्पीठ मठ की स्थापना की।
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