वैशाख मास की पूर्णिमा को वैशाखी पूर्णिमा, पीपल पूर्णिमा या बुद्ध पूर्णिमा के नाम से जाना जाता है। भगवान बुद्ध को भगवान विष्णु का नौवां अवतार माना गया है। जिन्हें इसी पावन तिथि के दिन बिहार के पवित्र तीर्थ स्थान बोधगया में बोधि वृक्ष के नीचे बुद्धत्व की प्राप्ति हुई थी।
भगवान बुद्ध के चार आर्य सत्य-
वैशाख पूर्णिमा भगवान बुद्ध के जीवन की तीन अहम बातें -बुद्ध का जन्म, बुद्ध को ज्ञान प्राप्ति एवं बुद्ध का निर्वाण के कारण भी विशेष तिथि मानी जाती है। गौतम बुद्ध ने चार सूत्र दिए उन्हें ‘चार आर्य सत्य ‘ के नाम से जाना जाता है,।
चार आर्य सत्य क्या हैं?
भगवान बुद्ध द्वारा उद्घघाटित ‘सत्य’ को ‘आर्य सत्य’ के नाम से जाना जाता है। यहाँ आर्य का अर्थ ‘श्रेष्ठ’ है। अर्थात् बुद्ध के चार सिद्धांत जीवन के ‘श्रेष्ठ सत्य’ हैं। इसका यह अर्थ भी माना जाता है कि ये ‘सत्य’ आर्य(श्रेष्ठ) पुरुष द्वारा उपदिष्ट हैं। बौद्ध-काल में ‘आर्य’ शब्द किसी जाति का सम्बोधन नहीं करते हुए शालीनता और सभ्यता के प्रतीक धे और इसीलिए भगवान बुद्ध के प्रमुख सूत्रों को ‘चार आर्य सत्य’ के नाम से प्रसिद्धि मिली।
प्रथम आर्य सत्य : दुःख है
भगवान बुद्ध ने अपने जीवन के प्रत्यक्ष बहाव और निज-अनुभव के आधार पर प्रथम आर्य सत्य की उद्घोषणा यह की कि यदि हम जीवन के बाह्य स्वरूप में उलझे हुए हैं तो वहाँ मात्र दुःख ही है। जन्म, ज़रा, मृत्यु, चिंता, संताप, व्यग्रता, कष्ट, प्रिय का वियोग और अप्रिय का संयोग — ये सभी दुःख के प्रकार हैं। चाहे ढाई हज़ार वर्ष पहले का समय हो या अभी, परंतु इन सभी मन:स्थितियों से मनुष्य तब भी जूझ रहा था और आज भी इनसे दूर रहने की हर नाकाम कोशिश कर रहा है। भगवान बुद्ध के बताए मार्ग पर चलने के लिए प्रथम निर्णय अनिवार्य है कि जीवन में दुःख है और हमारी सभी कोशिशें वर्तमान और भविष्य में दुःख से दूर रहने की ही हैं।
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दूसरा आर्य सत्य : दुःख का कारण है
यहीं से भगवान बुद्ध के विज्ञान पूर्ण बोध का आरम्भ होता है। यदि जीवन में दुःख का प्रत्यक्ष अनुभव है तो अवश्य ही इस दुःख का कोई कारण भी होना चाहिए। और यहीं से भगवान बुद्ध के दूसरे आर्य सत्य को मानने वाले लोगों का दो प्रमुख बहदों में विभाजन हो जाता है। जो मनुष्य दुःख का कारण स्वयं के बाहर मानते हैं यानि वस्तु, व्यक्ति, स्थिति, कर्म आदि को दुःख का कारण मानते हैं वे सभी मनुष्य अभी संसारी ही हैं परंतु जो इस दुःख का कारण स्वयं के भीतर मानते हैं जैसे कि स्वयं की मान्यता, स्वरूप का अज्ञान, अविद्या आदि — तो वे सभी मनुष्य ‘साधक’ हैं। मनुष्य को वर्षों के सत्संग और सगुरु के बोध के पश्चात् यह निश्चय हो पाता है कि दुःख का कारण बाहर नहीं, स्वयं के भीतर है। जब तक मनुष्य को यह निश्चय नहीं होता तब तक दुःख-निवृत्ति के सभी प्रयास निष्फल ही रहते हैं।
तीसरा आर्य सत्य : दुःख के कारण का निवारण है
दुःख के कारण का यथार्थ निर्णय हो जाने के पश्चात् अब साधक आगे की यात्रा में प्रवेश करता है जहाँ किसी सद्गुरू से मिलने पर उसे दृढ़ निर्णय होता है कि दुःख के आंतरिक कारणों का निवारण किया जा सकता है। यदि यह विश्वास ही न हो तो साधक द्वारा की हुई सभी साधना व्यर्थ है। इसलिए भगवान बुद्ध ने तीसरे आर्य सत्य में ‘श्रद्धा’ को प्रधान स्थान दिया। साधक में जब तक मार्गदर्शक और मार्ग के प्रति सम्पूर्ण निष्ठा नहीं आती तब तक दुःख से निवृत्ति संभाव नहीं है।
चौथा आर्य सत्य : दुःख निवारण का मार्ग है
किसी भी क्षेत्र और काल में जब सम्यक् संबुद्ध चेतना पर श्रद्धा की दृढ़ भूमिका बनती है तो वहीं से मार्ग का शुभारम्भ होता है। भगवान बुद्ध के समय में इसे ‘अष्टांग मार्ग’ के नाम से जाना गया। वैसे इस मार्ग को बुद्ध के ‘त्रिरत्न’ के नाम से भी पहचाना जाता है परंतु प्रज्ञा, शील और ध्यान के इन्हीं त्रिरत्न का विस्तार है अष्टांग मार्ग। यह अष्टांग मार्ग मनुष्य को दोनों प्रकार की अति में नहीं जाने के लिए सावधान करता है इसलिए इसे ‘मध्यम-मार्ग’ भी कहा जाता है।
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