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मदर्स डे : गर्भ से ही मिलते मां से संस्कार इसलिए मां होती है ईश्वर की प्रतिमूर्ति

मदर्स डे : गर्भ से ही मिलते मां से संस्कार इसलिए मां होती है ईश्वर की प्रतिमूर्ति

मदर्स डे : गर्भ से ही मिलते मां से संस्कार इसलिए मां होती है ईश्वर की प्रतिमूर्ति
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मदर्स डे : गर्भ से ही मिलते मां से संस्कार इसलिए मां होती है ईश्वर की प्रतिमूर्ति

कहते हैं मां से बड़ी कोई शिक्षक नहीं होती. जब भी कोई स्त्री गर्भधारण करती है तभी से मां की भूमिका उसे प्राप्त हो जाती है. मां की बल्कि भूमिका ही नहीं बल्कि उसे एक ज़िम्मेदारी का एहसास भी होता है.



ज़िम्मेदारी होती है अपने बच्चों में सही संस्कार डालने की.संस्कार का अर्थ संस्करण, परिष्करण, विमलीकरण अथवा विशुद्धिकरण से लिया जाता है। हिंदू धर्म में जातक के जन्म की प्रक्रिया आरंभ होने से लेकर मृत्यु पर्यन्त तक कई संस्कार किये जाते हैं। इस प्रकार मुख्यत: सोलह संस्कार निभाये जाते हैं। पहला संस्कार गर्भधान का माना जाता है।

गर्भधान संस्कार

हिंदू धर्म के सोलह संस्कारों में यह पहला संस्कार माना जाता है। इसी के जरिये सृष्टि में जीवन की प्रक्रिया आरंभ होती है। धार्मिक रूप से गृहस्थ जीवन का प्रमुख उद्देश्य और प्रथम कर्तव्य ही संतानोत्पत्ति माना जाता है। गर्भाधान संस्कार के जरिये जीव में निहित उसे पूर्वजन्म के विकारों को दूर कर उसमें अच्छे गुणों की उन्नति की जाती है। कुल मिलाकर गर्भाधान संस्कार बीज व गर्भ संबंधी मलिनता को दूर करने के लिये किया जाता है।

पिता गर्भधारण में केवल सहयोग प्रदान करता है, इसलिए पिता की अपेक्षा माता का उत्तरदायित्व अधिक है । बिना उचित ज्ञान एवं स्थिति की जानकारी लिए माता इस कर्तव्य का भली भॉति पालन कर सकेगी, यह असंभव जैसा है । अतएव महिलाओं को यह जानकारी होना आवश्यक है कि संतान परिवार व समाज के प्रति एक महती उत्तरदायित्व भी है ।

एक सुसंस्कारित बच्चा ही अपने माता-पिता के नाम को उज्जवल एवं प्रकाशित कर सकता है और अगर हर घर में सुसंस्कारित बच्चे पैदा होने लेगं, तो निश्चित रूप से धरती के हर घर-परिवार में स्वर्गीय वातावरण हो जाएगा ।

मां देती है ज्ञान

अपने बच्चे को संस्कारवान बनाने के लिए एक महिला ने संत ईसा से एक बार प्रश्न किया – ‘‘आप हमें बताइए कि बच्चे की शिक्षा-दिक्षा कब से प्रारंभ की जानी चाहिए ।’’ ईसा  मसीह ने उत्तर दिया – ‘‘गर्भ में आने के 100 वर्ष पहले से ।’’ यह उत्तर सुनकार स्त्री को बहुत आश्चर्य हुआ।

तब ईसा मसीह ने इस बात को समझाया कि यद्यपि सौ वर्ष पूर्व बच्चे का अस्तित्व नहीं होता, लेकिन उसकी जड़ उसके बाबा या परबाबा के रूप में सुनिश्चित होती है । उसकी मन:स्थिति, उसके आचार, उसके संस्कार पिता के माध्यम से बच्चे के अंदर आते हैं, इसी तरह माता-पिता के विचार, उनके रहन-सहन, आहार-विहार से भी बच्चे का निर्माण होता है। ईसा मसीह का यह कथन पूर्णतया सत्य है ।

इसके कई उदाहरण हैं – भगवान राम जैसे महापुरूष का जन्म रघु, अज और दिलीप आदि पितामहों के तप की परिणति थी एवं योगेश्वर कृष्ण का जन्म देवकी और वसुदेव के कई जन्मों की तपश्चर्या का पुण्यफल था ।

ठीक इसी तरह अठारह पुराणों के रचयिता भगवान व्यास का जन्म भी तभी हुआ, जब उनकी पांच पितामह पीढ़ियों ने घोर तप किया था । मनुष्य द्वारा की गई भक्ति एवं तप ही उसे इस योग्य बनाते हैं। जो अपने चित्त के कुसंस्कारों का शमन हेतु कोई तप नहीं करता एवं साधारण जीवन व्यतीत करते हुए परिवार की वृद्धि करता है, तो उसकी संतानों में भी कई कुसंस्कारों का आगमन हो जाता है, जो उसके भावी जीवन के लिए बहुत घातक सिद्ध होते हैं ।

यह भी पढ़ें –“माँ’’ जीवन का सर्वोत्तम विश्वविद्यालय – स्वामी चिदानन्द सरस्वती

माता का चिंतन, चरित्र और व्यवहार करते हैं प्रभावित

मदर्स डे: गर्भ से ही मिलते मां से संस्कार इसलिए मां होती है ईश्वर की प्रतिमूर्ति
बच्चों का सुसंस्कारित बनाने का सबसे उपयुक्त समय उसका गर्भकाल है। गर्भधारण काल में माता का चिंतन, चरित्र और व्यवहार तीनों ही उसके उदर में पह रहे बच्चे को प्रभावित करते हैं।

इस अवस्था में वह जिस तरह के बच्चे की कल्पना करती है, जिस तरह का भोजन करती है जिस तरह का वातावरण उसे मिलता है, वह सब बच्चे के अंदर सूक्ष्म रूप से समाहित होता जाता है।

माता की आदतें, इच्छाएं आदि भी संस्कार के रूप में उसकी संतान के अंदर प्रवेश कर जाते हैं, जो समयानुसार परिलक्षित होते हैं। इस अवस्था में माता का शारिरिक, मानसिक व भावनात्मक स्वास्थ्य बच्चे के स्वास्थ्य को विनिर्मित करता है।

यदि माता-पिता अपने बच्चे के लिए किसी क्षेत्र में विशेष योग्यता की चाहत रखते हैं तो उन्हें बच्चे के गर्भकाल में ही प्रशिक्षण देने का प्रयास करना चाहिए और प्रशिक्षण माता को देना चाहिए, क्योंकि गर्भावस्था काल में बच्चे की संवेदनशीलता अत्यंत विकसित होती हैं।

इस अवस्था में माता जो भी देखती है, सीखती हे, महसूस करती हे, इच्छा करती है, कल्पना करती है, उसके अनुरूप ही उसके बच्चे के व्यक्तित्व का निर्माण बीज रूप में हो जाता है, जो समयानुसार विकसित होता है।

अभिमन्यु और सुभद्रा

इस संदर्भ में महाभारत की सुविख्यात घटना है कि महाभारत युद्ध के समय तक दिन द्रोणाचार्य ने पांडवों का वध करने के लिए चक्रव्यूह की रचना की। उस दिन चक्रव्यूह का रहस्य जानने वाले एकमात्र अर्जुन को कौरव बहुत दूर तक भटका ले गए और इधर पांडवों के पास चक्रव्यूह भेदन का आमंत्रण भेज दिया। यह जानकर सब सारी सभा सन्नाटे में थी, तब 23 वर्षीय राजकुमार अभिमन्यु खड़े हुए और बोले – ‘‘मैं चक्रव्यूह भेदन करना जानता हूं।’’ युधिष्ठिर ने साश्चर्य प्रश्न किया – ‘‘पुत्र! मैंने तो तुम्हें कभी भी चक्रव्यूह भेदन सीखते न देखा और न ही सुना।’’ तब अभिमन्यु ने कहा – ‘‘तात् जब मैं अपनी मां सुभद्रा के पेट में था और मां को प्रसव पीडा प्रारंभ हो गई थी, तब मेरे पिता अर्जुन पास ही थे। मां का ध्यान दरद की ओर से बंटाने के लिए उन्होंने चक्रव्यूह भेदन की क्रिया बतानी प्रारंभ की। छह द्वारों के भेदन की क्रिया बताने तक मेरी मां ध्यान से सुनती रहीं और गर्भ में बैठा हुआ मैं उसे सीखता चला गया, पर सातवें और अंतिम द्वार भेदन को सुनाने से पूर्व ही मां को निद्रा आ गयी एवं उन्हीं के साथ मैं भी विस्मृति में चला गया। उसके बाद मेरा जन्म हो गया। छह द्वार तो मैं आसानी से तोड़ लूंगा। सातवें में सहायतार्थ आप सब पहुंच जाएंगे तो उसे भी तोड़ लूंगा।’’

माता पार्वती भी वही मां थी जिन्होंने महादेव द्वारा श्री गणेश का सिर धड़ से अलग करने के बाद संसार में त्राहि मचा दी थी. और जब तक भोलेनाथ ने उन्हें पुनर्जीवन नहीं दिया तब तक शांत नहीं हुयी थी.

भगवान् श्री कृष्ण देवकी और वासुदेव के पुत्र थे लेकिन पालन पोषण यशोदा माता द्वारा हुआ. एक से उन्होंने गर्भ में संस्कार प्राप्त किया है और एक से उन्होंने जन्म के बाद.

शोध अध्ययनों में ऐसा देखा गया हैं कि गर्भकाल के दौरान जिन माताओं ने संगीत का प्रशिक्षण लिया, उनके बच्चे सुरीले, मधुर कंठ वाले पैदा हुए। जिन माताओं ने अपनी रूचि के अनुसार चित्रकारी, लेखन, अच्छी पुस्तकों का अध्ययन आदि किया, उनके बच्चे आगे चलकर उसी तरह की योग्यता में प्रवीण हुए। इससे यह स्पष्ट होता है कि गर्भकालीन माता को दिया गया प्रशिक्षण उसके बच्चे में वही गुण विकसित करने का सबसे अच्छा माध्यम है।



मां की ममता जैसी अनमोल है उसे शब्दों में बयां नहीं कर सकते या किसी परिभाषा के रूप में परिभाषित नहीं कर सकते।  मां की अहमियत वही समझता है, जिसकी भावनाएं भी मां को ईश्वर जैसा दर्जा देती हैं।

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By Shweta May 10, 2020 6 min read
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