जैसा कि आप सबको जानकारी है कि आने वाले 21 जून को अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस आने वाला है. प्रत्येक वर्ष रिलिजन वर्ल्ड अपने पाठकों के लिए कुछ अलग लेख लेकर आता है और इस साल की सीरीज में आपको उन योगियों का परिचय दे रहा है जिन्होंने योग को पश्चिम तक पहुंचाने का प्रयास किया है.
तो योग दिवस की चौथी सीरीज में हम आपका परिचय कराएँगे योगी शीलनाथ बाबा, धूनी वाले दादा जी, तिरुमलाई श्रीकृष्णामाचार्य और राघवेंद्र स्वामी से.
योगी शीलनाथ बाबा
शीलनाथ बाबा का समाधि स्थल ऋषिकेश में है, लेकिन उन्होंने उनके जीवन का महत्वपूर्ण समय मध्यप्रदेश के देवास शहर में बिताया। मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र में उनके कई धूना स्थान है। देवास में श्रीगुरु योगेंद्र शीलनाथ बाबा का अखंड धूना और ज्योत आज भी जलता रहता है।
देवास के मल्हार क्षेत्र में बाबा की धूनी एक तपोभूमि है, जहां बाबा के धूने के अलावा उनके अधिकतर शिष्यों के समाधि स्थल भी हैं। शीलनाथ बाबा जयपुर के क्षत्रिय घराने से थे।
1839 में दीक्षा प्राप्ति के बाद बाबा ने उत्तराखंड के जंगलों में कठिन तप किया। इसके बाद उन्होंने देश-देशांतरों के निर्जन स्थानों पर भ्रमण किया।
1900 में वे उज्जैन क्षेत्र में पधारे, जहां उन्होंने भर्तृहरी की गुफा में ध्यान रमाया। उज्जैन के बाद कुछ दिन इंदौर में रहे तथा पुन: उज्जैन में आ गए।
उज्जैन से ही उनकी प्रसिद्धि पूरे मालव राज्य में फैल गई थी। देवास में बाबा 1901 से 1921 तक रहे। तत्पश्चात अंतरप्रेरणा से ऋषिकेश में जाकर वहां चैत्र कृष्ण 14 गुरुवार संवत 1977 और सन् 1921 ई. के दिन 5.55 के समय ब्रह्मलीन हो उन्होंने समाधि ले ली। कहते हैं कि यहीं पर उनके गुरु की भी समाधि थी।
दादाजी धूनी वाले
दादाजी धूनी वाले का समाधि स्थल मध्यप्रदेश के खंडवा शहर में स्थित है। दादाजी का नाम स्वामी केशवानंदजी महाराज था और वे परिव्राजक योगी थे अर्थात भ्रमणशील थे।
देश-विदेश में दादाजी के असंख्य भक्त हैं। दादाजी के नाम पर भारत और विदेशों में 27 धाम मौजूद हैं। सन् 1930 में दादाजी ने खंडवा शहर में समाधि ली।
यह समाधि रेलवे स्टेशन से 3 किमी की दूरी पर है। उल्लेखनीय है कि योग में पारंगत व्यक्ति ही समाधि लेने की क्षमता रखता है।
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तिरुमलाई श्रीकृष्णामाचार्य

आधुनिक समय में हठ योग के महान व्याख्याता रहे श्रीकृष्णामाचार्य का देहांत 1989 में 101 वर्ष की आयु में हुआ। उन्होंने अपने आखिरी दिनों तक हठ योग की विनियोग प्रणाली का अभ्यास किया और उसकी शिक्षा दी।
उन्होंने बाकी लोगों के साथ प्रसिद्ध जिद्दू कृष्णमूर्ति को भी योग सिखाया है। श्रीकृष्णामाचार्य के एक और मशहूर विद्यार्थी हुए बी.के.एस.अयंगर (14 दिसंबर 1918-20 अगस्त 2014) जो खुद भी एक गुरु थे। उनके पुत्र टी.के.वी. देसीकाचर अपने संत पिता की शिक्षाओं को जारी रखे हुए हैं।
राघवेंद्र स्वामी
बंगलौर से लगभग 250 किलोमीटर दूर कर्नाटक के एक छोटे से गांव, चित्रदुर्ग जिले के मलादीहल्ली के राघवेंद्र स्वामी जो ‘मलादीहल्ली स्वामीजी’ के नाम से मशहूर थे, ने मलादीहल्ली में अनथ सेवाश्रम ट्रस्ट की स्थापना की।
उन्होंने मलादीहल्ली में अपना आधार रखते हुए दुनिया भर के 45 लाख से अधिक लोगों को योग सिखाया। उन्होंने योग की शिक्षा पलनी स्वामी से प्राप्त की थी। राघवेंद्र स्वामी सद्गुरु जग्गी वासुदेव के योग शिक्षक थे।
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