क्या कथावाचक धर्म गुरू हैं ?
हमारे बीच में अब कथा वाचकों को लेकर बहुत सारे सवाल उठने लगे हैं ? सवाल उठाने वाले भी धर्म जगत के ही बहुत सारे प्रवक्ता हैं और हैं वो लोग जो धर्म को अपनी परिभाषाओं से समझकर उसे अधिकार के संग निभाने में लगे हैं। सवाल तीखे है, क्या कथावाचकों को भौतिक जीवन की सब सुख सुविधा भोगने और उसे प्रदर्शन करने का हक है, क्या महिलाओं को कथा करने का अधिकार है ? क्या कथावाचक बार-बार व्यवस्था के नाम पर मनचाहा शुल्क लेने का अधिकारी है, क्या कथावाचक कथा को इवेंट मानकर बुकिंग कर रहा है, क्या कथा वाचक बिना संस्कृत-शास्त्र के धर्म बखा रहा है, क्या कथावाचक का ब्राह्मण होना जरूरी है ? क्या कथा वाचक को विवाह का अधिकार है और वो परिवारवाद का हिमायती है? यह कुछ प्रश्न है जो मैं भी आजकल कई जगहों पर लोगों को पूछते पाता हूं। सोशल मीडिया पर यह तीखे प्रहारों के संग सीधे व्यक्ति पर साधे हुए तीर होते है, जो अनुत्तरित होने पर समाज के एक बड़े वर्ग की राय को पुख्ता कर देते हैं।
वेद व्यास की परंपरा को एक मंच से स्वर देने वाले अब शुकदेवजी के प्रभाव से जगत में एक परंपरा को स्थापित कर चुके हैं। देश और विदेश में कथा एक लोकप्रिय धर्म प्रचार, संप्रदाय विस्तार, लोगों को धर्म से जोड़ने, परिवारों को धर्म के करीब लाने और उन्हें एक धार्मिक कर्म करने का अवसर देने का माध्यम है। कथा के क्षेत्रीय स्वरूपों के विलोप के दौर में कथा को श्रवण और मनोरंजन के बीच देखकर इससे जुडने वाली जनसंख्या खूब हो गई है। जब किसी धार्मिक कृत्य में मर्यादा-अनुशासन-कठिनाई-कर्तव्यबोध नहीं होता है तो वो किसी का उद्धार नहीं कर पाती है, ऐसे ही कथा का हाल है शायद। जिस धर्म में एक बार नारायण नाम लेने पर तर जाने की व्याख्याएं तैर रही हो, वहां पर बडे बड़े पंडालों में गूँजने वाली आवाज और संगीत के बीच भगवान तैरते नजर नहीं आते है। यजमान, गणमान्य, श्रोता, नेता, वीआईपी, भजन और आम लोगों की आस्था के बीच कथा बिखरकर एक ईवेंट में रह जाती है और कथा वाचक अपनी निजी लोकप्रियता और कर्तव्यबोध के बीच एक परफार्मर। जो एक कथा के अंत और दूसरी की शुरूआत के बीच अध्ययन को तिरोहित कर कैलेंडर भरने को ही कथा जगत की सफलता मान बैठा है।
पर क्या कथा वाचक धर्म गुरू है ? गुरू के मूल कर्तव्य को समझने वाले उनसे कुछ ही बातों की अपेक्षा रखते है, मार्गदर्शन, दीक्षा, कृपा और हाथ थामने की। दीक्षित शिष्य के प्रति गुरु की खास जिम्मेदारी होती है। मार्गदर्शन अब एक खास वर्ग का हक है जो गुरु सामीप्य के लिए सश्कत हो, अपनी निष्ठा से या धन से। भीड़ भाड़ से भरी कथाओं में अब गुरू तक पहुंचना एक श्रम है, जिसके लिए केवल दृढ़ मन ही कार्यरत है। बाकी करीबियत का मानक अब फोन से ली गई कुछ फोटो से समझा जा सकता है। हालांकि ऐसा नहीं है कि सब कथा वाचक मशहूर है, पर जो हजारों केवल कथा को परंपरा की तरह कर रहे है, वे भी लालायित है। पर हमें यह भी समझना होगा कि समाज और धर्म में जो भी हो रहा है वो समाज के एक लक्षण है। जब धन, मान, प्रतिष्ठा और अहंकार से हर कोई अभिशप्त है तो यह दोष हर जगह परिलक्षित होगा। धर्म के भीतर जितनी भी संरचनाएं है वो सभी इस समय मौलिक और भौतिक के बीच डोल रही है। किसी मंदिर में गर्भगृह वीआईपी के अत्याचारों से बचा नहीं है। धर्म गुरु भी भगवान की माया को फैला रहे हैं। वैदिक धर्म में जिस विरक्ति की चर्चा को हम संन्यास भाव में देखते थे, उससे बचने के सारे रास्ते अब धर्म के बीच ही मौजूद नई संस्थाएं ढूंढ रही है।
धर्म के प्रदर्शन के दौर में धर्म ही सबसे पीछे है शायद। पर धर्म है क्या ? जाहिर है पैसे वाला इसे मानवता मानकर धार्मिक संगठनों के मानव सेवा के कार्य में आगे आ रहा है, मध्यम वर्ग इसे रोज की चुनौतियों से लड़ने में भगवान के कर्मकांडों से इसे साध रहा है और गरीब श्रवण पर निर्भर है। इसीलिए बहुत सारे कथावाचकों के पंडालों में भीड़ एक खास वर्ग की है। जो भगवान को सुनकर और कुछ सतही उपायों से पाना चाहता है। दुख सभी के मूल में हैं। कथावाचक का नया मोबाइल लेना, या उसका वैभवशाली ढंग से मंहगी गाड़ियों और जहाजों में घूमना सब सहज है, क्योंकि समाज ही इसे एक व्यवहार मानकर चल रहा है। इन सबके बीच धर्म को मंच पर बताना और उसे केवल मानव व्यवहार और समझ की परिधि में व्याख्यित करके कथा प्रासंगिक बनी हुई है। अपने निजी जीवन में कथा प्रवक्ता बेहद धार्मिक होगा, यह बात सभी को पता होती है, पर उसके भौतिक प्रदर्शन से समाज को एक खीझ सी होती है। अपनी पिछली पीढ़ियों को धर्म के आचार विचार से देखने वालों को शायद उतनी समस्या न हो, क्योंकि वे धर्म अधिकारी के विशिष्ट होने की सोच को लेकर आगे आएं हैं। पर सोशल मीडिया पर बने धर्म प्रवक्ताओं के उन्हीं जैसे यूजर्स ही सबसे बड़े आलोचक हैं। युवाओं का मन धर्म की ओर है, वो बहुत कुछ ऐसा करते हैं जो धर्म से प्रभावित है। पर जब व्यक्ति केंद्र में होता है, तो वो प्रखर आलोचक बन जाते हैं।
कथा को बदलना था, वो बदल रही है। कभी संगीत नहीं था, शोशेबाजी नहीं थी, अब सब है और मर्म गायब है। कभी एक महीने, कभी कई हफ्तों की कथाएं होती थी। कभी आनुष्ठानिक कथाओं का मोल था, अब फेमस पर जोर है। कभी कथा समाज को वापस देती थी, अब वो समाज से लेने वाली कला बनती दिखती है। भवनों के निर्माण के लिए कथा, परिवारों के आंगन के लिए कथा, नए घर और फार्महाउस के लिए कथा, पैसे के लिए कथा, दान के लिए कथा, प्रसिद्धि के लिए कथा। क्या सचमुच कथा इसलिए होती है ? कथा वाचन एक धार्मिक कृत्य है। इसके मूल में धर्म है। धर्म को जन-जन तक सुलभ और सरल भाव में पहुंचाना कथा है। वैसे यह आज भी हो रहा है, पर वजहों और वक्ताओं ने इसे कमजोर किया है। एक बड़ी जिम्मेदारी है कथा वक्ताओं की कि वे धर्म के दस लक्षण – धैर्य (धृति), क्षमा, मन का निग्रह (दम), चोरी न करना (अस्तेय), पवित्रता (शौच), इंद्रियों पर नियंत्रण (इंद्रियनिग्रह), बुद्धि (धी), विद्या, सत्य और क्रोध न करना (अक्रोध) को भी आधार मानें और कथाओं में उपदेश के अलावा निजी आचरण को भी पेश करके सिद्ध करें कि वो अधिकारी है धर्म गुुरू होने के। हम डोंगरे जी महाराजी, रामसुखदास जी की बात आजकल खूब करते है, पर हम उनके जैसे होने में डरते है। अभी हाल में ही किसी ने मुझे एक ऐसे कथा वाचक के बारे में बताया जो कथा करते है, पर खुद को नहीं यूट्यूब पर लाते हैं। इस पर मेरे मन में आदर और संशय दोनों जगा।
बहुत सारी शक्तियां जब एक साथ जाग जाएं तो संघर्ष तय है। आज कथा में यही हो रहा है। कार्यक्रम, वक्ता, संगीत, मीडिया, लोकप्रियता, धन, आयोजन, लोभ, नतीजा सब शक्तियां एक साथ कथा के माथे पर चढ़कर लड़ रही है। कथा सुनने वाला सुनकर घर चला जाता है। संदेश वहीं पंडाल में रूका रहता है, जब तक कि उस जगह दूसरा धूमधड़ाका जम नहीं जाता है। कथा की जिम्मेदारी कथाजगत को गंभीरता से निभानी होगी। हर तरह की कथा हो, और उसे सही भाव से समझा जाए। पर लोकप्रिय वक्ताओं और वाचकों को मानक भी बनाते चलना होगा, जिससे नवांकुर उसी राह पर चले और गलती का साहस न करें। कथावाचक का धर्म ही उसका गुरू है जो अंधकार के मंच पर प्रकाश लेकर आएगा। हमारा समाज धर्म के हर भाव को धर्म मानता है। कथावाचक भी धर्मगुरू है, पर तभी तक जब तक वो धर्म के किसी भी अंश को सात्विकता से पेश कर रहा है।
~ भव्य श्रीवास्तव, संस्थापक, रिलीजिन वर्ल्ड
Editorial Review Note
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