अक्षय तृतीया व्रत कथा, पूजा विधि
वैशाख महीने के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथी को अक्षय तृतीया के नाम से जाना जाता हैं. अक्षय तृतीया को अखतीज, अक्खा तीज तथा वैशाख तीजके नाम से भी जाना जाता हैं. यह दिन वर्ष में आने वाले अनेक पवित्र दिनों में से एक हैं.
अक्षय तृतीया का अर्थ
अक्षय शब्द का अर्थ हैं. जिसका कभी क्षय न हो. अर्थात एक ऐसा दिन जो कभी नष्ट नहीं होता. ज्योतिषशास्त्र के अनुसार वर्ष के हर महीने में तिथियाँ घटती व बढती हैं. लेकिन अक्षय तृतीया के दिन का कभी भी क्षय नहीं होता. इसलिए इस तिथि को अक्षय शब्द से सम्बोधित किया जाता हैं.
अक्षय तृतीया का बहुत ही महत्व हैं. यह दिन अन्य दिनों से बहुत ही शुभ माना जाता हैं. अक्षय तृतीया के दिन कोईश्वर तिथि के दिन के नाम से भी जाना जाता हैं. शास्त्रों के अनुसार अक्षय तृतीया को ईश्वर तिथि के नाम से इसलिए सम्बोधित किया जाता हैं. क्योंकि इस दिन श्री नारायण, परशुराम तथा हयग्रीव का अवतार हुआ था. इसलिए इस दिन इन तीनों देवों की जयंती भी मनाई जाती हैं.
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अक्षय तृतीया की कथा
प्राचीन काल में सदाचारी तथा देव – ब्रहामणों में विश्वास रखने वाला एकधर्मदास नामक वैश्य था. इसके परिवार के सदस्यों की संख्या बहुत ही अधिक थी. जिसके कारण धर्मदास हमेशा बहुत ही चिंतित तथा व्याकुल रहता था. धर्मदास को किसी व्यक्ति ने अक्षय तृतीया के व्रत के के महत्व के बारे में बताया. इसलिए इसने अक्षय तृतीया के दिन इस व्रत को करने की ठानी. जब यह पर्व आया तो धर्मदास ने प्रातः उठकर गंगा जी में स्नानकिया और इसके बाद पूरे विधि – विधान से देवी – देवताओं की पूजा की. उसने गोले (नारियल) के लड्डू, पंखा, चावल, दही, गुड़, चना, जौ, गेहूं, नमक, सत्तू, पानी से भरा हुआ मिटटी का घड़ा, सोना, वस्त्र तथा अन्य दिव्य वस्तुओं का दान ब्राह्मण को दिया. धर्मदास ने वृद्ध अवस्था में रोगों से पीड़ित होने पर तथा अपनी पत्नी के बार – बार माना करने पर भी दान – पुण्य करना नहीं छोड़ा.
ऐसा माना जाता हैं कि जब धर्मदास की मृत्यु हो गई तो उसने दुबारा से मनुष्य के रूप में जन्म लिया. लेकिन इस बार उसका जन्म एक प्रतापी और धनी राजा के रूप में हुआ. कहा जाता हैं कि धर्मदास ने धनी होने के बावजूद पुण्य कर्म करने इस जन्म में भी नहीं छोड़े तथा धनी और प्रतापी होने के बाद भी उसका मन कभी धर्म के कर्म करने से विचलित नहीं हुआ.
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अक्षय तृतीया के व्रत की विधि
- अक्षय तृतीया के दिन व्रत रखने का भी विधान हैं. इस दिन व्रत रखने वाले पुरुष तथा स्त्री ब्रहम मुहूर्तमें उठ जाएँ.
- उठने के बाद अपने घर के दैनिक कार्य कर लें और उसके पश्चात् शुद्ध जल से स्नान करें.
- स्नान करने के बाद पूजा शुरू करने के लिए एक विष्णु जी की प्रतिमा या तस्वीर लें और इसे अपने सामने रख लें.
- इसके बाद निम्नलिखित मन्त्र का उच्चारण कर व्रत का संकल्प लें.
मन्त्र
ममाखिलपापक्षयपूर्वक सकल शुभ फल प्राप्तये
भगवत्प्रीतिकामनया देवत्रयपूजनमहं करिष्ये।
- संकल्प लेने के पश्चात् भगवान विष्णु की प्रतिमा का पंचामृत से अभिषेककरें.
- अब विष्णु भगवान की षोडशोपचार विधि से पूजा करें, उन्हें सुगन्धित पुष्पों की माला अर्पित करें.
- नैवेद्य अर्पित करने के लिए जौ, गेहूं के दाने, सत्तू, ककड़ी तथा चने की दाललें.
- इसके बाद यदि सम्भव हो तो विष्णु सहस्रनामका जाप करें.
- अब विष्णु भगवान को तुलसी जल चढ़ाएं और इसके बाद विष्णु भगवान की आरती करने के बाद पूरे दिन उपवास रखें.
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