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अंगारक चतुर्थी : 7 नवंबर 2017 : क्या और कैसे मनाएं?

अंगारक चतुर्थी : 7 नवंबर 2017 : क्या और कैसे मनाएं?

अंगारक चतुर्थी : 7 नवंबर 2017 : क्या और कैसे मनाएं?
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अंगारक चतुर्थी : 7 नवंबर 2017 : क्या और कैसे मनाएं?

अंगारक चतुर्थी : 7 नवंबर 2017 : क्या और कैसे मनाएं?

अंगारक चतुर्थी 

  • देश भर में अंगारक चतुर्थी (मंगलवार, 07  नवम्बर, 2017 )को धूमधाम से मनाई जाएगी

अपनी कुंडली में मंगल दोष के चलते विवाह कार्य में आ रही अड़चनों तथा अन्य व्यक्तिगत व पारिवारिक बाधाओं को दूर करने के लिए देशभर से लोग उज्जैन स्थित अंगारेश्वर महादेव मंदिर में विशेष पूजा व भगवान शिव का रूद्राभिषेक करने बड़ी संख्या में क्षिप्रा के तट पर पहुंचेंगें।

मंगलवार को अंगारक चतुर्थी है। इस दिन विशेष पूजा-अर्चना से मंगल दोष का निवारण होता है। आचार्य पंडित “विशाल” दयानंद शास्त्री के अनुसार कुण्डली में जब प्रथम, चतुर्थ, सप्तम, अष्टम या द्वादश भाव में मंगल होता है तब मांगलिक दोष लगता है। इस दोष को शादी के लिए अशुभ माना जाता है। ऐसा कहा जाता है कि ये दोष जिनकी कुण्डली में होता है, उन्हें मंगली जीवनसाथी की ही तलाश करनी चाहिए।

हिन्दू धर्म शास्त्रों में के अनुसार भगवान श्रीगणेश कई रुपों में अवतार लेकर प्राणीजनों के दुखों को दूर करते हैं. श्री गणेश मंगलमूर्ति है, सभी देवों मेंसबसे पहले श्री गणेश का पूजन किया जाता है. श्रीगणेश क्योकि शुभता के प्रतीक है. पंचतत्वों में श्रीगणेश को जल का स्थान दिया गया है. बिना गणेशका पूजन किए बिना कोई भी इच्छा पूरी नहीं होतीहै. 

इनका पूजन व दर्शन का विशेष महत्व है.  इनके अस्त्रों में अंकुश एवं पाश है, चारों दिशाओं में सर्वव्यापकता की प्रतीक उनकी चार भुजाएँ हैं,उनका लंबोदर रूप “समस्त सृष्टि उनके उदर में विचरती है” का भाव है बड़े-बडे़ कान अधिकग्राह्यशक्ति का तथा आँखें सूक्ष्म तीक्ष्ण दृष्टि की सूचक हैं, उनकी लंबी सूंड महाबुद्धित्व का प्रतीकहै.

गणेश चतुर्थी के दिन विघ्नहर्ता श्री गणेश की पूजा का विधान है. श्री गणेश सुख सम्बृद्धि के देवता है. प्रथम पूजनीय भगवान गणेश बुद्धि के देवता  है। अपने नाम के ही अनुरूपगणेश सब विघ्नों /बाधाओं को हरने वाले है. ऐसी मानता है की  जो व्यक्ति गनेश चतुर्थी का व्रत करता है, उसकी सारी परेशानियों को श्रीगणेश हर लेते है. 

श्री गणेश चतुर्थी के दिन श्री विध्नहर्ता की पूजा-अर्चना और व्रत करने से व्यक्ति के समस्त संकट दूर होते है. 

सभी 12 माह में पड़ने वाली चतुर्थियों में माघ,श्रावण, भाद्रपद और मार्गशीर्ष माह में पडने वालीचतुर्थी का व्रत करना  विशेष कल्याणकारी रहता है।

पंडित “विशाल” दयानंद शास्त्री के अनुसार अगर लड़का व लड़की दोनों ही मंगली हो तो ही उनका विवाह संभव है। यदि मंगल दोष का निवारण किए बगैर विवाह किए जाते हैं, तो अकसर पति-पत्नी में जीवनभर गृह क्लेश ही बना रहता है। यही कारण है कि मंगली लड़का या लड़की के विवाह में काफी परेशानियां आती हैं। 

ज्योतिष में दोष निवारण के बाद मांगलीक लड़की या लड़के में से यदि कोई एक मांगलिक न भी हो, तब भी विवाह संपन्न किए जाने की बात कही गई है।

वैसे तो प्रत्येक माह में चतुर्थी की तिथि होती है, किंतु जिस माह में चतुर्थी तिथि मंगलवार के दिन पड़ती है, उसे अंगारकी चतुर्थी कहा जाता है। 

अंगारक चतुर्थी के दिन ज्योतिषों से पूरी जानकारी हासिल कर और कुछ विशेष उपाय किए जाएं तो मंगल दोष का निवारण संभव है।

हिंदू पंचांग के अनुसार प्रत्येक मास की कृष्ण पक्ष की चंद्रोदयव्यापिनी चतुर्थी तिथि को भगवान श्रीगणेश के लिए जो व्रत किया जाता है उसे गणेश चतुर्थी व्रत कहते हैं। जब यह व्रत मंगलवार के दिन आता है तो इसे अंगारक चतुर्थी कहते हैं। धर्म ग्रंथों के अनुसार जो भी यह व्रत करता है भगवान अंगारक उसकी हर इच्छा पूरी करते हैं। इस बार यह   अंगारक चतुर्थी व्रत 07 नवम्बर, 2017  (मंगलवार) को है।

जानिए अंगारक चतुर्थी पर दान का महत्व

अंगारक चतुर्थी के दिन शास्त्रानुसार लाल वस्त्र धारण करने से व किसी ब्रह्मण अथवा क्षत्रिय को मंगल की निम्न वास्तु का दान करने से जिनमें गेहू, गुड, माचिस, तम्बा, स्वर्ण, गौ, मसूर दाल, रक्त चंदन, रक्त पुष्प, मिष्टान एवं द्रव्य तथा भूमि दान करने से मंगल दोष कम होता है। लाल वस्त्र में मसूर दाल, रक्त चंदन, रक्त पुष्प, मिष्टान एवं द्रव्य लपेट कर नदी में प्रवाहित करने से मंगल जनित अमंगल दूर होता है।

भगवान श्री गणेश जी को चतुर्थी तिथि का अधिष्ठाता माना जाता है तथा ज्योतिष शास्त्र के अनुसार इसी दिन भगवान गणेश जी का अवतरण हुआ था, इसी कारण चतुर्थी भगवान गणेश जी को अत्यंत प्रिय रही है. इस वर्ष अंगारकी संकष्टी चतुर्थी व्रत कृष्णपक्ष की चंद्रोदय व्यापिनी चतुर्थी को भगवान गणेश जी की पूजा का विशेष नियम बताया गया है ।।

विघ्नहर्ता भगवान गणेश समस्त संकटों का हरण करने वाले होते हैं. इनकी पूजा और व्रत करने से सभी कष्ट दूर हो जाते हैं ।

प्रत्येक माह की चतुर्थी अपने किसी न किसी नाम से संबोधित की जाती है. मंगलवार के दिन चतुर्थी होने से उसे अंगारकी चतुर्थी के नाम से जाना जाता है।

 मंगलवार के दिन चतुर्थी का संयोग अत्यन्त शुभ एवं सिद्धि प्रदान करने वाला होता है. गणेश अंगारकी चतुर्थी का व्रत विधिवत करने से वर्ष भर की चतुर्थियों के समान मिलने वाला फल प्राप्त होता है.

अंगारकी गणेश चतुर्थी कथा 

गणेश चतुर्थी के साथ अंगारकी नाम का होना मंगल का सानिध्य दर्शाता है पौराणिक कथाओं के अनुसार पृथ्वी पुत्र मंगल देव जी ने भगवान गणेश को प्रसन्न करने हेतु बहुत कठोर तप किया. मंगल देव की तपस्या और भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान गणेश जी ने उन्हें दर्शन दिए और उन्हें अपने साथ होने का आशिर्वाद प्रदान भी किया. मंगल देव को तेजस्विता एवं रक्तवर्ण के कारण अंगारक नाम प्राप्त है इसी कारण यह चतुर्थी अंगारक कहलाती है।।

जानिए क्या हैं अंगारकी गणेश चतुर्थी का पौराणिक महत्व 

अंगारकी गणेश चतुर्थी के विषय में गणेश पुराण में विस्तार पूर्वक उल्लेख मिलता है, कि किस प्रकार गणेश जी द्वारा दिया गया वरदान कि मंगलवार के दिन चतुर्थी तिथि अंगारकी चतुर्थी के नाम प्रख्यात संपन्न होगा आज भी उसी प्रकार से स्थापित है. अंगारकी चतुर्थी का व्रत मंगल भगवान और गणेश भगवान दोनों का ही आशिर्वाद प्रदान करता है. किसी भी कार्य में कभी विघ्न नहीं आने देता और साहस एवं ओजस्विता प्रदान करता है. संसार के सारे सुख प्राप्त होते हैं तथा श्री गणेश जी की कृपा सदैव बनी रहती है.

इस दिन जरूर पढ़ें मयूरेश स्तोत्र

जीवन के किसी भी क्षेत्र में सफलता के लिए गणपति जी को सबसे पहले याद किया जाता है। परिवार की सुख-शांति, समृद्धि और चहुँओर प्रगति, चिंता व रोग निवारण के लिए गणेशजी का मयूरेश स्तोत्र सिद्ध एवं तुरंत असरकारी माना गया है। राजा इंद्र ने मयूरेश स्तोत्र से गणेशजी को प्रसन्न कर विघ्नों पर विजय प्राप्त की थी। 

इसका पाठ किसी भी चतुर्थी पर फलदायी है लेकिन अंगारक चतुर्थी पर इसे पढ़ने से फल सहस्त्र गुना बढ़ जाता है।

विधि : 

* सबसे पहले स्वयं शुद्ध होकर स्वच्छ वस्त्र पहनें  

* यदि पूजा में कोई विशिष्‍ट उपलब्धि की आशा हो तो लाल वस्त्र एवं लाल चंदन का प्रयोग करें

* पूजा सिर्फ मन की शांति और संतान की प्रगति के लिए हो तो सफेद या पीले वस्त्र धारण करें। सफेद चंदन का प्रयोग करें। 

* पूर्व की तरफ मुंह कर आसन पर बैठें। 

* ॐ गं गणपतये नम: के साथ गणेशजी की प्रतिमा स्थापित करें।

 निम्न मंत्र द्वारा गणेशजी का ध्यान करें। 

* ‘खर्वं स्थूलतनुं गजेंन्द्रवदनं लंबोदरं सुंदरं 

प्रस्यन्दन्मधुगंधलुब्धमधुपव्यालोलगण्डस्थलम्

दंताघातविदारितारिरूधिरै: सिंदूर शोभाकरं 

वंदे शैलसुतासुतं गणपतिं सिद्धिप्रदं कामदम।’

 फिर गणेशजी के 12 नामों का पाठ करें। किसी भी अथर्वशीर्ष की पुस्तक में 12 नामों वाला मंत्र आसानी से मिल जाएगा।(12 नाम हिंदी में भी स्मरण कर सकते हैं) 

आपकी सुविधा के लिए मंत्र 

‘सुमुखश्चैकदंतश्च कपिलो गजकर्णक: 

लंबोदरश्‍च विकटो विघ्ननाशो विनायक : 

धूम्रकेतुर्गणाध्यक्षो भालचंद्रो गजानन: 

द्वादशैतानि नामानि य: पठेच्छृणयादपि 

विद्यारंभे विवाहे च प्रवेशे निर्गमें तथा संग्रामेसंकटेश्चैव विघ्नस्तस्य न जायते’ 

 गणेश आराधना के लिए 16 उपचार माने गए हैं। 

 1. आवाहन 2. आसन 3. पाद्य (भगवान का स्नान‍ किया हुआ जल) 4. अर्घ्य 5. आचमनीय 6. स्नान 7. वस्त्र 8. यज्ञोपवित 9 . गंध 10. पुष्प (दुर्वा) 11. धूप 12. दीप 13. नेवैद्य 14. तांबूल (पान) 15. प्रदक्षिणा 16. पुष्‍पांजलि  

मयूरेश स्त्रोतम् ब्रह्ममोवाच 

‘पुराण पुरुषं देवं नाना क्रीड़ाकरं मुदाम। 

मायाविनं दुर्विभाव्यं मयूरेशं नमाम्यहम् ।। 

परात्परं चिदानंद निर्विकारं ह्रदि स्थितम् ।

गुणातीतं गुणमयं मयूरेशं नमाम्यहम्।। 

सृजन्तं पालयन्तं च संहरन्तं निजेच्छया। 

सर्वविघ्नहरं देवं मयूरेशं नमाम्यहम्।। 

नानादैव्या निहन्तारं नानारूपाणि विभ्रतम। 

नानायुधधरं भवत्वा मयूरेशं नमाम्यहम्।। 

सर्वशक्तिमयं देवं सर्वरूपधरे विभुम्। 

सर्वविद्याप्रवक्तारं मयूरेशं नमाम्यहम्।। 

पार्वतीनंदनं शम्भोरानन्दपरिवर्धनम्। 

भक्तानन्दाकरं नित्यं मयूरेशं नमाम्यहम्। 

मुनिध्येयं मुनिनुतं मुनिकामप्रपूरकम। 

समष्टिव्यष्टि रूपं त्वां मयूरेशं नमाम्यहम्।। 

सर्वज्ञाननिहन्तारं सर्वज्ञानकरं शुचिम्। 

सत्यज्ञानमयं सत्यं मयूरेशं नमाम्यहम्।। 

अनेककोटिब्रह्मांण्ड नायकं जगदीश्वरम्। 

अनंत विभवं विष्णुं मयूरेशं नमाम्यहम्।। 

मयूरेश उवाच 

 इदं ब्रह्मकरं स्तोत्रं सर्व पापप्रनाशनम्। 

सर्वकामप्रदं नृणां सर्वोपद्रवनाशनम्।। 

कारागृह गतानां च मोचनं दिनसप्तकात्। 

आधिव्याधिहरं चैव मुक्तिमुक्तिप्रदं शुभम्।। 

जानिए कैसे करें श्री गणेश अंगारकी चतुर्थी व्रत विधि एवं पूजा 

गणेश को सभी देवताओं में प्रथम पूज्य एवं विध्न विनाशक है. श्री गणेश जी बुद्धि के देवता है, इनका उपवास रखने से मनोकामना की पूर्ति के साथ साथ बुद्धि का विकास व कार्यों में सिद्धि प्राप्त होती है. श्री गणेश को चतुर्थी तिथि बेहद प्रिय है, व्रत करने वाले व्यक्ति को इस तिथि के दिन प्रात: काल में ही स्नान व अन्य क्रियाओं से निवृत होना चाहिए. इसके पश्चात उपवास का संकल्प लेना चाहिए. संकल्प लेने के लिये हाथ में जल व दूर्वा लेकर गणपति का ध्यान करते हुए, संकल्प में यह मंत्र बोलना चाहिए. “मम सर्वकर्मसिद्धये सिद्धिविनायक पूजनमहं करिष्ये”

इसके पश्चात सोने या तांबे या मिट्टी से बनी प्रतिमा चाहिए. इस प्रतिमा को कलश में जल भरकर, कलश के मुँह पर कोरा कपडा बांधकर, इसके ऊपर प्रतिमा स्थापित करनी चाहिए. पूरा दिन निराहार रहते हैं. संध्या समय में पूरे विधि-विधान से गणेश जी की पूजा की जाती है. रात्रि में चन्द्रमा के उदय होने पर उन्हें अर्ध्य दिया जाता है. दूध, सुपारी, गंध तथा अक्षत(चावल) से भगवान श्रीगणेश और चतुर्थी तिथि को अर्ध्य दिया जाता है तथा गणेश मंत्र का उच्चारण किया जाता है:-

गणेशाय नमस्तुभ्यं सर्वसिद्धिप्रदायक।

संकष्ट हरमेदेव गृहाणाघ्र्यनमोऽस्तुते॥

कृष्णपक्षेचतुथ्र्यातुसम्पूजितविधूदये।

क्षिप्रंप्रसीददेवेश गृहाणाघ्र्यनमोऽस्तुते॥

इस प्रकार इस संकष्ट चतुर्थी का पालन जो भी व्यक्ति करता है उसकी सभी मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं. व्यक्ति को मानसिक तथा शारीरिक कष्टों से छुटकारा मिलता है. भक्त को संकट, विघ्न तथा सभी प्रकार की बाधाएँ दूर करने के लिए इस व्रत को अवश्य करना चाहिए।।

जानिए गणपति आराधना में रखी जाने वाली सावधानियां को 

* गणेश को पवित्र फूल ही चढ़ाया जाना चाहिए। 

* जो फूल बासी हो, अधखिला हो, कीड़ेयुक्त हो वह गणेशजी को कतई ना चढ़ाएं। 

* गणेशजी को तुलसी पत्र नहीं चढ़ाया जाता। 

* दूर्वा से गणेश देवता पर जल चढ़ाना पाप माना जाता है…

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पंडित दयानन्द शास्त्री,
(ज्योतिष-वास्तु सलाहकार)
RW

Editorial Review Note

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By Religion World November 6, 2017 9 min read
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