कुर्बानी की परंपरा पर हर धर्म के धर्मगुरुओं की राय….
जमात-ए-इस्लामी हिंद , जमीयत उलेमा-ए-हिंद , ऑल इंडिया मुस्लिम मजलिस-ए-मुशवरात और ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड व मर्कजी जमीयत अहले हदीस ने एक संयुक्त बयान में कहा, “कुर्बानी सड़क, फुटपाथ या रास्तों पर नहीं करें, बल्कि खुली जगहों पर करे. कृपया उच्चस्तर की स्वच्छता व सफाई सुनिश्चित करें.”
मुस्लिम राष्ट्रीय के राजा रईस ने कहा, “जब हजरत इब्राहिम द्वारा किसी जानवर की कुर्बानी नहीं दी गई तो फिर मुस्लिम समाज में बकरीद के मौके पर जानवरों की कुर्बानी क्यों दी जा रही है। बकरीद में जानवरों की कुर्बानी के नाम पर जानवरों का कत्ल हो रहा है, यह कुर्बानी नहीं है।”
मुस्लिम मौलवी खालिद राशिद ने की सरकार से अपील, #BakraEid पर कुर्बानी की परमीशन केवल कसाईखाने में हो, लोग घर में कुर्बानी ना करें।
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क़ुर्बानी ही देनी है तो अपनी बुरी आदतों की दे, न कि किसी बेज़ुबान प्राणी की। जब हम किसी को प्राण दे नहीं सकते तो किसी के प्राण लेने का हक़ हमें किसने दिया। अपनी बुराइयों की क़ुर्बानी देने से अल्लाह ज़्यादा ख़ुश होंगे। किसी भी जीव (प्राणी) की जान लेने से अल्लाह कभी ख़ुश नहीं हो सकते। भगवान के लिए धर्म के नाम पर हिंसा मत फैलाओ। अच्छा सच्चा लगे तो इस संदेश को ज़रूर फैलाओं – आचार्य लोकेश, जैन संत
भागवताचार्य अनुरागकृष्ण शास्त्री :
कुर्बानी या बलि देनी ही है तो ख़ुद की बुराइयों की दो, बेज़ुबान पशुओं की नहीं। क्योंकि ब्रह्म,परमात्मा, भगवान् या अल्लाह – खुदा, कुछ भी कहो; सब ईश्वर ही है और वे सदैव सनातन धर्म के मूल वेद, पुराण या क़ुरान के माध्यम से हिंसा का निषेध ही करते हैं।
देखो भाई, ”भगवान् दो नहीं हुआ करता, खुदा अनेक नहीं होता, वो एक है और जितने इंसान उसने बनाये हैं वे इसी उद्देश्य से बनाये हैं –
‘मा ख़लक तल इन्स व ज़िन्न इल्लाले आबदून’
कुरआन में कहा गया कि खुदा ने इंसान को इसीलिए बनाया है कि वो खुदा को अर्पित हो, उसी की इबादत करे और सही सही इबादत करे, खुदा से ही जिसकी मुहब्बत हो….”
देखो, ईदुज्जुहा ईद; जिसे प्राय: लोग बक़रीद के नाम से जानते हैं, उस पर्व पर भी क़ुर्बानी दो, ऐसा कहीं नहीं लिखा या कहा गया है। बल्कि; ईदुज्जुहा पर्व अपनी गुनाहों की माफ़ी माँगने एवं पैग़म्बर मोहम्मद साहब के बताये हुए रसूलों पर चलने का पर्व है। इसी बात को परम विद्वान श्री कृपालु जी महाराज ने अपनी भाषा शैली में बताया है-
ईदुज्जुहा है आज गोविन्द राधे,
दिल को गुनाहों से तौबा करा दे।
ला इलाही लिल्लिल्लाह गोविन्द राधे,
मोहम्मदर्रसूल अल्लाह दिल में बिठा दे॥
बेज़ुबान पशुओं की बलि या क़ुर्बानी देना तो पाप है। अरे! सनातन धर्म में तो वाणी से भी किसी को पीड़ित कर देने को हिंसा माना गया है। अत: महाभारत में बलि या क़ुर्बानी को वेदों के द्वारा नहीं, अपितु; धूर्तों के द्वारा चलायी गई परम्परा बताया है।
सुरा मत्स्या पशोर्मांसं द्विजातीनां बलिस्तथा।
धूर्तै: प्रवर्तितं यज्ञे नैतद् वेदेषु कथ्यते॥
(महाभारत, शान्ति पर्व)
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