‘गावो विश्वस्य मातरः’ अर्थात् गाय विश्व की माता है।वैदिक परंपराओं में, गाय को दिव्य माता, गोमाता या गौमाता के रूप में देखा जाता था, जो स्वास्थ्य, ज्ञान और समृद्धि के आशीर्वाद से मानव-जीवन को पोषित करती हैं।
बंसी गीर गौशाला की स्थापना 2006 में भारत की प्राचीन वैदिक संस्कृति को पुनर्जीवित करने के प्रयास के रूप में श्री गोपालभाई सुतरिया द्वारा की गई थी। आधुनिक समय में, गौमाता मानव लालच का शिकार हो गई है। आज भारतीय समाज में गोसेवा का स्थान मात्र एक पशुपालन क्रिया के कार्य में परिवर्तित हो गया है। यहाँ तक की, अन्य पवित्र और दिव्य कार्यों की तरह, गोमाता का पालन भी आज मात्र एक उद्योग बन के रह गया है।
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दुनिया की समस्याओं का समाधान बाह्य (भौतिक) और आंतरिक (आध्यात्मिक) दोनों है। ऐसे में ‘गौमाता’ को वैदिक मूल्यों के अनुरूप उनकी मूल उत्कृष्ट स्थिति में पुनःस्थापित करने की आवश्यकता है। उनके आशीर्वाद के साथ, बंसी गीर गौशाला भारत की प्राचीन वैदिक ‘गोसंस्कृति’ को पुनर्जीवित करने के लिए एक जीवित प्रयोगशाला के रूप में काम कर रही है, और आधुनिक जीवन के सभी पहलुओं में वैदिक प्रतिमानों का परीक्षण करती है, चाहे वह पोषण, स्वास्थ्य, शिक्षा, कृषि या व्यवसाय ही क्यों न हो।
संस्थापक – श्री गोपालभाई सुतरिया
श्री गोपालभाई सुतरिया बंसी गीर गौशाला के संस्थापक हैं। गोपालभाई का जन्म 1977 में भावनगर (गुजरात) में हुआ था। 2006 में वे अहमदाबाद आए और बंसी गीर गौशाला की स्थापना की। अगले बारह वर्षों में उन्होंने गीर गौमाता के 18 गोत्रों के विभिन्न पहलुओं का अध्ययन किया, और उन्हें गौशाला में एकत्र किया। आज बंसी गीर गौशाला में 700 से अधिक गीर गौमाता और नंदी हैं। गोपालभाई के प्रयासों के परिणामस्वरूप, बंसी गीर गौशाला गोपालन और गोकृषि के क्षेत्र में एक आदर्श बन गई है। ‘स्वस्थ नागरिक, स्वस्थ परिवार, स्वस्थ भारत’ के उद्देश्य से, बंसी गीर गौशाला आयुर्वैदिक उपचार के क्षेत्र में प्रभावशाली अनुसंधान और निर्माण का कार्य भी कर रही है। 2017 में भारत सरकार द्वारा बंसी गीर गौशाला को कामधेनु पुरूस्कार भी प्राप्त हो चुका है। यह भारत की पहली क्रमांकित गौशाला है और गीर गायों के संवर्धन के साथ इसकी पवित्रता और विश्वसनीयता के कारण बंसीगीर गौशाला भारत की नंबर 1 गौशाला घोषित की जा चुकी है।
गतिविधियाँ जो इस गौशाला को विशेष बनाती हैं
बंसी गीर गौशाला ( श्री गोपालभाई सुतरिया ) में कई गतिविधियाँ सुचारू रूप से कार्य कर रही हैं जिससे यह गौशाला अन्य गौशालाओं से खुद को विशिष्ट बनाती है-
आदर्श गोपालन
गैर-शोषणकारी संबंध – इस गौशाला में नंदी या वृद्ध गौमाता का साथ कभी नहीं छोड़ा जाता। कभी भी गौमाता को दिए जाने वाले भोजन और पानी की गुणवत्ता या मात्रा पर कोई समझौता नहीं किया जाता, भले ही वह कितना भी दूध दे। यहाँ प्रजनन के लिए या दूध के उत्पादन को बढ़ाने के लिए कृत्रिम गर्भाधान या हार्मोन उपचार का उपयोग नहीं किया जाता। इस गौशाला में गौमाता की देखभाल के लिए 36 गोपालकों का एक अनुभवी कार्यबल है।
अहिंसक – यहाँ ‘दोहन’ की प्राचीन भारतीय परंपरा का पालन किया जाता हैं, जिसके अनुसार बछड़ा दो आंचल से दूध पीने के लिए स्वतंत्र है, और शेष दो आंचल का उपयोग मनुष्यों सहित अन्य प्राणियों के लिए दूध प्राप्त करने के लिए किया जा सकता है।
आयुर्वेद का उपयोग-स्वास्थ्य और जीवनशक्ति बढ़ाने के लिए विभिन्न आयुर्वैदिक जड़ी बूटियों को मौसम और ऋतु के आधार पर गौमाता के भोजन में मिलाया जाता है। जहां तक संभव हो, बीमार गौमाता का इलाज भारतीय आयुर्वैदिक प्रणाली का उपयोग करके किया जाता है, और आधुनिक चिकित्सा का उपयोग कम से कम किया जाता है।
जैविक आहार – बंसी गीर गौशाला में 4 लाख गज से अधिक खुली चराई की जगह है जिसका पोषण जैविक खाद द्वारा किया जाता है। इस गौशाला के शोध और अवलोकन के अनुसार गौमाता जिंजुआ किस्म की घास को पसंद करती है। यह घास अन्य व्यावहारिक लाभों के साथ, पोषण और औषधीय मूल्य में समृद्ध है।
एक बार लगाए जाने के बाद, यह घास 30 से अधिक वर्षों तक भूमि नहीं छोड़ती है, और यह हर 20 दिनों में 2 से 2 .5 फीट तक बढ़ती है। अपनी ‘जिंजुआ घास योजना’ के तहत, किसानों के लिए मुफ्त जिंजुआ घास के बीज की व्यवस्था की जाती है। अब तक 5000 से अधिक किसानों ने इस योजना का लाभ उठाया है।
वैदिक अनुष्ठान और संगीत – गौशाला अपने दिव्य वातावरण की पवित्रता को बनाए रखने के लिए दैनिक वैदिक हवन करती है।भक्ति संगीत और संस्कृत मंत्र भी हर दिन पृष्ठभूमि में बजाए जाते हैं, जो गौमाता को आनंदित और स्वस्थ रखने में मदद करता है।
नंदी गीर योजना – बंसी गीर गौशाला भारतीय गौमाता की नस्ल को मजबूत करने के लिए नंदी को समग्र भारत में विश्वसनीय गौशाला और गांवों में प्रजनन के लिए देती है। यहाँ कभी गौमाता या नंदी को बेचा नहीं जाता बल्कि नंदी को सीमित अवधि के लिए आमतौर पर 3 साल तक के लिए दिया जाता है ।
आयुर्वैदिक दवाएं
बंसी गीर गौशाला ने औषधीय और साथ ही पंचगव्य आधारित अवयवों के संयोजन का उपयोग करके आयुर्वैदिक दवाओं की एक विस्तृत शृंखला विकसित की है। आयुर्वेद में, घी और गोमूत्र को प्राकृतिक जैव-संवर्धक के रूप में वर्णित किया जाता है, इन दो अवयवों के साथ संसाधित या सेवन की जाने वाली दवाओं के अवशोषण और प्रभावशीलता में महत्त्वपूर्ण बढ़ावा होता है। खांसी, हार्मोनल असंतुलन, अस्थमा और कैंसर जैसी कई तरह की बीमारियों में हमने अपने घी और गोमूत्र आधारित दवाओं के उपयोग से उल्लेखनीय परिणाम प्राप्त किए हैं।
मुफ्त आयुर्वैदिक परामर्श- आम जनता के लिए इस गौशाला में एक मुफ्त आयुर्वैदिक निदान और उपचार क्लिनिक है।
कृषि
जैविक खेती – इस गौशाला का मानना है कि कृषि उत्पादन के लिए प्राकृतिक तरीकों को अपनाने की तत्काल आवश्यकता है।एक उदाहरण के रूप में, इसके अनुसन्धान के अनुसार छाछ, गौमूत्र और पानी का एक प्रोबायोटिक संयोजन यूरिया की तुलना में तेजी से परिणाम देता है, और यह पौधे की प्रतिरक्षा और विकास में सुधार करता है। गोमय (गौमाता का गोबर) आधारित खाद आगे चलकर कृषि उत्पादकता को बढ़ा सकती है और जैविक खेती को बनाए रख सकती है। वैदिक काल में भारतीय किसान गोपालन और कृषि के बीच तालमेल का पूरा फायदा उठाते थे। यह गौशाला हर साल अनेक किसानों के साथ काम करते हैं और उन्हें सामग्री (जैसे तरल प्रोबायोटिक) और ज्ञान प्रदान करते हैं। जैविक खेती का ज्ञान प्राप्त करने के लिए हर दिन भारत भर से किसान इस गौशाला में आते हैं।
सूर्यन ऑर्गेनिक, बंसी गीर गौशाला के आदर्शों से प्रेरित उद्यम है। इसका उद्देश्य आहार के विषय में लोगों की सोच को बदलना है। सूर्यन ऑर्गेनिक का उद्देश्य किसानों को नए उत्पादों और विपणन के साथ अपने व्यवसाय को विकसित करने में मदद करना भी है।
शिक्षा
गोमाता को ‘गुरुमाता’ भी कहा जाता है, और संस्कृत में ‘गो’ शब्द का अर्थ ‘प्रकाश’ भी होता है। भारत के प्राचीन वैदिक विचारों को शिक्षा के क्षेत्र में लागू करने के प्रयास में, इस गौशाला परिसर में ‘गोतीर्थ विद्यापीठ’ गुरुकुल की स्थापना की गयी, जहाँ बच्चों को प्राचीन वैदिक परंपराओं के आधार पर शिक्षित किया जाता है। यहाँ कोई परीक्षा या प्रमाणपत्र नहीं हैं, और शिक्षक छात्रों पर कोई दबाव डाले बिना समय-समय पर मूल्यांकन करते हैं। वैदिक शिक्षा और गौमाता आधारित पोषण का उपयोग करके अपने बच्चों की बौद्धिक और शारीरिक क्षमताओं में उल्लेखनीय परिणाम प्राप्त किए जा चुके हैं। यहां छात्र अन्य विषयों के साथ वैदिक गणित, गोपालन, कृषि, योग, आयुर्वेद और संगीत सीखते हैं। यहां शैक्षिक वातावरण प्राचीन ‘गुरु-शिष्य परम्परा’ के अनुरूप है, और कई छात्र परिसर में ही रहते हैं।
Editorial Review Note
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