बौद्ध धर्म: जानिए क्या है बौद्ध दर्शन और बौद्ध संगीति
क्या है बौद्ध दर्शन

महात्मा बुद्ध ने बहुत ही व्यावहारिक दर्शन देने की कोशिश की है. वे आत्मा एवं ब्रह्म से संबंधित विवाद में नहीं उलझना चाहते थे. उन्होंने आत्मा की सत्ता को अस्वीकार कर दिया. भारतीय धर्म के इतिहास में यह एक क्रांतिकारी कदम था. सृष्टि के विषय में बौद्ध धर्म की अलग मान्यता है. वह यह कि सृष्टि दुखमय है, यह सृष्टि क्षणिक है और सृष्टि आत्माविहीन है. बौद्ध धर्म का मानना है कि आत्मा नहीं है और जिसे हम एक व्यक्ति के रूप में जानते हैं वस्तुत: वह भौतिक एवं मानसिक तत्वों के पाँच स्कधों से निर्मित है. जो निम्नलिखित हैं-
- रूप
- संज्ञा
- वेदना
- विज्ञान
- संस्कार.
बौद्ध धर्म कर्म एवं पुनर्जन्म के सिद्धांत में विश्वास करता है.
बौद्ध धर्म के अनुसार, प्रत्येक कार्य का एक कारण होता है और प्रत्येक कारण का एक कार्य. महात्मा बुद्ध ने कार्य-कारण श्रृंखला के 12 तत्वों को उद्घाटित किया है-
- अविद्या
- संस्कार
- विज्ञान
- नामरूप
- षडायतन (अर्थात् मन सहित पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ)
- स्पर्श
- वेदना
- तृष्णा
- उपादान
- भव
- जाति
- जरा-मरण
प्रत्युतसमुत्पाद-
इस दर्शन की मान्यता है कि जिस तरह दुख का कारण जन्म है, उसी तरह जन्म का कारण कर्म-फल रूपी चक्र है. बौद्ध दर्शन में नैरात्मवाद एवं क्षणभंगवाद भी महत्वूर्ण है. महात्मा बुद्ध ने चार आर्य सत्यों पर बल दिया है ये चार आर्य सत्य हैं-
- दुःख
- दुःख का कारण
- दुःख का निदान
- दुख के निदान के उपाय
दुःख के निदान के वह उपाय हैं आष्टांगिक मार्ग, जो निम्नलिखित हैं-

- सम्यक दृष्टि
- सम्यक संकल्प
- सम्यक वाणी
- सम्यक कर्म
- सम्यक निर्वाह या आजीव
- सम्यक व्यायाम
- सम्यक स्मृति
- सम्यक ध्यान या समाधि
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बौद्ध दर्शन में चक्र

बौद्ध दर्शन में यह सृष्टि विभिन्न चक्रों में विभाजित है. उसमें एक बुद्ध चक्र होता है तो दूसरा शून्य चक्र.
हम भाग्यशाली हैं कि हम बुद्ध चक्र में हैं. इनमें चार बुद्धों ने उपदेश दिया–
- क्रकच्छन्दा,
- कनक मुनि
- कश्यप
- शाक्य मुनि
- मैत्रेय (आने वाले बुद्ध).
बौद्ध धर्म में त्रिरत्न हैं- बुद्ध, संघ और धर्म.
बौद्ध धर्म में दस शील भिक्षुओं के लिए तथा पाँच गृहस्थों के लिए हैं.
ये दस शील इस प्रकार हैं-
- अहिंसा
- सत्य
- अस्तेय
- अपरिग्रह
- ब्रह्मचर्य
- नृत्य गान का त्याग
- श्रृंगार-प्रसाधनों का त्याग
- समय पर भोजन करना
- कोमल शय्या का व्यवहार नहीं करना
- कामिनी कांचन का त्याग
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बौद्ध संगीति
प्रथम बौद्ध संगीति-
यह बुद्ध की मृत्यु के बाद राजगृह में अजातशत्रु के काल में हुई. इसकी अध्यक्षता महाकश्यप नामक आचार्य ने की. इस संगीति में उपालि ने विनयपिटक का पाठ किया और आनन्द ने सुतपिटक का.
दूसरी बौद्ध संगीति-
यह लगभग बुद्ध की मृत्यु के 100 साल बाद वैशाली में हुई. उस समय वैशाली का शासक कालाशोक था. इसकी अध्यक्षता स्थविर यश या सर्वकामिनी ने की. इस सम्मेलन में दो गुटों के बीच तीव्र मतभेद उभरा. पूर्वी गुट और पश्चिमी गुट के बीच. पूर्वी गुट में वैशाली तथा मगध के भिक्षु थे पश्चिम गुट में अवन्ति के भिक्षु थे. पूर्वी गुट वज्जिपुतक कहलाए. अनुशासन के दस नियमों पर मतभेद उभरा. पूर्वी गुट महासंघिक या आचार्य वाद कहलाने लगा. पश्चिमी गुट थेरवादी. अंत में तहरवाद 11 पंथों में साहसिक और महासंघिक 7 पंथों में विभाजित हो गए. ये मूल रूप में हीनयानी पंथी थे किन्तु उनमें से कुछ ने कुछ इस प्रकार के सिद्धांतों को अपनाया जो महायान के उत्थान के लिए उत्तरदायी सिद्ध हुआ. महासांघिक संप्रदाय के अनुयायी यह स्वीकार करते थे कि प्रत्येक व्यक्ति में बुद्धत्व प्राप्ति की स्वामानिक शक्ति है. समय और संयोग से सभी को बुद्धत्व मिल सकता है. वस्तुत: प्राप्ति के नौ भेद माने गए- मूल महासंघिक, एक व्यवहारिक, लोकोत्तरवाद, कौरू कुत्लका, बहुश्रुतीय, प्रज्ञातिवाद, चैत्य-शैल, अवर शैल, और उत्तर शैल. तिब्बती परंपरा के अनुसार महकच्चायन ने थेरवाद संप्रदाय की स्थापना की. राहुलभद्र नामक आचार्य ने थेरवाद के एक उपसंप्रदाय, सर्वास्तिवादी की स्थापना की. सर्वास्तिवादी संप्रदाय को बाद में वैभेषिक के नाम से जाना जाने लगा. महासंघिका संप्रदाय प्रारंभ में वैशाली में और फिर समस्त उत्तर भारत में फैल गया. बाद में इसका प्रसार आंध्रप्रदेश में हुआ और इसका महत्वपूर्ण केद्र अमरावती और नागर्जुनकोंडा हो गया.
तीसरी बौद्ध संगीति
यह अशोक के समय पाटलिपुत्र में हुई. इसकी अध्यक्षता मोगालिपुत्त तिस्स ने की. तीसरे बौद्ध संगीति को थेरवादियों की सभा विचारों का मोगालिपुत्त तिस्स ने महासांघिक मतों का खण्डन करते हुए अपने ही सिद्धान्तों को बुद्ध के मौलिक सिद्धान्त घोषित किया. उन्होंने कथावत्थु नामक ग्रन्थ का संकलन किया जो अभिधम्म पिटक के अंतर्गत आता है. इस प्रकार बुद्ध की शिक्षाओं के तीन भाग हो गए- सत्त, विनय तथा अभिधम्म. इन्हें लिपिटक की संख्या दी जाती है. इस सम्मेलन की प्रामाणिकता संदिग्ध मानी जाती है क्योंकि अशोक के किसी अभिलेख में इसकी चर्चा नहीं है.
चौथी बौद्ध संगीति-
यह कश्मीर के कुंडलवन में हुई. इसके लिए पार्श्व नामक विद्वान् ने कनिष्क को परामर्श किया. वसुमित्र इसका अध्यक्ष था जबकि उपाध्यक्ष अश्वघोष था. ह्वेनसांग और लामा तारानाथ ने भी इस सम्मेलन की चर्चा की है. माना जाता है कि एक सर्वास्तिवादी संप्रदाय के भिक्षु कात्यायन पुत्र ने कश्मीर जाकर 500 बोधिसत्व की सहायता से महाविभाष नामग ग्रंथ की रचना की. इसी सम्मेलन में हीनयान और महायान में विभाजन हुआ.
पांचवीं बौद्ध संगीति
पांचवीं बौद्ध संगीति राजा मिंडन के संरक्षण के तहत साल 1871 में मांडले, बर्मा में आयोजित की गयी थी. इसकी अध्यक्षता जगराभीवाम्सा, नरींधाभीधाजा और सुमंगलासामी द्वारा की गयी थी. इस संगीति के दौरान, 729 शिलाखंड बौद्ध शिक्षाओं के साथ उत्कीर्ण किये गये थे.
छठी बौद्ध संगीति
छठी बौद्ध संगीति का आयोजन 1954 में बर्मा के काबाऐ, यगूंन में किया गया था. इसका आयोजन बर्मा की सरकार के संरक्षण के तहत हुआ था और इसकी अध्यक्षता प्रधानमंत्री यूनू द्वारा की गयी थी. संगीति का आयोजन बौद्ध धर्म के 2500 साल पूरे होने के उपलक्ष्य में किया गया था.
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