कथा क्रम : पितृपक्ष में फल्गु नदी के तट पर भागवत कथा
गया में एक ओर पितृपक्ष पर श्राद्ध और तर्पण की पंरपरा निभाई जा रही है, दूसरी ओर फल्गु नदी के किनारे श्रीमद् भागवत की सलिला बहा रहे हैं भागवताचार्य संजय कृष्ण सलिल जी महाराज।
दूसरे दिन की कथा में आज फल्गु नदी की महिमा की विस्तार से चर्चा हुई…
गंगा स्नान करते हो तुम पवित्र होते हो, तीथार्टन करते हो तुम पुण्य अर्जित करते हो, पर्यटन करतते हो तो तमु प्रफुल्लित होते हो, परंतु गया तीर्थ की महिमा है फल्गु स्नान या मार्जन करते हो तो बोलते हो समस्त पितृणां तरण कामश्च आत्मनश्च मुक्ति प्रापये फल्गु स्नानं अहं करिष्यते। अर्थात सभी पितरों को तारणे और स्वयं मुक्ति प्राप्ति के लिए फल्गु स्नान कर रहे हैं।


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सभी पितरों को अलग-अलग पिण्ड देते हो अच्छी बात है। पिण्ड का आकार बेल या आंवले के समान होती है, पर गया धाम का इतना बड़ा हृदय है “समी पत्र प्रमाणेन पिण्डं दधात गया शिरे तारयेत सप्त गोत्राणाम एक विंशोतरम शतम” अर्थ कि शमी की छोटी की पत्ती के प्रमाण से एक पिण्ड गया तीर्थ में देते हो को सात गोत्र के सभी पितर तर जाते हैं।
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