पितृपक्ष में गया धाम में श्रीमद् भागवतकथा
भागवताचार्य संजयकृष्ण सलिलजी महाराज की भागवकथा गया नगर में चल रही है। पितृपक्ष के दिनों में गया धाम में इस कथा में श्राद्ध से लेकर पुरखों के लिए किए जाने वाली परंपराओं का विशेष उल्लेख किया जा रहा है। आज तीसरे दिन की कथा में श्राद्ध की महिमा का विस्तार से जिक्र किया गया।

इस जगत में जितने लोग हैं सभी के कर्म अलग-अलग हैं, फल भी अलग। शिक्षा, दीक्षा, संपत्ति, भोग, ऐश्वर्य, दान, पुण्य, धर्म, कर्म सभी अलग अलग होते हैं। पिण्ड के आकार, प्रमाण मिलता है कि बेल या आंवसे के आकार के होना चाहिए। प्रत्येक प्राणी के अलग-अलग पिण्डदान करें, और नहीं तो नहीं।

गया धाम में पिण्डदान का इतना महत्व है कि शमी की एक पत्ती के प्रमाण से भई एक पिण्ड शिरवेदी पर दिया जाए तो सात गोत्र और एक सौ एक कुल का उद्धार होता है। वायु पुराण इसका प्रमाण है।
शमी पत्र प्रमाणेम पिण्डं दधाति गया शिरे
तारयेत सप्त गोत्रायां एक विंशोत्तर शतम्।।
सात गोत्र में पिता माता, बहिन, पुत्री, भाई, बुआ मौसी इसमें एक सौ एक आते हैं. ये है गया धाम की महिमा।
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