भय्यु जी महाराज : मालवा के मॉडल संत, जानिए कैसा था उनका जीवन…
आध्यात्मिक गुरु भय्यूजी महाराज ने मंगलवार को कथित रूप से गोली मारकर खुदकुशी कर ली. मीडिया रिपोर्टों में सूत्रों के हवाले से कहा गया है कि घटना के बाद भय्यूजी को इंदौर के बॉम्बे अस्पताल ले जाया गया जहां डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया.
कौन थे भय्यु जी महाराज ?
आध्यात्म की दुनिया में आने से पहले भय्यूजी को लोग उदय सिंह देशमुख के नाम से जानते थे. भय्यूजी का जन्म 1968 में शाजापुर के शुजालपुर में एक जमींदार परिवार में हुआ था. भय्यूजी का अध्यात्म और दर्शन के प्रति लगाव बचपन से ही रहा और वह तलवारबाजी और घुड़सवारी का भी शौक रखते थे.
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कैसी थी उनकी राजनीतिक पकड़ ?
भय्यू महाराज ने 2011 में लोकपाल आंदोलन के समय बड़ी भूमिका निभाई थी. बताया जाता है कि अन्ना का अनशन तुड़वाने के लिए केंद्र सरकार ने दूत बनाकर भेजा था. बतौर मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी का भी सद्भावना उपवास भय्यू महाराज ने ही तुड़वाया था.
पूर्व राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल, पीएम नरेंद्र मोदी, महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री विलासराव देखमुख, शरद पवार, लता मंगेशकर, उद्धव ठाकरे और मनसे के राज ठाकरे, आशा भोंसले, अनुराधा पौडवाल, फिल्म एक्टर मिलिंद गुणाजी भी उनके आश्रम आ चुके हैं.

भय्यू महाराज के कई दलों के दिग्गज नेता और बिजनेसमैन भी फॉलोअर हैं और धार्मिक मामलों पर इनसे सलाह ली जाती रही है. भय्यू महाराज की वेबसाइट पर दावा किया गया है कि वह एक आध्यात्मिक नेता, समाज सुधारक और मोटिवेटर हैं. जिनका मात्र एक उद्देश्य है देश के गरीब-गुरबों के चेहरे पर खुशी लाना है. पिछले साल वह तब सुर्खियों में आए थे जब उन्होंने इंदौर की एक लड़की डॉ. आयुषी से शादी की थी. उनकी पहली पत्नी माधवी का 2015 में निधन हो गया था.
प्रभावशाली था कैबिनेट मंत्री का रुतबा

मध्य प्रदेश में पिछले दिनों ‘नर्मदा घोटाला रथ यात्रा’ निकालने की घोषणा करने वाले कंप्यूटर बाबा और पंडित योगेंद्र महंत सहित पांच सांधुओं को शिवराज सिंह चौहान सरकार ने राज्यमंत्री का दर्जा देने की घोषणा की थी. अन्य तीन संतों में भय्यूजी महाराज, नर्मदानंद महाराज, हरिहरनंद महाराज के नाम शामिल था. मध्य प्रदेश की शिवराज सरकार ने नर्मदा नदी के लिए एक विशेष समिति का गठन भी किया. आदेश में कहा गया है कि राज्य सरकार ने इस समिति के 5 विशेष सदस्यों को राज्यमंत्री का दर्जा दिया है. राज्य सरकार ने कहा कि इन साधुओं का सामाजिक योगदान ज्यादा है. हालांकि सरकार की इस घोषणा को साल के अंत में होने जा रहे विधानसभा चुनावों के साथ जोड़कर भी देखा गया था.
आध्यात्मिक गुरु की जो छवि हमारे जेहन में उभरती है, वह उससे काफी हद तक अलग थे।
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