भूत–चतुर्दशी एवं Halloween !

पाश्चात्य देशों में मनाया जाने वाला एक त्यौहार हेलोवीन है, जिसकी विचारधारा भारतीय परिपाटी में मनाये जाने वाले त्योहारों से काफी मिलती जुलती है। दीपावली के ठीक एक दिन पहले मनाये जाने वाली छोटी दिवाली जो कि नरक–चतुर्दशी, भूत–चतुर्दशी एवं यम–पूजा के नाम से भी जानी जाति है, जिसमे बिलकुल हेलोवीन जैसी मान्यता है। पाश्चात्य देशो में मनाये जाने वाला यह हेलोवीन त्यौहार बहुत ही पुराना है। यह ईसापूर्व से मनाया जाने वाला त्यौहार है, जिसमें यह माना जाता है कि हेलोवीन के दिन मरे हुए लोग अपने कब्र से जाग जाते हैं। और अपने घर वापिस आकर अपने घर वालो व् रिश्तेदारों को डराते एवं परेशान करते हैं। अतः इस दिन लोग उनसे बचने और भूत प्रेतों से स्वयं को बचाने के लिए वो भूतिया डरावने कपडे पहनते हैं, और भूतों जैसा श्रृंगार कर लेते हैं। साथ ही घर के बहार रोशनी भी करते हैं मोमबत्तिया जला कर। भूत–चतुर्दशी की तरह यह त्यौहार भी प्रत्येक वर्ष अक्टूबर महीने के अंत में बिलकुल दीपावली के आस पास ही मनाया जाता है।
हेलोवीन की भाँती भारतीय परिवेश में भूत–चतुर्दशी में भी लगभग यही मान्यता है। भूत–चतुर्दशी की रात भूतों की रात होती है। यहाँ सिर्फ भूतों के आने की ही नहीं इस रात को स्वयं मृत्यु दाता यमराज आगमन की रात बताई जाती है | यह मान्यता वैसे एक पौराणिक कथा से सम्बन्ध रखती है। एक समय, मृत्यु के देवता यमराज के यमदूत एक राजा को नरक ले जाने के लिए आये, तब राजा ने यमराज से प्रार्थना कर के कहा “हे यमदेव कृपया आप मुझे और एक वर्ष का समय दें, फिर मैं आपकी इक्षा अनुसार चल पडूंगा ” तब यमराज ने कहा “ठीक है राजन मैं तुम्हे एक वर्ष का और समय देता हूँ “। तब राजा ने एक वर्ष तक ऋषि मुनियों के सानिध्य में जाकर तपस्या की और कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष के चतुर्दशी को व्रत किया और अपने पापो से मुक्ति प्राप्त कर नरक से बच गए। भारतीय परिवेश में इस कार्तिक मास के कृष्ण चतुर्दशी को यम पूजा की जाती है | माना जाता है कि इस दिन घर के द्वार पर यमदूत आते हैं। कुछ राज्यों में मान्यता है कि भूत प्रेत भी यमदूत के रूप में आते हैं। अतः उनकी पूजा आज के दिन करनी चाहिए और यमदूतों एवं यमराज के सम्मान में घर के द्वार पर पूरब दिशा में खड़े होकर दीप जला कर दीप–दान करना चाहिए। घर से पुराने गैरुपयोगी वस्तुओं को बाहर निकाल देना चाहिए एवं पुरे घर की सफाई करनी चाहिए।
इन दो त्योहारों की एक जैसी मान्यता पुरे विश्व इतिहास में एक ही संस्कृति के प्रसार की और भी संकेत करता है | इस तरह से और भी कई बाते हैं जो ये प्रमाणित करती हैं कि एक समय में पश्चिमी देशों में समान मान्यता और संस्कृति के लोग रहते थे | अमेरिका कनाडा जैसे देशों में भूत प्रेत की मान्यता आम जनता में आज भी बहुत व्याप्त है | लेकिन प्रश्न उठता है, फिर इस मान्यता को पाखंड या अन्धविश्वास से कैसे जोड़ दिया जाता है ? बहुत सारे ऐसे लोग हैं जो प्रेत बाधा से पीड़ित रहते हैं, और कोई डॉक्टर उनकी बीमारी नहीं समझ पाता है | बिना जाने किसी तथ्य को मानना अंधविश्वास ही है | परन्तु बिना अनुसन्धान किये किसी तथ्य को नकार देना भी एक प्रकार का अंधविश्वास ही है | दुनिया उतनी ही नहीं जितना कि मनुष्य इन दो आँखों से देख सकता है | अलग अलग जीवों की आँखे भी अलग अलग हैं और उनके देखने की क्षमता भी अलग अलग ही होती है | बहुत कुछ ऐसा भी है जो इन दो आँखों से नहीं परन्तु अंतर–चक्षु से देखा जा सकता हैं | प्रेतात्मवाद अपने आप में एक बृहत् विषय है | कई वैज्ञानिकों ने इसकी पुष्टि की है और कई इस पर अनुसन्धान करने में लगे हैं | लेकिन इस संसार में कुछ ऐसे लोग भी हैं जिन्हें किसी अनुसन्धान की आवश्यकता नहीं है | उनके अन्दर प्राकृतिक क्षमता होती है भूत–दर्शन की अथवा वो कुछ आध्यात्मिक साधनों से अपने अन्दर ऐसी क्षमता विकसित कर लेते हैं |
आज का आधुनिक विज्ञान इतना तो समझने लगा है की उर्जा कभी नष्ट नहीं होती | फिर मृत्यु के उपरांत जीवन उर्जा कहाँ जाती है ? इस प्रश्न का उत्तर सब प्राप्त नहीं कर पाते | और भूत प्रेत सम्बन्धी बिमारियों एवं पीड़ा का उत्तर मेडिकल डॉक्टर के पास क्यों नहीं होता ? यही ज्वलंत प्रश्न आधुनिक युग में खड़ा है | कई मानते हैं, तो कई नहीं मानते हैं, भूत प्रेतों का अस्तित्व | परन्तु आज के आधुनिक वैज्ञानिक अविष्कारों के युग में भी ऐसी प्रथाएं प्रचलित हो रही हैं | कारण क्या है ? एक तरफ वैज्ञानिक दृष्टिकोण दूसरी तरफ प्रथावादी (orthodox) विचारधारा का प्रसार कैसे हो रहा ? सत्य क्या है क्यों लोग भूत प्रेत जैसी प्रथाओं का अनुसरण कर रहे हैं ? क्यों इस मान्यता का प्रसार हो रहा है ? क्या भौतिक विज्ञान के अविष्कार एवं खोज मनुष्य की समस्याओं का समाधान नहीं कर पा रहे ?
मनुष्य का प्रकृति एवं अन्य जीवों के साथ एक भावनात्मक सम्बन्ध है | और भाव–जगत में कुछ ऐसे भी जीव हैं जो स्थूल दृष्टि से कदापि दृष्टिगोचर नहीं होते | इस भाव–जगत के विज्ञान को समझने के लिए अंतर्मुखी होने के विज्ञान को समझाना होगा | आध्यात्मिक जगत में प्रवेश करना होगा जो कि स्थूल भौतिक इन्द्रियों के जगत के परे है |
(इस विषय पर और जानकारी के लिए लेखक से संपर्क कर सकते हैं )
मनीष देव
Courtesy : https://divyasrijansamaaj.blogspot.com
Editorial Review Note
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