भगवान झूलेलाल का जन्मोत्सव ‘चेटीचंड’
भारत में विभिन्न धर्मों, समुदायों और जातियों का समावेश है इसलिए यहाँ अनेकता में एकता के दर्शन होते हैं। यह हमारे देश के लिए गर्व की बात है कि यहाँ सभी धर्मों के त्योहारों को प्रमुखता से मनाया जाता है चाहे वह दीपावली हो, ईद हो, क्रिसमस हो या भगवान झूलेलाल जयंती।

“चेटीचंड” जो कि झूलेलाल जी का प्राकट्य दिवस है जो मुख्यत: सिंधी समाज द्वारा मनाया जाता है। भारत के अलावा पाकिस्तान में भी चेटीचंड मनाया जाता है। चूंकि झूलेलालजी के अवतरण और चमत्कारों की कथाएं सिंध से जुड़ी हैं, अत: सिंधी समाज हर शुभ कार्य से पहले इनका स्मरण करता है। यही नहीं, पाकिस्तान में मुसलमान भी झूलेलाल में श्रद्धा रखते हैं।
श्रद्धालुओं की मान्यता के अनुसार, झूलेलाल वरुण देवता के अवतार हैं। इन्हें वेदों में जल का देवता माना गया है। झूलेलाल समानता, सत्य, दया, एकता और समृद्धि का संदेश देते हैं। पृथ्वी पर जीवन का सबसे बड़ा आधार जल है।
सिंधी समुदाय का त्योहार भगवान झूलेलाल का जन्मोत्सव ‘चेटीचंड’ के रूप में पूरे देश में हर्षोल्लास से मनाया जाता है। इस त्योहार से जुड़ी हुई वैसे तो कई किवंदतियाँ हैं परंतु प्रमुख यह है कि चूँकि सिंधी समुदाय व्यापारिक वर्ग रहा है सो ये व्यापार के लिए जब जलमार्ग से गुजरते थे तो कई विपदाओं का सामना करना पड़ता था। जैसे समुद्री तूफान, जीव-जंतु, चट्टानें व समुद्री दस्यु गिरोह जो लूटपाट मचाकर व्यापारियों का सारा माल लूट लेते थे। इसलिए इनके यात्रा के लिए जाते समय ही महिलाएँ वरुण देवता की स्तुति करती थीं व तरह-तरह की मन्नते माँगती थीं। चूँकि भगवान झूलेलाल जल के देवता हैं अत: ये सिंधी लोग के आराध्य देव माने जाते हैं। जब पुरुष वर्ग सकुशल लौट आता था। तब चेटीचंड को उत्सव के रूप में मनाया जाता था। मन्नतें पूरी की जाती थी व भंडारा किया जाता था।
पार्टीशन के बाद जब सिंधी समुदाय भारत में आया तब सभी तितर-बितर हो गए। तब सन् 1952 में प्रोफेसर राम पंजवानी ने सिंधी लोगों को एकजुट करने के लिए अथक प्रयास किए। वे हर उस जगह गए जहाँ सिंधी लोग रह रहे थे। उनके प्रयास से दोबारा भगवान झूलेलाल का पर्व धूमधाम से मनाया जाने लगा जिसके लिए पूरा समुदाय उनका आभारी है।
आज भी समुद्र के किनारे रहने वाले जल के देवता भगवान झूलेलाल जी को मानते हैं। इन्हें अमरलाल व उडेरोलाला भी नाम दिया गया है। भगवान झूलेलाल जी ने धर्म की रक्षा के लिए कई साहसिक कार्य किए जिसके लिए इनकी मान्यता इतनी ऊँचाई हासिल कर पाई।
जिन मंत्रों से इनका आह्वान किया जाता है उन्हें लाल साईं जा पंजिड़ा कहते हैं। वर्ष में एक बार सतत चालीस दिन इनकी अर्चना की जाती है जिसे ‘लाल साईं जो चाली हो’ कहते हैं। इन्हें ज्योतिस्वरूप माना जाता है अत: झूलेलाल मंदिर में अखंड ज्योति जलती रहती है, शताब्दियों से यह सिलसिला चला आ रहा है। ज्योति जलती रहे इसकी जिम्मेदारी पुजारी को सौंप दी जाती है। संपूर्ण सिंधी समुदाय इन दिनों आस्था व भक्ति भावना के रस में डूब जाता है।
अखिल भारतीय सिंधी बोली और साहित्य ने इस दिन ‘सिंधीयत डे’ घोषित किया है। आज भी जब कोई सिंधी परिवार घर में उत्सव आयोजित करता है तो सबसे पहले यही गूँज उठती है। ‘आयोलाल झूलेलाल’ बेड़ा ही पार अर्थात इनके नाम का जयघोष करने से ही सब मुश्किलों से पार हो जाएँगे।
जानिए क्या है झूलेलाल की कथा…
प्राचीन काल में सिंध का राजा मिरखशाह अपनी प्रजा पर धर्म को लेकर बहुत अत्याचार करता था। उसके अत्याचारों से मुक्ति पाने के लिए लोगों ने 40 दिनों तक भगवान की तपस्या की। उनकी आराधना से भगवान झूलेलाल के रूप में सिंधु नदी से प्रकट हुए। उन्होंने मिरखशाह के अत्याचारों से मुक्ति दिलाने का वचन दिया।
चैत्र मास में शुक्ल पक्ष की द्वितीया, संवत 1007 को एक दिव्य बालक ने जन्म लिया। नाम रखा, उदयचंद। उसमें कई अद्भुत खूबियां थीं। उसके चमत्कारों के कारण उसे झूलेलाल, लालसाईं के नाम से जाना जाता था। मुसलमान उसे ख्वाजा खिज्र जिंदह पीर के नाम से जानते थे। कहा जाता है कि उसका पालना परमात्मा की शक्ति से खुद ही गतिमान रहता था, इसलिए उसे झूलेलाल कहा गया।
धीरे-धीरे झूलेलाल के अनुयायियों की संख्या बढऩे लगी। उन्होंने मिरखशाह को चुनौती दी और उसके जोर-जुल्म को गलत साबित किया। मिरखशाह ने भी अपनी गलती स्वीकार कर ली। उसके बाद उसने कभी अपनी प्रजा को नहीं सताया। वह झूलेलाल का शिष्य बन गया और उसने कुरुक्षेत्र में एक मंदिर का निर्माण भी किया।
भक्तों के लिए भगवान झूलेलाल कण-कण में विराजमान हैं। उनकी समाधि पाकिस्तान के सिंध प्रांत में है। यहां हिंदुओं के अलावा मुसलमान भी काफी तादाद में आते हैं। झूलेलाल कमल के पुष्प तथा मत्स्य वाहन पर विराजमान हैं। कमल और मत्स्य समृद्धि के प्रतीक माने जाते हैं। इसका अर्थ है कि जहां झूलेलाल का स्मरण होगा, वहां समृद्धि का आगमन होगा।
सन्त झुलेलाल जी ने समभाव से सभी को गले लगाया तथा साम्प्रदायिक सद्भाव का संदेश देते हुए ‘दरियाही पंथ’ की स्थापना की। सिंधी समुदाय को भगवान राम के वंशज के रूप में भी माना जाता है। राजा जयद्रथ भी सिंधी समुदाय के थे जिसका उल्लेख महाभारत काल में भी मिलता है। समूचा सिंधी समुदाय ‘चेटीचंड पर्व’ से ही नववर्ष प्रारम्भ करता है। चेटीचंड के अवसर पर सिंधी भाई अपार श्रद्धा के साथ झूलेलाल की शोभायात्रा निकालते हैं और इस दिन ‘सूखोसेसी’ (प्रसाद) वितरित करते हैं।
चेटीचंड के दिन सिंधी स्त्री-पुरुष तालाब या नदी के किनारे दीपक जला कर जल देवता की पूजा-अर्चना करते हैं। इस दिन पूरे देश में संत झूलेलाल मंदिरों में उत्सव सा दृश्य नजर आता है। झूलेलाल की शोभा यात्रा में स्त्री-पुरुष और बच्चे नाचते-गाते व जोर-जोर से ‘आयो लाल झूले लाल’ का जयकारा लगाते हुए चलते हैं। शांत व सेवा भावी प्रवृत्ति के सिंधी समुदाय के लोग प्राय: हरेक से मिलते समय बड़े प्रेम भाव से ‘हरे राम’ अवश्य उच्चारित करते हैं जो इस समुदाय की विशिष्ट पहचान है।
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