Christmas Special : क्या ईसा मसीह भारत आए थे?

25 दिसंबर को ईसा मसीह का जन्मदिन पूरी दुनिया धूमधाम से मनाती है। आम तौर पर यही माना जाता है कि ईसा जन्म से यहूदी थे और बाईबिल के मुताबिक वो ईश्वर के पुत्र और अंतिम पैगंबर थे। इस्लाम भी ईसा मसीह को पैगंबर मानता है। ईसा मसीह की करुणामयी शिक्षाएं पूरी दुनिया को आज भी प्रकाशित कर रही हैं। भारत में भी ईसाई धर्म को मानने वाले बड़ी संख्या में हैं। ऐसा माना जाता है कि ईसाई धर्म भारत में ईसा मसीह की मृत्यु के कुछेक सालो में ही सूदूर दक्षिण भारत में सेंट थॉमस के जरिए आया था जो ईसा के शिष्यों में एक थे।

सीरियाई चर्च के मुताबिक सेंट थॉमस ने ही भारत में ईसाई धर्म की नींव डाली थी। हालांकि बाईबिल में कहीं भी स्पष्ट रुप से ईसा मसीह के भारत आने की चर्चा नहीं मिलती है लेकिन कई विद्वानों और शोधों के मुताबिक ईसा एक बार नहीं बल्कि दो बार भारत में आए और यहीं उन्होंने कश्मीर में समाधि ली।

बाईबिल में यह उल्लेख है कि ईसा 13 से 29 साल के बीच सूदूर पूर्व की तरफ चले गए। यरुशलम से पूर्व के देश या तो वर्तमान का ईरान हो सकता है या फिर भारत । बाईबिल के नए नियम जिन्हे ईसा के प्रवचन माना जाता है बाइबिल के ओल्ट टेस्टामेंट के सिद्धांतों के एक दम विपरीत हैं। बाईबिल के ओल्ट टेस्टामेंट को यहूदियों का धर्म ग्रंथ माना जाता है । ओल्ट टेस्टामेंट के मुताबिक ईश्वर दंड देने वाली सर्व शक्तिमान सत्ता है जो हमारे पापों के लिए भयानक दंड देता है। जबकि ईसा कहते हैं कि “मुझसे पहले जिन्होंने तुमसे ये कहा कि ईश्वर करुणा नहीं करता उन्हें मत मानना , ईश्वर करुणाशाली है। वो हमसे प्रेम करता है।“ ईश्वर के करुणामय स्वरुप का जिक्र भारत में तत्कालीन महायानी बौद्ध धर्म के द्वारा प्रतिपादित किया गया था। तो क्या ईसा 13 से 29 साल तक जब भारत में रहे तब उन्होंने भारत में बौद्ध धर्म से प्रेरणा ली थी। यहुदियों का भी ईसा मसीह को सूली पर चढ़ाने से पहले यही आरोप लगाया था कि वो पूर्व के विचारों को फैला रहे हैं। हिंदू धर्म के एक महान ग्रंथ भविष्यत्पुराण में भी राजा शालिवाहन के दरबार में एक विदेशी संत के आने का वर्णन मिलता है जो ईसा मसीह के चरित्र से बहुत कुछ मिलता है। भविष्यत्पुराण के द्वितीय पर्व में ईसा के भारत में तपस्या करने का उल्लेख है। एक मान्यता ये भी है कि ईसा मसीह भारत के वर्तमान कश्मीर में रहे थे और उन्होंने सन 80 में बौद्ध धर्म की संगती में भाग लिया था। शोधों के मुताबिक जब ईसा मसीह को शुक्रवार को चढ़ाया गया था तो वो रविवार को पुन जीवित हो उठे थे।इसके बाद वो ईरान और अफगानिस्तान के रास्ते भारत चले आए थे। कश्मीर के पहलगाम में उन्होंने अपना पहला पड़ाव बनाया था। पहलगाम का अर्थ होता है गड़ेरिये का गांव । लोगों का ये भी मानना है कि ईसा मसीह 33 साल से लेकर 112 साल तक कश्मीर में ही रहे और नाथ और बौद्ध संप्रदाय के लोगों के साथ ईश्वर की भक्ति में लीन रहे। श्री नगर के एक इलाके में उनके कब्र के होने का दावा किया जाता है। इस इलाके को रौजाबेल के नाम से जाना जाता है।यहां तथाकथित ईसा मसीह की कब्र में यहूदी भाषा में यह लिखा हुआ है कि ये जेशुआ(ईसा मसीह ) की कब्र है जो दूर देश के आकर यहां रहे।
ईसा मसीह के भारत आने की चर्चा 1747 में कश्मीर के महान सूफी लेखक ख्वाजा मोहम्मद आज़म की किताब ‘तारीख आज़मी’ में भी है जिसके मुताबिक राजा गोपदत्त के शासन के दौरान ईसा मसीह भारत आए थे और मर कर जिंदा होने वाले इस शहजादे ने दुनियावी चीज़ों को छोड़ दिया था। एक रुसी विद्वान निकोलस नोतोविच की किताब ‘द अननोन लाइफ और जीज़स क्राइस्ट ‘ पुस्तक के जरिए पूरी दुनिया को ये बताया कि ईसा मसीह भारत में रहे थे। इसके अलावा कई और शोधो में भी ईसा मसीह के भारत आने का दावा किया गया है हालांकि वेटिकन इन दावों को शुरु से ही खारीज़ करता रहा है लेकिन किसी न किसी रुप में ये मान्यता जोर पकड़ती रही है कि ईसा मसीह का कोई न कोई संबंध ज्ञानभूमि भारत से जरुर था।
लेखक – अजीत मिश्रा (ajitkumarmishra78@gmail.com)
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