भगवान शिव द्वारा प्रकट की गई दस महाविद्याओं में सातवें स्थान पर पुरुषशून्या विधवा आदि नामों से जानी जाने वाली माँ धूमावती का नाम आता है.
इनका प्राकट्य ज्येष्ठ शुक्लपक्ष अष्टमी को हुआ. विधवा, भिक्षाटन, दरिद्रता, भूकंप, सूखा, बाढ़, प्यास रुदन, वैधव्य, पुत्रसंताप, कलह इनकी साक्षात प्रतिमाएं हैं.
डरावनी शक्ल, रुक्षता, अपंग शरीर जिनके दंड का फल है इन सब की मूल प्रकृति में पराम्बा धूमावती ही हैं. इनका निवास ज्येष्ठा ‘नक्षत्र’ है.
इसीलिए इस नक्षत्र में जन्म लेने वाला जातक जीवन पर्यन्त स्वास्थ्य अथवा किसी न किसी प्रकार के संघर्षों से लड़ता रहता है. इन्हें ही अलक्ष्मी नाम से भी जाना जाता है.
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धूमावती माता की कथा
हिन्दू पौराणिक कथाओं में से एक के अनुसार भगवान शिव जी की पत्नी पार्वती ने उनसे भूख लगने पर कुछ खाने की मांग की. जिसके बाद शिव जी ने उन्हें आश्वस्त किया कि वो कुछ खाने का प्रबंध करते है, लेकिन जब शिव कुछ देर तक भोजन की व्यवस्था नहीं कर पाते है, तब पार्वती ने भूख से बेचैन होकर शिव को ही निगल लिया. इसके बाद भगवान शिव के गले में विष होने की वजह से पार्वती जी के शरीर से धुवाँ निकलने लगा. जहर के प्रभाव से वह भयंकर दिखने लगी उसके बाद शिव ने उनसे कहा की तुम्हारे इस रूप को धूमावती के नाम से जाना जायेगा, और भगवान शिव के अभिशाप की वजह से उन्हें एक विधवा के रूप में पूजा जाता है. क्योकि उन्होंने अपने पति शिव को ही निगल लिया था. इस रूप में वह बहुत क्रूर दिखती है जो कि एक हाथ में तलवार धारण किये हुए रहती है.
इस दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान आदि कर के पूजा स्थल को गंगाजल से पवित्र करके जल, पुष्प, सिन्दूर, कुमकुम, अक्षत, फल, धूप, दीप तथा नैवैद्य आदि से मां का पूजन करें.
इस दिन मां धूमावती की कथा कहने और सुनने से काफी फायदा मिलता है.
मां धूमावती की कृपा से इंसान के सभी पापों का नाश होता है.
धूमावती माता का मंत्र
ॐ धूं धूं धूमावत्यै फट्..
धूं धूं धूमावती ठ: ठ:.
मां धूमावती का तांत्रोक्त मंत्र
धूम्रा मतिव सतिव पूर्णात सा सायुग्मे.
सौभाग्यदात्री सदैव करुणामयि:..
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