पटाखों के धुंए में खोता रोशनी का त्यौहार : देश के कई शहरों से खास रिपोर्ट
दीपावली आते ही जहां एक ओर उत्साह और उमंग दोगुने हो जाते हैं वहीँ दूसरी ओर दिवाली के पटाखों से पर्यवारण और आम जनजीवन पर जो असर पढ़ रहा है वो दिल में टीस सी उठा देती है.
क्या आप जानते हैं दीपावली के दौरान पटाखों एवं आतिशबाजी के कारण दिल के दौरे, रक्त चाप, दमा, एलर्जी, ब्रोंकाइटिस और निमोनिया जैसी स्वास्थ्य समस्याओं का खतरा बढ़ जाता है. नॉएडा स्थित मेट्रो हास्पीटल्स एंड हार्ट इंस्टीट्यूट के निदेशक पद्मविभूषण डा. पुरूषोत्तम लाल बताते हैं कि पिछले कई सालों से यह देखा जा रहा है कि दीपावली के बाद अस्पताल आने वाले हृदय रोगों, दमा, नाक की एलर्जी, ब्रोंकाइटिस और निमोनिया जैसी बीमारियों से ग्रस्त रोगियों की संख्या अमूमन दोगुनी हो जाती है.
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क्या कहता है सर्वे
एक सर्वे के अनुसार राजधानी दिल्ली में जहाँ वायु प्रदूषण की स्थिति बद से बदतर होती जा रही है, वहीं उत्तर व मध्य भारत के कई शहर इस मामले में दिल्ली को भी पीछे छोड़ रहे हैं. तमाम कोशिशों के बावजूद दिल्ली जिस प्रदूषण से उबर नहीं पाई, अब वैसी ही दूषित हवा कई दूसरे शहरों का दम घोंट रही है. लखनऊ की किंग जार्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी के विभागाध्यक्ष डॉक्टर सूर्यकांत बताते हैं कि दीपावली के बाद हर साल आँख और नाक के अलर्जी के मरीज 25 फ़ीसदी बढ़ जाते हैं. इसके अलावा ब्रोंकाइटिस और अस्थमा के मरीज़ भी बहद जाते हैं.

केंद्रीय प्रदूषण नियन्त्रण बोर्ड (सीपीसीबी) के वायु गुणवत्ता सूचकांक (एक्यूआई) के अनुसार, पिछले वर्ष यानि 2016 की 29 और 30 अक्टूबर को कानपुर देश के 32 प्रमुख शहरों में सबसे प्रदूषित शहर था. 2016 में ही फरीदाबाद 5 बार इस फेहरिस्त में टॉप पर रहा, जबकि 8 व 9 नवम्बर 2016 को लखनऊ देश का सबसे प्रदूषित शहर था. ताजनगरी आगरा भी 2016 में स्मॉग से बुरी तरह घिरी रही. और बनारास भी इससे अछूता नहीं रहा. विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने 2016 में मध्य प्रदेश के ग्वालियर को अत्यंत महीन प्रदूषित कणों (पीएम 2.5) के लिहाज से इराक के जबोल के बाद दुनिया का दूसरा सर्वाधिक प्रदूषित शहर माना. इस मामले में विश्व के 20 सर्वाधिक प्रदूषित शहरों में 10 शहर तो भारत के ही हैं.

रिपोर्ट के मुताबिक, इलाहाबाद, पटना और रायपुर ने वायु प्रदूषण के कई मानकों पर दिल्ली को पीछे छोड़ दिया है जबकि लुधियाना, कानपुर, लखनऊ और फिरोजाबाद भी दिल्ली की राह पर हैं. पिछले वर्ष दीपावली के बाद छाया स्मॉग भले ही कुछ दिनों में छट गया, लेकिन यह इन शहरों में साल भर रहने वाले वायु प्रदूषण की स्थिति है.

केन्द्रीय प्रदूषण नियन्त्रण बोर्ड के आँकड़ों से पता चलता है कि 2002 से 2014 के बीच ग्वालियर, कानपुर, लुधियाना, ग्वालियर और सूरत में वायु प्रदूषण में बढ़ोत्तरी की दर दिल्ली से अधिक रही है. जबकि इन शहरों में प्रदूषण से बचने के उपाय दिल्ली जितने भी नहीं हैं. दिल्ली पिछले 20 वर्षों से साफ हवा के लिये संघर्ष कर रही है. पब्लिक ट्रान्सपोर्ट में सीएनजी का इस्तेमाल, ट्रकों के प्रवेश पर अंकुश, भारी डीजल कारों से ग्रीन टैक्स की वसूली, ऑड-इवन जैसे प्रयोग और पटाखों की बिक्री पर लगे प्रतिबंध जैसे उपाय इसी लम्बे संघर्ष की देन हैं।

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लखनऊ स्थित भारतीय विषविज्ञान शोध संस्थान (आईआईटीआर) ने 2016 में दीपावली की रात और इससे एक दिन पहली रात शहर में सात जगह प्रदूषण का स्तर मापा. सर्वे में सामने आया कि वायु प्रदूषण के लिये जिम्मेदार अत्यंत महीन प्रदूषित कण (पीएम 2.5) की मात्रा 248 माइक्रोग्राम प्रति घनमीटर से बढ़कर 672 माइक्रोग्राम प्रति घनमीटर तक पहुँच गई. थोड़े बड़े प्रदूषित कणों यानी पीएम 10 की मात्रा 360 माइक्रोग्राम से बढ़कर 864 माइक्रोग्राम प्रति घनमीटर तक पहुँच गई थी. मानकों के हिसाब से पीएम 2.5 को 60 और पीएम 10 को 100 माइक्रोग्राम प्रति घनमीटर से अधिक नहीं होना चाहिए. इन आँकड़ों से जाहिर है कि 2016 में दीपावली के दिन लखनऊ की हवा 8-10 गुना अधिक प्रदूषित थी.

आईआईटीआर की सर्वे रिपोर्ट में वायु प्रदूषण में हुई इस भारी बढ़ोत्तरी के लिये पटाखों को जिम्मेदार ठहराया गया है, क्योंकि दीपावली के दिन छुट्टी की वजह से वाहनों और औद्योगिक गतिविधियों से होने वाला प्रदूषण अपेक्षाकृत कम रहता है. आईआईटीआर के निदेशक आलोक धवन लखनऊ में वायु प्रदूषण की स्थिति को बहुत चिंताजनक करार देते हैं. उनका कहना है कि इससे न सिर्फ लोग बल्कि पूरा पर्यावरण प्रभावित हो रहा है. संस्थान ने पीएम 2.5 से भी छोटे प्रदूषित कणों का स्तर पर लखनऊ की हवा में मापा जो काफी अधिक पाया गया है. इतने महीन कणों के लिये भारत में कोई मानक तय नहीं किये गये हैं, लेकिन ये बेहद महीन कण साँस के साथ मानव मस्तिष्क तक पहुँच सकते हैं और कई विकार पैदा कर सकते हैं.

देश के अधिकतर शहरों में दीपावली के बाद वायु प्रदूषण बढ़ता है. खेतों में जलने वाली पराली और सर्दियों की धुँध के साथ मिलकर यह स्मॉग के हालात पैदा करने में अहम भूमिका निभाता है.

कैसे करें इससे बचाव
- अगर आपको दमा या सांसों से संबंधी समस्या हैं, तो घर के अंदर ही रहें और धुंए से बचने का प्रयास करें.ऐसे में अगर आपको बाहर जाना ही है, तो अपनी दवाएं साथ रखें और मास्क लगाकर बाहर जायें.
- दीपावली का समय आते ही लोग घर की साफ-सफाई में जुट जाते हैं और घर के बेकार सामानों को बाहर फेंक देते हैं.इनमें कुछ ऐसे सामान भी होते हैं, जो अजैविक होते हैं और वातावरण को नुकसान पहुंचाते हैं. ऐसे सामानों को इधर-उधर ना फेंकें.
- पटाखों से निकलने वाली आवाज अत्यधिक ध्वनि प्रदूषण फैलाती हैं और यह स्वास्थ्य के लिए भी हानिकारक होती है.दीपावली में सबसे ज्यादा इस्तेमाल में लाये जाने वाले ‘लक्ष्मी बम’ से 100 डेसिबेल(ध्वनि नापने की इकाई) आवाज आती है और 50 डेसिबेल से तेज़ आवाज़ के स्तर को मनुष्य के लिए हानिकारक माना जाता है. शायद आप नहीं जानते, अचानक बहुत तेज आवाज सुनने से व्यक्ति बहरा भी हो सकता है और इस कारण हृदय के मरीजों में दिल का दौरा पड़ने की संभावना बढ़ जाती है.
- चिकित्सकों का कहना है कि पटाखों का शोरगुल और धुएं से फैलने वाला प्रदूषण सभी के लिए नुकसानदायक होता है.अधिक रोशनी और शोरगुल वाले पटाखों के कारण लोगों की आंखों में अंधता और कानों में बहरापन आ सकता है. इसलिए पटाखों से दूरी बनाकर रखें.
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