दशहरा बुराई पर अच्छाई की जीत का त्यौहार है. भगवान राम ने रावण का वध कर धरती को पाप मुक्त किया था. लेकिन क्या आप जानते हैं कि भगवान राम ने भी रावण से युद्ध करने से पहले अपराजिता पूजन किया था. जिसकी वजह से ही उन्हें विजय प्राप्त हुई थी.
चलिए जानते हैं क्या है अपराजिता पूजन. क्यों इसके बिना अधूरा माना जाता है विजयदशमी का त्योहार.
क्या है अपराजिता पूजन

शास्त्रों में दशहरे का असली नाम विजयदशमी बताया गया है. जिसे अपराजिता पूजा भी कहते हैं. अपराजिता देवी सकल सिद्धियों की प्रदात्री साश्रात माता दुर्गा का ही अवतार हैं. भगवान श्री राम ने माता अपराजिता का पूजन करके ही रावण से युद्ध करने के लिए विजयदशमी को प्रस्थान किया था.
आदिकाल की श्रेष्ठ देवी हैं अपराजिता
महार्षि वेद व्यास जी ने माता अपराजिता को आदि काल की श्रेष्ठ फल देने वाली देवताओं द्वारा पूजित देवी बताया है. मान्यता है कि अपराजिता पूजा करने से कभी भी असफलता का सामना नहीं करना पड़ता.
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अपराजिता पूजन का महत्व
विजयदशमी के दिन अपराजिता पूजन का विशेष महत्व है. क्योंकि आश्विन शुक्ल पक्ष दशमी तिथि में शाम को तारा उदय होने के समय को विजया काल माना गया है. इसी कारण से इस तिथि को विजयादशमी कहते हैं. मान्यता है कि इस समय पर किया गया कोई भी कार्य सफल होता है. ज्योषियों के अनुसार इस दिन अपराजिता स्रोत का पाठ करना बहुत शुभ माना जाता है.
अपराजिता के फूल से होता है पूजन
अपराजिता के नीले फूल से अपराजिता पूजन करने से अपराजित रहने का वरदान प्राप्त होता है. अपराजिता पूजन के बाद कलाई पर अपराजिता की लता बांधी जाती है. इसके बाद मां अपने बच्चों की कलाई पर अपराजिता की बेल बांधती है और उनके सदैव विजय रहने की कामना करती हैं. ज्योतिषियों के अनुसार माता अपराजिता की पूजा का समय दोपहर के तत्काल बाद का होता है. दोपहर से संध्या काल के बीच में कभी भी माता अपराजिता की पूजा कर यात्रा भी प्रारंभ की जा सकती है. यात्रा पर जाते समय माता अपराजिता की स्तुति अवश्य करनी चाहिए। जिससे यात्रा में कोई भी विघ्न न हो.
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