सेहत और स्वाद : एक मूल्यांकन

स्वाद और सेहत के जुड़ाव का मसला अत्यंत सूक्ष्म आधार पर टिका है। स्वाद, सेहत और संस्कृति में प्रकृतिवादी जुड़ाव है। स्वाद का संबंध मूलतः दो चीजों से है – एक क्या पकाया जाता है दूसरा कैसे पकाया जाता है। पहला सीधा कृषि से जुड़ा है और दूसरा पाक कला से.
कृषि और पाक कला की बढ़ती दुर्दशा देखने पर वर्तमान समय को ‘स्वादहीन’ युग कह सकते है. आधुनिक साइंस के प्रभाव में कृषि ने सराहनीय प्रगति की है. लेकिन कृषि में जो तरक्की हुई है उसकी जो कीमत देश ने चुकायी है, उसका हाल-फिलहाल तक कोई मूल्यांकन करने का प्रयास ही नहीं किया गया. इस तरह के कृषि उत्पादन का मानव के सेहत पर क्या प्रभाव पड़ रहा है, उस विषय पर शोध सिरे से नदारद है. वर्तमान को बेस्वाद मात्र इसलिए नहीं कहा जा रहा है कि आलू से अदरक तक तमाम चीज अपना चरचरापन गंवा चुके है. बल्कि यह इसलिए है कि स्वाद के विषय पर कमजोर होती समझ और दकियानूसी बात कहकर स्वाद पर संवाद का बंद हो जाना।
भारत कौम का वजूद आज खतरे में है, क्योंकि अन्न-जल गंभीर रूप से विषयुक्त हो गया है. अन्न-जल को विषमुक्त बनाने के लिए कहीं कोई अभियान जन्मता अभी दिखाई नहीं दे रहा है. शासन प्रशासन पूरी तरह निष्क्रिय है, बल्कि उल्टी दिशा में सक्रिय दिखाई पड़ते है. अब तो जेनेटिकली परिवर्तन बीजों का प्रचार-प्रसार और उपयोग तकरीबन सर्वव्यापी है. इसी बीच कुछ और डरावनी खबर सुनने को मिल रही है कि चीन में प्लास्टिक मैटिरियल से खुबसूरत सब्जियों, चावल वैगरह का फैक्टरी उत्पादन शुरू हो चुका है. ऐसी चीनी सब्जियां,अनाज भारतीय बाजार में पहुँचनें लगी है. यह अत्यंत खतरनाक परिस्तिथि है.
पाक कला का मसला कुछ ज्यादा ही उलझ गया है. बीते दो ढाई सौ बरस से जिस साइंस का विकास हुआ है उसकी नैतिकता और ज्ञान पाने के सिद्धांत और तरीके पर चर्चा करीब करीब ना के बराबर है. स्वाद और स्वाद तंतुओं का शोधन तो ऐसा अनोखा विषय है कि उसे आसानी से साइंस विद्या की परिधि में समेटा ही नहीं जा सकता. आधुनिक स्वास्थ्य विज्ञान अभी हारमोनल थेरेपी के विकास में प्रयासरत है. ऐसी किसी औषधि का हाल फिलहाल अविष्कार ही नहीं हुआ है जो शरीर में स्थित हारमोनल व्यवस्था-इंडोक्राइन सिस्टम को प्रभावित कर सके. लुप्त हो रहे स्वाद और स्वाद तंतुओं की निरंतर विकसित हो रही निष्क्रियता के संदर्भ में कोई विश्लेषण प्रक्रिया या बहस का आरंभ नहीं होना सेहत और संस्कृति के लिए खतरे की घंटी है. वैसे स्वाद की कोई शास्त्रीय व्याख्या भी सहज संभव नहीं.
सन 1960 और 70 के दशकों में ‘सेहत और स्वाद’ पर कुछ लोगों ने चर्चा शुरु करने का प्रयास तो अवश्य किया था, लेकिन हमारा राजनीतिक नेतृत्व जवाहरलाल नेहरू से लेकर समाजवादी विचारक डॉ राममनोहर लोहिया और लोकनायक जयप्रकाश नारायण तक इस कदर साइंसनिष्ठ, प्रगतिशील पसंद था कि स्वाद और सेहत के संदर्भ में किसी तरह की चर्चा चल ही नहीं सकती थी. तथाकथित दक्षिणपंथी राजनीतिक का मूल चरित्र वास्तव में केवल नारों के स्तर पर अंतर था लेकिन सोच समझ उन्ही की तरह से था और आज भी है. उनसे तो यह अपेक्षा ही नहीं की जा सकती कि स्वाद जैसी दकियानूसी अवधारणा से परिचित भी होंगे.
मसला केवल सत्ता-संपन्न की अयोग्यता और निठल्लेपन का नहीं है. वास्तव में समस्त संभ्रांत समाज तकरीबन मूक दर्शक की तरह से है, जबकि इसकी महामारी से अधिक पीड़ित यहीं है. शहरी मध्यवर्ग में ‘दादी’ नाम की संस्था विलुप्त हो चुकी है और ‘मां’ की ममता का अजीबो-गरीब आधुनिकीकरण हो गया है. नतीजा सामने है, देश के लगभग 60 फीसद बालक कुपोषित है और नौजवानों के देह-दिमाग-दिल में विष भरता जा रहा है. साठ-पैसठ करोड़ नौजवान मुश्किल में है. अब तो अन्न में विष का यह हाल हो गया है कि विशेषज्ञ और कृषि अधिकारी खुद यह सलाह दे रहे है कि उपयोग से सब्जियों को नमक के पानी में डालकर जहर मुक्त करने का प्रयास करें.
इस पर गंभीर विमर्श की शुरुआत करनी होगी, मात्र नुस्खेबाजी से न स्वाद बचेगा न सेहत बचेगी. अनेकता में एक भारतीय पाक कला पर विचार करना होगा. अन्न को विषमुक्त बनाने के लिए शोध,चेतना अभियान और प्रयोग से ले कर कानून में क्या प्रक्रियाएं शुरू की जाएं यह सोचना होगा. इस विषय पर समाज को खुद ही पहल करना होगा. यदि हम राजनीतिक या प्रशासनिक पहल की उम्मीद करेंगे तो आवश्यक कदम उठाने में देर हो जाएगी.
Athar Husain, Director
Centre for Objective Research and Development (CORD)
Lucknow
Editorial Review Note
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