परमार्थ निकेेतन में सोशल डिस्टेंसिंग के साथ मनायी गुरूपूर्णिमा
- भारत ने गुरूओं के रूप में विश्व को अनमोल रत्न दिये – स्वामी चिदानन्द सरस्वती
5 जुलाई, ऋषिकेश। परमार्थ निकेतन में सोशल डिस्टेंसिंग का गंभीरता का पालन करते हुयेे गुरूपूर्णिमा मनायी। स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी महाराज ने वेद मंत्रों के उच्चारण के साथ पूज्य गुरू परम्परा का पूजन किया। देश विदेश से आये साधक जो लाॅक डाउन के पहले से परमार्थ निकेतन में रह रहे है उन भक्तों, परमार्थ गुरूकुल के ऋषिकुमारों और आचार्यों ने भी वेद मंत्रों के साथ स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी महाराज का पूजन किया। आज परमार्थ निकेतन में पूज्य महामण्डलेश्वर स्वामी शुकदेवानन्द सरस्वती जी महाराज का 55 वाँ निर्वाण-महोत्सव मनाया गया। इस अवसर पर श्रीरामचरित मानस का पंचदिवसीय सामूहिक संगीतमय पाठ का आयोजन किया गया।
गुरूपूर्णिमा के महत्व पर प्रकाश डालते हुये स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी महाराज ने कहा कि आज का दिन भारतीय संस्कृति और सनातन परम्परा में बहुत ही महत्वपूर्ण है। हमारे शास्त्रों में भी गुरू की अद्भुत महिमा बतायी गयी है। गुरूपूर्णिमा, पूरे विश्व के लिये भारत की ओर से एक बहुत बड़ा संदेश है।
गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः। गुरुरेव परंब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः।।
गुरु गोबिंद दोऊ खड़े, का के लागूं पाय। बलिहारी गुरु आपणे, गोबिंद दियो मिलाय।
भारत में सतयुग से लेकर प्राचीन हड़प्पा सभ्यता और अब आधुनिक समय तक धर्म, दर्शन और परंपराओं का अद्भुत सम्मिश्रण तथा अत्यंत समृद्ध इतिहास रहा है। अनादि काल से ही भारत में शिक्षा की व्यवस्थाएं, गुरूकुल शिक्षा पद्धति उत्कृष्ट स्तर की रही है। साथ ही गुरू शिष्य परम्परा भी अनुपम परम्परायें थी जो कि वर्तमान समय में भी जीवंत बनी हुई है।
भारत में गुरूओं का अद्भुत इतिहास रहा है। देवगुरु बृहस्पति देवताओं के गुरु बृहस्पति हैं। परशुराम, महर्षि वेदव्यास, वशिष्ठ ऋषि, गुरु सांदीपनि, ब्रह्मर्षि विश्वामित्र आदि अन्य गुरूओं का स्वर्णिम इतिहास है।

धरती के आरंभ से ही विद्वानों ने गुरु की महिमा पर अनेक ग्रंथ लिखे हैं। गुरू वह पारस है जो शिष्य के जीवन से अन्धकार को दूर कर उसका जीवन ज्ञान रूपी प्रकाश से प्रकाशित कर देते हैं।
अज्ञान तिमिरान्धस्य ज्ञानाञ्जन शलाकया। चक्षुरुन्मीलितं येन तस्मै श्री गुरवे नमः ॥
गुरू, ज्ञानांजनरुप शलाका से, अपने दिव्य ज्ञान से अपने शिष्य के जीवन से अज्ञानरुप अंधकार को दूर कर उनका जीवन प्रकाशित कर देते है, उन गुरु को नमस्कार ।
गुरूपूर्णिमा पर्व सनातन परम्परा में बहुत ही महत्वपूर्ण है। गुरूपूर्णिमा पूरे विश्व के लिये भारत की ओर से एक बहुत बड़ा संदेश है। आदिकाल से ही यह परम्परा चली आ रही है, गुरू के रूप में महर्षि व्यास जी, सूत जी, वाल्मीकि जी, सांदीपनि जी को जो सम्मान मिला यही तो पूरे विश्व को संदेश है कि भारत केवल मंत्रों को गाता नहीं है कि विश्व एक परिवार है बल्कि जीता भी है।
भारत ने गुरूओं के रूप में विश्व को अनमोल रत्न दिये है। पूज्य गुरूओं ने वेद, पुराणों और दिव्य ग्रंथों के माध्यम से हमें बताया कि कैसे जियें। गुरूओं ने दिव्य ग्रंथों के पढ़ने का संदेश दिया और कहा कि इन दिव्य ग्रंथों के मंत्र जीवन के सभी रहस्यों को खोल सकते हैं। मंत्रों की गहराई को समझने से मन, वचन, कर्म और विचारों में अद्भुत परिवर्तन होता है।

गुरूपूर्णिमा का दिन हमें यह याद दिलाता है कि हमारा ध्यान उस गुरू तत्व की ओर जाये जो जीवन की सारी निराशाओं को नष्ट कर विशाद युक्त जीवन को प्रसाद बना दे। ये गुरू की ही तो महिमा है कि भगवान श्री राम और भगवान श्री कृष्ण को भी गुरूकुल में जाकर शिक्षा ग्रहण करनी पड़ी थी। गुरूकुल अर्थात गुरू का वह कुल जहां पर भीतर का अनुशासन और स्वयं पर शासन, गुरू की छत्रछाया में होने लगता है। पूर्णिमा अर्थात पूर्ण-माँ, माँ तो केवल जन्म देती है और गुरू, जीवन प्रदान करता है। प्रतिवर्ष गुरूपूर्णिमा पर्व हमें याद दिलाता है कि जीवन में जो अन्धकार है, उस अन्धकार के मध्य गुरू रूपी ज्योति भी है उससे अपने जीवन को प्रकाशित करे और परमार्थ की ओर बढ़ते रहे।

महर्षि अरविंद ने कहा कि ‘अध्यापक राष्ट्र की संस्कृति के चतुर माली होते हैं। वे संस्कारों की जड़ों में खाद देते हैं और अपने श्रम से उन्हें सींच-सींच कर महाप्राण शक्तियाँ बनाते हैं।’
प्रख्यात दर्शनशास्त्री अरस्तु कहते हैं कि ‘जन्म देने वालों से अच्छी शिक्षा देने वालों को अधिक सम्मान दिया जाना चाहिए, क्योंकि उन्होंने तो बस जन्म दिया है, पर उन्होंने हमें जीना सिखाया है।’ भारतीय संस्कृति कहती है मातृ देवो भव, पितृ देवो भव, आचार्यो देवो भव। अलेक्जेंडर महान का कहना था कि ‘मैं जीवन के लिए अपने पिता का ऋणी हूँ, पर अच्छे तरह से जीने के लिए अपने गुरू का।’

पूरी दुनिया जीतने का सपना देखने वाले सिकंदर और उनके गुरु अरस्तू एक बार घने जंगल में कहीं जा रहे थे। रास्ते में उफनता हुआ एक बरसाती नाला पडा। अरस्तू और सिकंदर इस बात पर एकमत न हो सके कि पहले कौन नाला पार करे। वह रास्ता अनजान था। नाले की गहराई से दोनों ही अभिज्ञ थे। विचार करने के बाद सिकंदर यह बात ठान बैठे कि नाला तो पहले वह ही स्वयं ही पार करेंगे।

कुछ देर के बाद अरस्तू ने सिकंदर की बात मान ली. पर बाद में वे इस बात पर नाराज थे कि तुमने मेरी आज्ञा का उल्लंघन क्यों किया? इस पर सिकंदर ने एक ही बात कही, मेरे मान्यवर गुरु जी, मेरे कर्तव्य ने ही मुझे ऐसा करने को प्रेरित किया, क्योंकि अरस्तू रहेगा तो हजारों सिकन्दर तैयार कर लेगा, लेकिन सिकंदर तो एक भी अरस्तू नहीं बना सकता। यह है हर युग में गुरू की महिमा।
गुरु की स्तुति में संत तुलसीदास जी रामचरितमानस में बहुत कुछ लिखा है।
वन्दौ गुरु पद पदुम परागा । सुरुचि सुवास सरस अनुरागा ।
गुर बिनु भवनिधि तरइ न कोई। जों बिरंचि शंकर सम होई।।
बंदउँ गुरु पद कंज कृपा सिंधु नररूप हरि।
महामोह तम पुंज जासु बचन रबिकर निकर।।
अर्थात् गुरू, मनुष्य रूप में नारायण ही हैं। मैं उनके चरण कमलों की वन्दना करता हूँ। जैसे सूर्य के निकलने पर अन्धेरा नष्ट हो जाता है, वैसे ही उनके वचनों से मोहरूपी अन्धकार का नाश हो जाता है।
भले ही कोई मनुष्य ब्रह्मा जी या शंकर जी के समान ही क्यों न खुद को समझने लगे परन्तु वह बिना गुरू के भव सागर पार नहीं कर सकता। वेदों, उपनिषदों, पुराणों, रामायण, गीता, गुरुग्रन्थ साहिब आदि सभी धर्मग्रन्थों एवं सभी पूज्य संतों द्वारा गुरु की महिमा का गुणगान किया गया है। गुरु समान दाता नहीं, याचक शिष्य समान, तीन लोक की सम्पदा, सो गुरु दीन्ही दान। गुरु के समान कोई दाता नहीं, और शिष्य के सदृश याचक नहीं। त्रिलोक की सम्पत्ति से भी बढकर ज्ञान दान गुरु अपने शिष्य को देते है। आईये उन सभी आचार्य परम्परा एवं गुरू परम्परा को नमन।
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