गुरमीत राम रहीम के लाखों अनुयायियों की वजह क्या है?
डेरा सच्चा सौदा के बाबा गुरुमीत राम रहीम को 25 अगस्त को सजा सुनाई गयी और आज यानि 28 अगस्त को इस पर फैसला आना है. जैसे ही गुरुमीत राम रहीम को सजा सुनाई गयी पंचकुला ही नहीं बल्कि पंजाब, हरियाणा, उत्तरप्रदेश में माहौल तनावपूर्ण हो गया. न जाने कितनी जानें गयी और सार्वजानिक संपत्ति और निजी संपत्तियों को कितना नुक्सान पहुंचा यह किसी से भी छिपा नहीं है.
यहां सोचने वाली बात यह है कि गुरुमीत राम रहीम के लगभग 5 करोड़ अनुयायी है. क्या हम इन्हें अंध भक्त मान सकते हैं या इसके पीछे कोई मनोवैज्ञानिक कारण है. आइये जानते हैं।
सभी धर्म-जाति एक बराबर

डेरा में सभी जाति को एक नजर से देखा जाता है. इसका अंदाजा आप इसी बात से लगा सकते हैं कि डेरा से जुडे़ लोग अपना उप नाम जैसे शर्मा, वर्मा, अरोड़ा, संधू आदि की जगह ”इन्सां” लिखेते हैं। डेरा हमेशा इंसानियत की वकालत करता है। डेरा से जुड़े एक भक्त का कहना है कि वो भले ही हिंदू या सिख हों या फिर कुछ और लेकर डेरा से जुड़ने के बाद जाति बंटवारे को भूलना पड़ता है। दुनिया भर में डेरे के करीब पांच करोड़ अनुयायी हैं। जिनमें से करीब 25 लाख अनुयायी तो अकेले हरियाणा में हैं।
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विनम्र प्रबंधन
कुछ लोगों के लिए बाबा राम रहीम से लगाव उनके डेरा प्रबंधन के चलते है। मनसा के रहने वाले दलित सुखबीर इंसान का कहना है कि डेरा प्रबंधन ‘इंसान’ जैसे उप नाम की वकालत सिर्फ इसलिए करता है, ताकि नम्रता बनी रहे. “प्रबंधन उन क्षेत्रों में राज्य को विभाजित करता है, जिन्हें आगे इकाइयों में विभाजित किया जाता है। प्रत्येक इकाई का नेतृत्व एक व्यक्ति करता है जिसे शीर्षक भंगी दास दिया जाता है। आपको बता दें कि भंगी शब्द निम्न जाति के लोगों के लिए उपयोग किया जाता है लेकिन जब इकाई के शीर्ष को यह कहा जाता है, तो वह इसे सम्मान देता है.यही कारण है कि इतने निम्न जाति वाले लोग भी डेरा के अनुयायी हैं।

डेरा द्वारा की जा रही सामाजिक सेवा से आकर्षण

सस्ता खाना और मुफ्त दवा डेरा में लोगों को मुफ्त में दवा दी जाती है.
इसके अलावा वेश्यावृत्ति में फंसी युवतियों को गुरु जी बेटी बनाते हैं ईलाज करवाकर, शादी करके मुख्य धारा में लाते हैं.
किन्नरों को सुखदुआ समाज का नाम देकर उनको अपनाना व समाज की मुख्य धारा में लाना.
समलैंगिक लोगों का इलाज करवाना व उन्हें जायज रिश्ते अपनाने की नसीहत देना.
भ्रूण हत्या व लिंग भेद पर रोक लगाना. इसी उद्देश्य से पूज्य गुरुजी ने ऐसी लड़कियां जिनको गर्भ में मार देना था, अपनाया व माँ-बाप की जगह खुद का नाम दिया।
दुर्घटनाग्रस्त व्यक्तियों को अस्पताल पहुंचाकर यथा संभव सहायता करना दुर्घटनाग्रस्त व्यक्तियों को अस्पताल पहुंचाकर यथा संभव सहायता करना. गरीब मरीजों का मुफ्त इलाज करवाना.आवारा, मानसिक एवं शारीरिक विकलागों की यथा संभव सहायता करना.
नियमित रूप से खूनदान करना.
चिकित्सा व शोध कार्यों के लिए मरणोंपरांत शरीरदान.
मरणोंपरांत नेत्रदान.
आधुनिक चिकित्सा सुविधाओं से सुसज्जित शाह सतनाम जी मोबाइल अस्पताल द्वारा नि:शुल्क चिकित्सा शिविर लगाना.
आंखों के नि:शुल्क कैंप लगाकर मरीजों के आप्रेशन, दवा व खानपान का मुफ्त प्रबंध करना।
बिना दवाई नशे से छुटकारा

जन कल्याण परमार्थी शिविर लगाकर विशेषज्ञ डाक्टरों द्वारा मरीजों का फ्री ईलाज करवाना.
हृदय रोगों की मुफ्त जांच व रोकथाम के उपाय बताना.
आयुर्वेदिक नुस्खों व योग पद्धति द्वारा बीमारियों का इलाज करवाना.
मांसाहार त्यागने व शाकाहार अपनाने की प्रेरणा देना.
आदिवासियों को सभ्य रहन-सहन, शिक्षा व रोजगार देकर समाज की मुख्यधारा में लाना.
रूहानी सत्संग द्वारा लोगों का चरित्र निर्माण करना.
गरीब की शादी में आर्थिक मदद करना.
आर्थिक रूप से कमजोर विद्यार्थियों की सहायता करना.
लाचार, बेसहारा लोगों व गरीब विधवाओं को मकान बनाकर देना.
फूड बैंक द्वारा दीन दुखियों को मुफ्त राशन प्रदान करना.
सफाई अभियानों द्वारा लोगों को प्रदूषण व बीमारियों से बचाना।
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भक्तों का दावा है कि राम रहीम ने उन्हें जीवन जीने की सही राह दिखाई है। डेरा सच्चा सौदा एक धर्मनिरपेक्ष संगठन माना जाता है। इसकी स्थापना वर्ष 1948 में संत शाह मस्ताना ने की थी।

उनके भक्त कहते हैं कि वे उनसे मेडिटेशन के जरिए मिलते हैं। इसे वे सिमरन करना भी कहते हैं। भक्त उनसे इतने जुड़े हैं कि उनका सिमरन करते हुए रोने लगते हैं.
क्या हैं इसके पीछे के मनोवैज्ञानिक कारण

मनोविज्ञानियों का मानना है कि एक बाबा के इतने सारे अनुयायी होने के पीछे कई मनोवैज्ञानिक कारण भी है.
मनोविज्ञानी डॉ प्रियंका शर्मा कहती है “आप जब किसी ऐसे व्यक्ति के प्रति सहानुभूति जताएंगे जिसे अन्य लोगों ने दुत्कार दिया हो तो वो आपके लिए मरने मारने तक पर उतारू हो जायेगा. ठीक ऐसा ही डेरा के समर्थकों और अनुयायियों के साथ है” जैसे – पंजाब में आज भी जातिवाद फैला हुआ है और ऐसे में राम रहीम ने सबको बराबरी का दर्जा दिया उनके लिए कोई हिन्दू मुस्लिम सिख या उच्च वर्ग या निम्न वर्ग का अनुयायी नहीं है बल्कि सबको इंसानियत के तराजू पर तौला जाता है. वहां लोगों को इंसान की उपाधि से नवाज़ा जाता है।

डॉ. प्रियंका शर्मा कहती हैं कि “बाबा भी वही काम कर रहे हैं जो हम कर रहे हैं। आप ज़रा सोचिये उस महिला के लिए यह कितनी बड़ी बात होगी जिसका नशेडी पति बाबा के कहने पर बिना किसी दावा की मदद से नशा छोड़ देता है, तो उसके लिए तो डेरा एक मंदिर और रामरहीम उसके भगवान से कम नहीं होंगे”

बाबा राम रहीम के जितने भी अनुयायी हैं वो निचले तबके के हैं, या ऐसे लोग हैं जिन्हें समाज ने अपनाने से इनकार कर दिया है. मसलन किन्नरों के लिए उन्होंने सुखदुआ समाज की स्थापना की, वेश्याओं को वो मेन स्ट्रीम में लेकर आये है. गरीबों को रोज़गार और शिक्षा प्रदान की. डॉ. शर्मा कहती हैं डेरा ने कुल मिलकर वो काम किया जो कि एक सरकार को करना चाहिए था. और जब अनुयायियों ने देखा कि राम रहीम के पास राजनीतिज्ञों का भी ताँता लगा रहता है तो इसका मनोवैज्ञानिक प्रभाव उन पर ज़रूर पड़ा होगा.
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