“वेदांत शब्द तो सभी ने सुना होगा पर वेदांत क्या है, यह कम हिन्दू ही जानते हैं। वेदांत को जीवन में उतारे बिना न ‘इस’ लोक न ‘उस’ लोक, कहीं भी सफलता नहीं मिलती। वेदांत को समझे बिना भगवान श्रीकृष्ण तथा स्वामी विवेकानंद को नहीं समझा जा सकता।” आध्यातिक गुुरु पवन सिन्हा के जीवन की अब एक ही उद्देश्य है। वे ज्योतिष की प्रकाण्ड जानकार है और वेदांत के प्रखर वक्ता। हाल ही में स्वामी विवेकानंद जी की स्मृति में गाजियाबाद के हिसाली गाँव में स्थित पावन चिंतन धारा आश्रम के द्वारा छठे “ज्ञानोत्सव” कार्यक्रम का आयोजन उन्होनें किया गया| स्वामी विवेकनद जी ने ११ सितम्बर १८९३ को विश्व धर्म सम्मलेन, शिकागो में एक ऐसा व्याख्यान दिया जिससे भारत को विस्मृत होते हुए आध्यात्मिक गौरव की पुनः प्राप्ति हुई| पावन चिंतन धारा आश्रम 2011 से इसी दिन को ज्ञानोत्सव के रूप में मनाता आ रहा है|
इस कार्यक्रम में श्रीगुरु पवन सिन्हा जी का ‘व्यावहारिक वेदांत’ विषय पर प्रवचन हुआ|
जिज्ञासुओं को संबोधित करते हुए पवनजी ने कहा-
- वेदांत का अर्थ है- वेद की पराकाष्ठा ना कि वेद का अंत
- वेदांत वेद आधारित दर्शन है जिसमें मनुष्य और ब्रह्म के सम्बन्ध की ज्ञान मीमांसा की गयी है.
- उपनिषद जो वैदिक साहित्य का अंतिम भाग है उसे वेदांत कहते हैं.
- वेदांत व्यावहारिक ज्ञान है जिसे कृष्ण ने अर्जुन को युद्ध क्षेत्र में दिया. श्री रामकृष्ण परमहंस जी ने स्वामी विवेकानंद जी को कर्मभूमि दक्षिणेश्वर में दिया. जिसको महाप्रतापी राजा ने श्वेतकेतु को दिया तथा जिसको स्वामी विवेकानंद जी ने आधुनिक युग में युवाओं को दिया. ये ज्ञान ‘राजा को राज कार्य करना’, ‘विद्यार्थी को अध्यनन और चरित्र निर्माण करना’, ‘गृहस्थ को गृहस्थ कार्य करना’, ‘भक्त को इश्वर में लीन होना’ आदि सिखाता है|
- बादरायण ऋषि कृत ब्रह्म सूत्र या उत्तर मीमांसा को वेदांत कहते हैं.
- श्री पवन जी ने कहा कि वेदांत के सिधान्तों को जीवन में उतारे बिना न भक्ति प्राप्त हो न ज्ञान प्राप्त हो.
- वेदांत दर्शन प्रमाण आधारित दर्शन है जिसमें ब्रह्म तक के होने को प्रमाण द्वारा सिद्ध किया गया है. ये कपोल कल्पनाओ को अस्वीकार करता है .
- उन्होंने कहा कि आज के युग में धार्मिक प्रपंचों के बढ़ जाने से मानव से ईश्वर बहुत दूर हो चुका है और प्रपंचों के चलते हम स्वयं को ही सम्मोहित करके यह समझने लगते हैं कि हमें ईश्वर की प्राप्ति हो गयी है या प्रभु की कृपा मिल गयी है जबकि ऐसा कुछ नहीं होता. उन्होंने कहा कि विचारहीन भाव की उत्पत्ति भटकाव, अवसाद तदोपरांत नास्तिकता का कारण बनती है. परन्तु विचार के उपरान्त जो भक्ति प्राप्त होती है वह शाश्वत होती है और कभी डगमगाती नहीं. उन्होंने कहा कि वेदांत के अनुसार मनुष्य को एक विशिष्ट योग में उतरना आवश्यक है जहाँ उसका शरीर, इन्द्रियां, वृत्त्तियां, आत्मा तथा परमात्मा एक लय में चलें. तब वह मनुष्य स्वयं ब्रह्म स्वरुप होने लगता है और यही अर्थ है –अहम् ब्रह्मास्मि का!
- गुरूजी ने कहा कि हिन्दुओं का यह दुर्भाग्य और नासमझी है कि एक ओर तो वह कहते हैं कण-कण में शंकर हैं, हर मनुष्य में ईश्वर है वहीँ दूसरी ओर व्यावहारिकता में इस सिद्धांत त्याग कर ईश्वर को चुनौती देते हैं जो नास्तिकवाद है. उन्होंने इस बात को स्पष्ट करते हुए कहा कि हर वह हिन्दू जो जातिवाद में विश्वास करता है वह आस्तिक नहीं, नास्तिक है और अधर्मी है, क्योंकि जब हर शरीर में ईश्वर है तो कोई शरीर किसी गर्भ विशेष से जन्म लेने पर ऊँचा या नीचा कैसे हो सकता है. अतः जातिवाद को शीघ्रअति शीघ्र छोड़ना होगा. उन्होंने कहा कि पराशर संहिता, वज्र शुचिकोपनिषद, व्यास मुनि, पतंजलि ऋषि, मनु आदि अनेक ऋषियों, विद्वानों और शास्त्रों में स्पष्ट लिखा है कि हर मनुष्य जन्म से शुद्र है, संस्कार से द्विज बनता है, वेद पढ़ने से (आधुनिक युग में ज्ञानार्जन से) विप्र बनता है तथा ब्रह्म का ज्ञान पाने से ही ब्राह्मण बनता है. उन्होंने तो यहाँ तक कहा कि मनु कहते हैं कि जो मनुष्य अपशब्द बोले और ब्रह्म का ज्ञान न धारण उसके ब्राह्मण होने पर भी चरण भी न छुओ.
- हाल में ही हुए एक ‘बड़े बाबा’ के कांड पर बोलते हुए उन्होंने कहा कि खेद की बात है कि हिन्दुओं को अपने ही धर्म का ज्ञान नहीं है. वह ‘बाबा’ हिन्दू संत नहीं है. उसका अपना पंथ है, अपनी मान्यताएं हैं. अतः न तो हिन्दू लोगों को निराश होने की आवशयकता और न ही किसी पर तंज़ कसने की ज़रूरत. दरअसल हम लोगों में से अधिकतर लोगों की भक्ति नाच-गाने, अप्रमाणिक कथाएं सुनने सुनाने, कुछ रंग विशेष तथा भव्यता तक सिमित होकर रह गयी है. यही कारण है की हम ठगे जाते हैं. उन्होंने चुटकी लेते हुए कहा – जनता भोली भाली नहीं है, बहुत कुछ जानती है, सरकारें चुनती और भगाती है| दुःख इसी बात का है कि समाज में भोलापन समाप्त हो चुका है. आज तो १३-१४ की उम्र से बच्चे भी भोलापन छोड़ दे रहे है. दरसल तीन प्रकार के लोग ठगे जाते हैं,- लालची लोग, दिव्यता और ज्ञान को दरकिनार करके भव्यता में उलझे लोग और तीसरे परजीवी मानसिकता वाले लोग.
- वेदांत कहता है कि भय व डर वास्विकता नहीं है, माया है और भक्ति इस माया को समाप्त कर देती है, परन्तु हम भक्ति करें तो!
- विद्यार्थीयों के लिए बोलते हुए उन्होंने कहा कि वेदांत की एक छोटी-सी साधना बच्चों के पूरे व्यक्तित्व को बदल देगी. बस आप और आपके माता-पिता इसे समझें. “हर बीज में एक वृक्ष है और हर वृक्ष में एक बीज है. जब बीज को उचित माहौल मिलता है तथा उसका अनुशासित व अनुकूल खाद-पानी मिलता है तो वह वृक्ष के रूप में परिवर्तित हो जाता है. अन्यथा वह बीज मर जाता है और उसके अन्दर का वृक्ष जन्म लेने से पूर्व मर जाता है. उन्होंने कहा कि बच्चो को अंधभक्ति नहीं बल्कि वैज्ञानिक भक्ति सिखाओ नहीं तो ५० साल बाद सनातन संस्कृति का झंडा उठाने वाले भी आसानी से नहीं मिलेंगे|
- हर विद्यार्थी में ब्रह्म शक्ति होती है. परन्तु इस शक्ति को अनुशासन तथा उचित भोजन की अवश्याकता होती है जिसके फलस्वरूप वह अपने अन्दर अनगिनत गुण उत्पन्न कर सकता है अन्यथा वह भाग्य भरोसे रहकर जीवन भर भाग्य को कोसता रहेगा. वेदांत के अनुसार विद्यार्थी की सबसे बड़ी शक्ति वह स्वयं है. अतः उसे संसार की सभी चीज़ों से मन हटाकर थोड़ी देर अपने अन्दर के ब्रह्म को देखना चाहिए. कुछ ही दिनों के अन्दर उसको स्वयं के अन्दर महान परिवर्तन नज़र दिखाई देने लगेंगे.
- गुरूजी ने कहा – शब्द ‘मृत्यु’ एक बहुत ही सामान्य अवस्था है जिसका वास्तविक अर्थ है – देह का अंत यानी देहांत| यह आत्मा का अंत नहीं है| अतः मृत्यु का भय निर्मूल है| और जो भी लोग मन की गहराई से प्रभु में लीन हो जाते हैं, उनकी देह का अंत होने के बाद भी उनको अपने समस्त संस्कार और पूर्व घटनाओं का भान रहता है. वेदांत के अनुसार मृत्यु कुछ है ही नहीं| यह एक देह का अंत मात्र है जिसके उपरांत सत्कर्मियों को उच्चकोटि के फल प्राप्त होते हैं, सुख प्राप्त होता है, और दुष्कर्मियों को कठोर दंड मिलता है. उन्होंने कहा – यही स्वर्ग –नरक है. गुरूजी ने कहा मोक्ष मृत्यु के बाद नहीं बल्कि जीवन रहते मिलता है. मोह का क्षरण ही मोक्ष है अतः वेदान्तानुसार अपने वर्तमान जीवन को सुन्दर बनाओ और स्वर्ग नरक के चक्कर में ना पडो|
- इस कार्यक्रम में श्री गुरूजी ने चातुर्मास की सुन्दर व्याख्या की, जिसे सुनकर लोग भावुक हो गए| उन्होंने कहा कि चातुर्मास प्रारंभ होता है – आषाढ़ एकादशी से. इसके बाद कोई मंगल कार्य नहीं होता| इसे देवशयन एकादश भी कहते हैं और इस चार महीने सभी साधु संतों का यह कर्त्तव्य बनता है कि जगह-जगह जाकर वे चार महीने स्थित होकर लोगों में ब्रह्म जागरण करवाएं और लोग कठोर साधनाएं करें| चार महीने के बाद मनुष्य के भीतर के देव जाग्रत हो जाते हैं और इसे कहते हैं देव उठान एकादशी जो की कार्तिक एकादशी कहलाती है जिसके बाद सांसारिक कार्य शुरू होते हैं, परन्तु नासमझी की वजह से हमने इसे आतंरिक पर्व से अधिक बाह्य पर्व से जोड़ दिया.
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