हरिद्वार, 15 फ़रवरी; हरिद्वार कुंभ मेले की तैयारियों को लेकर सीसीआर में लगभग दो घंटे की बैठक के बाद मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र रावत ने 2021 में होने वाले कुंभ मेले के चार प्रमुख शाही स्नान की तिथि घोषित कर दी हैं। पहला शाही स्नान महाशिवरात्रि को 11 मार्च 2021, दूसरा स्नान सोमवती अमावस्या 12 अप्रैल 2021, तीसरे स्नान बैशाखी 14 अप्रैल 2021 व चौथा स्नान चैत्र पूर्णिमा को 27 अप्रैल 2021 को संपन्न होगा।

बैठक में मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र रावत ने अधिकारियों को सख्त निर्देश देते हुए कहा कि वे कुंभ कार्यों को समयबद्धता एवं गुणवत्ता के साथ संपन्न कराएं। इसमें जिन विभागों को कोई भी समस्या हो, उसे मेलाधिकारी के संज्ञान में लाएं। यदि स्वीकृति शासन स्तर से की जानी हो तो उसकी भी व्यवस्था की जाएगी।
मुख्यमंत्री ने कहा कि प्रमुख संतों को आवश्यक सुरक्षा एवं अखाड़ों से लगातार संपर्क कर कुंभ मेले हेतु कार्य किए जाएं। उन्होंने कहा कि अतिक्रमण हटाने के लिए समयबद्धता के साथ कार्य किया जाए। कुंभ क्षेत्र में निर्माण कार्यों के लिए निर्माण सामग्री की आवश्यकता के अनुसार विभागों को पट्टे आबंटित किए जाएंगे। इसके लिए दिन रात कार्य करने के लिए परमिट दिया जाए। मुख्यमंत्री ने कहा कि कुंभ मेले के सफल आयोजन के लिए सभी अखाड़ों के संत महात्माओं का सहयोग आवश्यक है।

शहर से बाहर भी सजेगी अखाड़ों की छावनी
कुंभ 2021 में पहली बार हरिद्वार में नीलधारा क्षेत्र में भी अखाड़ों की छावनी सजेगी। मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने छावनी में तमाम जरूरी व्यवस्थाओं को लेकर अखाड़ा परिषद के महामंत्री और संतों का आश्वस्त किया। ऐसे में अखाड़ा परिषद के महामंत्री हरीगिरी ने नीलधारा क्षेत्र में अखाड़ों की छावनी स्थापित को लेकर हामी भर दी। अन्य अखाड़ों के प्रमुख संतों ने महामंत्री की बात को पुख्ता करते हुए सरकार के प्रस्ताव पर सहमति जताई। कुंभ 2010 के मुकाबले कुंभ 2021 में अखाड़ों के संतों की संख्या दोगुनी होगी। अखाड़ा परिषद के महामंत्री श्रीमहंत हरिगिरी पहले इस बात की तस्दीक कर चुके थे। विस्तारीकरण को लेकर मेलाधिकारी दीपक रावत ने नया टापू, देवपुर मुस्तकीम और नीलधारा के पास भूमि को चिह्नित किया था।
नया टापू और देवपुर मुस्तकीम क्षेत्र में छावनी का विस्तार करने को लेकर संतों को कोई आपत्ति नहीं थी। लेकिन अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद शुरू से ही अखाड़ों की छावनी को शहर से बाहर ले जाने के विरोध में थी। पहले भी कुंभ आयोजन के दौरान नीलधारा छावनी स्थापित करने के सरकार के प्रयासों को झटका लग चुका है। प्रदेश सरकार और मेलाधिष्ठान पेशोपेश में थे कि योजना के अनुरूप बिना विस्तारीकरण के इतनी बड़ी संख्या में शिविर कहां लगाए जाएंगे। आखिरकार संतों के साथ निरीक्षण की रणनीति काम आई और संतों ने पहली बार शहर से बाहर छावनी स्थापति करने पर सहमति दी।
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