कथा की महिमा अपरंपार
– भव्य श्रीवास्तव

बहुत साल पहले एक राजा था, बचपन से सुनी कहानियां अमूमन इसी वाक्य से शुरु होती थी। कहानियां आसपास से गायब होती गईं, लेकिन आज आपको धार्मिक टीवी चैनलों पर कथाओं की भरमार नजर आती हैं। ये श्रवण की परंपरा का नया रूप है, जो टीवी से होकर हमारे घरों में रोज बह रही है। संतों से रची बसी इस सनातनी परंपरा में भगवा रंग के प्रति आस्था हमेशा से रही है। पंरपरा और आस्था के अनुसार संत के संग किसी भी प्रकार की चर्चा को सत्संग की उपाधि दी जाती हैं। आज सत्संग का रूप, स्वरुप, आकार-प्रकार और असर सबकुछ बदल चुका है। सत्संग टीवी के जरिए कथा और कथावाचकों की गरिमा, ग्यान, वैभव और महिमा से ओतप्रोत हो चुकी है। लेकिन कथाओं में जुट रही अपार भीड़ किस कारण से है, क्या ये धर्म के प्रति आसक्ति का भाव है या संत के प्रति अगाध आस्था। कथा का सही स्वरुप क्या है और ये कैसे शुरु हुई। क्या कथा एक इवेंट हैं या धर्म प्रचार का जरिया। क्या कथा संस्कार और जीवन मूल्यों को बढ़ाती है या ये संतों की वाणी और किसी ग्रंथ का प्रचार भर है। इन्हीं सवालों के जवाब के लिए हम धर्मकथाओं की विवेचना में लग गए, और जो निकलकर आया वो अत्यंत रोचक है।
“कथा कितने प्रकार की”
आंकड़े इस बात की पुष्टि तो नहीं करते पर देश में एक वक्त में लाखों कथाएं होती हैं, बड़े पंडालों से लेकर मोहल्ले के चौबारे और मंदिरों के प्रांगण में। कथा के लिए विषय तय से हैं। देश में अनवरत चलने वाली ज्यादातर कथाओं के विषय श्रीमद्भागवत, रामचरितमानस, देवीपुराण, लक्ष्मी-विष्णु महिमा और शिवपुराण पर केन्द्रित होते हैं। कथा को लोकप्रिय बनाने में कई धर्मगुरुओं ने बड़ा योगदान किया है। धर्म के चैनलों के आने के बाद कई जाने माने धर्मगुरुओं ने कथा को वैश्विक रुप देने की सोच और जन-जन तक पहुंचाने के लिए कई प्रयोग किए। वैसे आजकल जो कथाएं होती है उसके भी तीन प्रकार है। पहली संकल्पित कथा जो एक यजमान करवाता है ये उसके किसी इच्छापूर्ति या संकल्प से प्रेरित होती है, दूसरा निजी समिति के द्वारा कथा आयोजन, जिसमें हर दिन का यजमान अलग होता है। अमूमन भागवत कथा सात दिन की और रामकथा नौ दिन की होती है। ऐसी कथाओं में एक मुख्य यजमान और बाकी दिनों के लिए अलग अलग यजमान होते हैं। तीसरी कथाएं वो होती हैं जिनमें कथावाचक महाराज को संस्थाएं आमंत्रित करती है। वृंदावन के उभरते भागवतकथा वाचक पुण्डरीकजी महाराज इसके धार्मिक पहलू को रेखांकित करते हुए इसे इस प्रकार बताते हैं, “शास्त्र के दो स्वरुप है। पूर्व मीमांसा और उत्तर मीमांसा। उत्तर मीमांसा में दया, मानव सेवा का जिक्र है। पूर्व मीमांसा में पूजा है, पाठ है, कर्मकांड है। कथा ज्यादातर फल के लिए आयोजित होती है। मैं ऐसी कथाएं कम करता हूं। उत्तर मीमांसा के लिए जो कथाएं होती हैं, उससे लोगों को ग्यान मिलता है”।

” कथा में इतनी भीड़ क्यों”
आस्थावानों के इस देश में कथा अब बड़े बड़े पंड़ालों में भव्यता के साथ पैर पसार चुकी है। हाल में एक पंडाल में भीड़ का रिकार्ड भी बन गया। भागवतकथावाचक देवकीनंदन ठाकुर इस लोकप्रियता को इस तरह देखते हैं – “एक ही वजह है कि जो आज का जो बच्चा है, जो आमजन है वो परेशान हैं, और हमारी कथा की पुरातन पद्धति जो थी, वो इतनी गूण थी कि हमारे नौजवान बच्चों को समझ नहीं आती थी, वो कथाओं से दूरी ही बनाए रहते थे। हमने ऐसा सोचा कि आज की कथा को नौजवान बच्चों के अनुरूप होना चाहिए, भजनों को कथा के बीच में डाला, जिससे लोग वहीं नृत्य कर सकें, तो जो लोग नाचने गाने डिस्को में जाते थे, वो भगवान के आगे ही नृत्य करने लगे। दूसरा, भजन के साथ-साथ कथा में बीच-बीच में बोलचाल की भाषा का इस्तेमाल हम करने लगे हैं, वो उन लोगों की भाषा है जो वो आसानी से समझ लेतें है। इसलिए कथा में युवा बहुत आ गए जिससे कथा पंड़ालों में भीड़ बढ़ी।”

देवकीनंदनजी की कथा – राम की नगरी में, कृष्ण की पुकार, ठाकुरजी ने गाया कथासार
देश में रामकथा के जाने माने वक्ता मोरारी बापू मानते हैं कि, “कथा में लोग इसलिए आते हैं और घंटों तक जागृतिपूर्वक बैठते हैं, कहीं न कही कथा उसकी व्यथा को कम कर रही है और दबी हुई प्रसन्नता प्रकट करती है”।

देश के सबसे जाने माने धार्मिक चैनल आस्था के सीईओ प्रमोद जोशी के अनुसार, “जब आप किसी चीज को टीवी पर देखते हैं और जब वो आपके आसपास या शहर में आती है तो आप उसे देखना जरूर चाहेंगे। आप गंगा नदी को टीवी पर देखो और गंगा में जाकर स्नान करो तो दोनों का अलग ही आनंद है, तो जब आपके क्षेत्र में, आपके गांव में कोई आकर धर्म की गंगा बहाता है तो आप ललक में देखने जरुर जाएंगे न। इससे कथाओं में भीड़ बढ़ रही हैं।
बीएचयू में प्रोफेसर और समाजशास्त्री डॉ अजीत पांडे मानते हैं कि, “लोगों का अपना एक तो आत्मविश्वास कम हो गया है। वो ऐसे किसी चीज की खोज करते हैं जो उनकी जिंदगी का लक्ष्य है। इसको ढूंढने के लिए वो कथाओं की ओर मुखातिब होते हैं। वो अपने स्तर और सामुदायिक स्तर पर भी परेशान है। धर्म कथाओं में ऐसी चीजों की बात की जाती हैं, जो हमारी मूल्य व्यवस्था की बात करते हैं, समानता और शांति की बात होती है। धर्म कथाओं में भागवत पुराण की बात करतें है, कृष्ण सारी गोपियों के केन्द्र है। जबतक आप अपनी जिंदगी के सारी बाधाओं से ऊपर नहीं आते, तबतक आप भगवान को पा नहीं सकते। भौतिक सुख भी दिमाग की शांति नहीं होने से बेकार लगते हैं। इन्ही कारणों से लोग धर्मकथाओं की ओर आकर्षित होते हैं। आमलोगों के पास कोई ऐसा तकनीक नहीं है जिससे वो तनाव दूर कर सके, सो वे कथा सुनने जाते हैं।
“कथा सुनने के सकारात्मक प्रभाव”
देश में कथा की बयार में वृंदावन और गुजरात का खासा योदगान है, दोनों ही क्षेत्रों में कृष्ण भक्ति की जड़े हैं, मथुरा-वृंदावन से लेकर द्वारका तक राधे-राधे से लेकर जयश्रीकृष्णा तक हर कोई कथा की महिमा से ओतप्रोत हैं। देश में नामी भागवत कथावाचक रमेश भाई ओझाजी कथा को व्यक्तिगत, सामाजिक, और राष्ट्रीय प्रभाव पैदा करने का जरिया मानते हैं, वे कहते हैं कि “इससे एक तो प्रभु मे विश्वास में प्रकट होता है, उसके चलते आदमी तनाव से मुक्त हो सकता है। आजकल जिस स्पर्धा वाले युग इंसान में जी रहा है, उसके चलते कोई न कोई तनाव हमेशा रहता है, उसमें भी विफलताएं जब मिलती है, तो वो निराश होता है, वह निराशा हताशा में परिवर्तित होती है और वो हताशा आगे चलकर अवसाद में भी ले जा सकती है। मानसिक रोगों की संख्या भारत में बढ़ रही है, कथाएं उस स्थिति में जाने से बहुत बड़ा संबल बनकर हमें रोक सकती है। प्रभु में विश्वास और प्रभु में प्रेम के चलते ये भावना दृण होते ही परस्पर प्रेम और सद्भाव का वातावरण निर्माण होता है, और इस वातावरण के चलते एक दूसरे को छलने की कोशिश नहीं करेगा, इस तरह से कथाएं बहुत कुछ देती है, इसका केवल आध्यात्मिक ही नहीं, इसका व्यावहारिक पक्ष भी है और इसका सामाजिक पक्ष है और कथा सुनकर इंसान राष्ट्र की उन्नति में भी सकारात्मक परिवर्तन ला सकता है। प्रसिद्ध रामकथा वाचक मोरारी बापू इसे सारगर्भित तरीके से उल्लेखित करतें है, “कथा सुनने के बाद लोग, खासकर युवक सत्य के समीप जा रहे हैं. लोग सच्चे प्रेम को समझने लगे है, मानो किसी को कहे बिना भीतर से संकल्पित होते जा रहे हैं”।
जरूर जानें – SANDIPANI VIDYANIKETAN: Serving Humanity with Dharma
भागवताचार्य पुण्डरीकजी महाराज कहते है कि, “धर्म के दो पहलू हैं, दर्शन और संस्कृति। कथा एक ऐतिहासिक और पौराणिक शब्द है। इसमें भारत का इतिहास छुपा है। जब हम कथा रामायण और महाभारत के प्रसंगों पर होती है तो हमें भारत के दर्शन और संस्कृति का पता चलता है। कथा अपने से जोड़ती है। कई लोग अपनी जिग्यासा के लिए, कई लोग एक कर्मकाण्डीय पद्धतियों को पूरा करने के लिए इसे सुनते हैं। आजकल हर कोई शांति और आनंद की खोज में हैं. कथा आनंद को तृप्त करती है, विवेक मिलता है। हमारे शास्त्र में आज्ञा नहीं है, वहां प्रज्ञा है। कहा गया है कि बिनु सत्संग विवेकु न होए, सो कथा विवेक पैदा करती है”।
समाजशास्त्री डॉ अजीत पांडे मानते हैं कि इससे संस्कारों की परत का निर्माण होता है, “धर्मकथा का आधार है हमारी परंपरा। हम भारतीय समाज में चार मूल्य व्यवस्थाओं में बांटते हैं, एक तो हाइरारकी है, जो वर्ण व्यवस्था की बात करता है। दूसरा जीवन व्यवस्था है जो जीवन को चार भागों में बांटती है। ब्रह्मचर्य से संन्यास तक। तीसरी निरंतरता की सोच है, जो इस दुनिया से लेकर जीवन की बाद में भी मौजूद है, ऐसा विश्वास है। यहां समाज के कई तरह के स्तर है, जो समाज के निरंतरता दे रही है। धर्मकथा से संस्कार को बढ़ावा इसलिए मिलता क्योंकि कथा में हमारे भारतीय समाज की सोच पेश की जाती है”।
हालांकि ज्यादातर कथावाचक इसे आज की उभरने वाली समस्याओं से जोड़कर देखने लगे हैं, भागवताचार्य देवकीनंदन ठाकुर साफ कहते हैं कि, “कथा सुनने से आपके मन को जो शांति मिलती है वो किसी धन दौलत से नहीं ला सकते, किसी भी जगह वो नहीं मिलती। मैनें कितने लोगों को ये कहते सुना कि उन्होनें शराब पीनी छोड़ दी, कई बंगाली भक्तों ने बताया कि उन्होंने मछली, जो उनके लिए आलू जैसा है, खाना छोड़ दी। बच्चों ने कई बुरी आदतें छोड़ दी। कथा का बहुत बड़ा योदगान होता है, सच्चरित्र जिंदगी जीने के लिए”।
बीएचयू के शिक्षक और धर्म मर्मज्ञ पं. गिरिजाशंकर शास्त्री के अनुसार कथा के श्रवण से परमात्मा रुपी मन को शांति मिलती है, “संसार को दावानल कहा गया है, इस दावानल में सभी तप रहे हैं, कथा तप्त जीवन में अमृत बरसा देती है। वे बताते हैं कि पहली कथा उर्वशी और पुरुरवा और यम और यमी के संवाद को माना गया है, ये संवाद कथा का पहला स्वरुप माना जाता है, इसका वर्ण श्रग्वेद में वर्णन है। वेदों में जो भी उपदेशात्मक बातें कहीं गई है, वो सब कथाओं में कही सुनी जाती है, ये जीवन को सरलता और संतुलन से जीने की प्रेरणा देती है। गिरिजाशंकर शास्रीजी ये भी बताते हैं कि श्रीमदभागवतपुराण की कथा इसलिए लोकप्रिय है कि क्योंकि श्रीकृष्ण कलियुग में पूर्ण अवतार के रुप में आए और उनकी कथा सुनने से जीवन के हर समस्या का समाधान पता चलता है।
“जब कथा ने किसी का जीवन बदला”
कथा पंडालों में हजारों की भीड़ में हर किसी के मन में चलने वाली इच्छाओं और समस्याओं का वैग्यानिक विश्लेषण तो होना अभी बाकी है, लेकिन जब कथा ने किसी के जीवन को बदला तो इसे मानक मानकर धर्मगुरु इसके महातम को बतातें जरुर है। भागवताचार्य रमेशभाई ओझा ने इसे समाज में किसी कमजोर की मदद की अस्त्र माना तो मोरारी बापू ने इसे मूल्य और आदर्शों को जीने की माध्यम।

रमेशभाई ओझा एक प्रसंग का जिक्र करते हुए बताते हैं कि, जैसा कि मैंने कहा कि एक तो भगवान में, परमसत्ता में विश्वास को प्रकट करती है कथा, और उसके चलते इंसान बहुत सारी निराशा, हताशा और अवसाद से बच जाता है। बहत साल पहले एक कथा सौराष्ट्र के किसी एक शहर में थी, तीन दिन कथा हुई, चौथे दिन मेरे हाथ में एक चिट्ठी आती है, और वो एक युवक द्वारा लिखी होती है। उसमें उसने लिखा था कि उसके परिवार में बूढ़ी मां है, बीमार पिता है, दो बहनें हैं, मैं छोटा भाई हूं, ग्रेजुएशन कर लिया है, बहनें विवाह के योग्य हैं, स्वाभाविक रुप से पिताजी को चिंता है। धन की कमी है, मैने ग्रेजुएशन कर लिया है मुझे काम करना चाहता हूं, निष्ठा से करना चाहता हूं। लेकिन कोई सरकारी नौकरी के लिए जाता हूं तो पैसा मांगते हैं, और प्राइवेट में अनुभव मांगते हैं, बिना अवसर के अनुभव कहां से मिलेगा और बिना नौकरी के पैसा कहां से मिलेगा। मैं हताश निराश हो चुका था। पिता की पीड़ा मुझसे देखी नहीं जाती। तो मैं हताश-निराश होकर आत्महत्या का विचार पक्का कर लिया था। तब अचानक पता चला कि शहर में भागवतकथा होने वाली है। चूंकि हमारे यहां ये मान्यता है कि आत्महत्या पाप है, और जो एक बार आत्महत्या करता है उसकी सद्गति नहीं होती। और सामने लोकों में ये भी श्रद्धा है कि जो श्रीमदभागवत का श्रवण करता है उसकी सद्गति निश्चित हो जाती है। तो मैने सोचा कि मैं भागवतकथा सुनकर ही अपने जीवन का अंत करुंगा। उसने लिखा कि मैनें थोडे से अपने मन को रोक लिया, आज तीसरा दिन हुआ है और तीन दिन में मेरा आत्मविश्वास बढ़ा है और मेरे मन में आत्महत्या का जो कमजोर विचार था, उसको दिमाग से निकाल दिया है। और अब मैं अपनी समस्याओं से संघर्ष करूंगा और प्रभु कृपा से जरूर मैं सफल होउंगा। ये केवल एक वाकया है, कि किस तरह से कथा प्रभावित करती है। थोडी कल्पना भी हम करते हैं कि यदि कथा के बहाने वो नहीं रुकता तो उस परिवरा की क्या गति होती। पूरा परिवार बिखर जाता। इस तरह से एक कथा निर्वाण यानि मोक्ष की बात तो करती ही है, व्यक्ति और समाज के निर्माण में भी बहुत बड़ा योगदान करती है। कथा से माध्यम से कई स्कूल-कालेज बनें हैं, कई अस्पाल बने है, वो भी निर्माण है और सबसे महत्वपूर्ण कोई निर्माण तो वो चरित्र का निर्माण। मुख्य बात ये है कि हेतु स्पष्ट होना चाहिए, साधन शुद्ध होना चाहिए, शास्त्र के साथ हमारा सीधा संबंध हो और सात्विकता बनी रहे, इस प्रकार से ये कार्य होनी चाहिए।
मोरारी बापू ने उनकी कथा से आए एक प्रसंग का उल्लेख किया, “हाल ही में मेरी बातें सुनकर नलसरोवर में विदेशों से आने वाले प्रवासी पक्षियों को कभी न मारने का संकल्प लिया। शिकारियों ने संकल्प लिया कि वे कभी किसी को नहीं मारेंगे। अपना जाल दान कर गए”।
भागवताचार्य देवकीनंदन ठाकुर बताते हैं कि, बहुत उदाहरण है, एक बच्चे को कैंसर था, और उसके मां पिता ने सारी उम्मीदें छोड़ी दी थी। और उन्होनें भागवत कथा का आयोजन किया और इस संकल्प से सुनी कि मेरा बच्चा ठीक हो जाए। और भागवत कथा सुनने के बाद जब उसकी जांच हुई तो उसका रोग कम हो गया। मैं इसे चमत्कार नहीं कहता, लेकिन ये उनकी अगाध श्रद्धा थी, जिससे परिवर्तन होते हैं। इतने नियम और आस्था से उन्होनें कथा सुनी कि बदलाव शुरू हो गए। कितने लोग गलत रास्ते थे, आज माला झोली लेकर भगवान की राह पर चल रहे हैं। कल जब मैं अपनी कथा पूरी कर रहा था कि लोग दहाड़ें मार मारकर रो रहे थे, मैनें इतना बड़ा परिवर्तन देखा है कथा सुनने से।
“महंगी कथाओं का दौर”
मोरारी बापू बताते हैं कि, “जितना जरूरी है वो तो करना ही पड़ता है। लाउडस्पीकर की व्यस्था करना पड़ती है, दुनिया के 170 देशों में कथा की जा रही है, सो टीवी पर लाइव टेलीकास्ट जरूरी है। पंडाल बनाना जरूरी है। मैं अनावश्यक खर्चे के पक्ष में नहीं हूं, मैं जब किसी को कथा देता हूं, तो दबाव डालकर कहता हूं कि एक पैसा भी अकारण खर्चा न करें, कथा कोई विवाह का रिसेप्शन नहीं है। कथा में हमारे यहां सौराष्ट्र-गुजरात से लेकर पूरे देश में भंडारा चलता है, लोगों को भोजन परोसा जाता है। कथा के साथ बहुत सामाजिक प्रवृत्तियां होती हैं, एक कथा में कई लोगों का गुजारा चलता है, कथा से कई लोगों का भौतिक और आध्यात्मिक फायदा हो रहा है”।
चमक-धमक से भरी कथाओं में आज बड़े बड़े पंडाल से लेकर, लाइटिंग, साउंड, बैठने और खाने की व्यस्था के साथ साथ धार्मिक चैनलों पर लाइव टैलिकास्ट पर लाखों का खर्चा आता है। धार्मिक चैनलों से सालों से जुडे रहे सतीश शर्मा बताते हैं कि, “छोटी-मोटी कथा तो पांच-छह लाख में संपन्न हो जाती है लेकिन किसी भी बड़े धर्मगुरु की कथा 25 लाख के नीचे नहीं बैठती। नामी धर्मगुरुओं के साथ उनका कैमरा, साउंड और लोगों का एक रेला चलता है, इसका ही खर्चा लाखों में बैठता है, ये सारा इंतजाम कथा आयोजक को करना होता है”।
प्रसिद्ध भागवताचार्य रमेशभाई ओझा कहते हैं कि, “जितनी बड़ी तादाद में लोग इक्टठे होंगे, उस हिसाब से कुछ व्यवस्थाएं भी अनिवार्य हो जाती है। अब नैमिशारण्य तो रहा नहीं, पंडाल बनाना ही पड़ेगा, छांव में बैठने के लिए। हर कथा गोमती, गया और गंगा के तट पर तो होती नहीं, तो जहां कथा हैं, वहां पानी की व्यवस्था तो करनी पडेगी। जहां इतनी बड़ी संख्या में लोग आएंगे तो इंतजाम कराना पड़ेगा। लेकिन मैं एक बात जरूर कहूंगा कि इसमें राजसिकता ज्यादा न हो इसके सात्विकता का जो दर्शन है, वो बना रहें ये प्रयास हम लोगों का होना चाहिए”।

देवकीनंदन ठाकुरजी का मानना है कि, “आजकल पहले जैसे श्रोता नहीं हैं, जो पेड़ के नीचे बैठकर कथा सुन लेते थे। कथा में संसाधान बढ़े हैं तो इनके लिए बढ़े हैं, वृद्ध हैं तो सोफा चाहिए, युवाओं के साफ सुथरा वातावरण चाहिए, थोड़ी भी धूल मिट्टी में वो नहीं एडजस्ट नहीं करते। इन सब चीजों को ध्यान में रखते हुए संसाधनों की जरूरत बढी है। हमलोगों को भी सहूलियतों के लिए माइक और संगीत चाहिए। जो लोग कथा कराते हैं, जो यजमान होते हैं और भक्त लोग इक्टठे होते हैं वो इन साधनों का इंतजाम करवातें हैं”।
कथाओं के आयोजनों में आने वाली भारी भीड़ ने बहुत कुछ बदल दिया है। इसे लेकर इंतजाम की जरुरतों से कथा की सादगी और संदेश को प्रभावित भी किया है। बीएचयू में समाजशास्त्र की प्रोफेसर डॉ. अजीत पांडे इसे एक तरह के प्रभाव क्षेत्र का विस्तार मानते हैं। “समाजशास्त्रीय विशलेषण करें तो ये हेजोमेनिक डोमिनेंट कल्चर को बढावा देता है। धर्मगुरु अपने लाभ के लिए, शोहरत कमाने के लिए एक जमींदार की तरह भी व्यवहार करते हैं। धर्मगुरु अपने प्रभाव को लोगों की इच्छाओं से जोड़ते हैं, और लोगों को लगता है कि हमारा कल्याण हो रहा है, और इसलिए वो अपनी हैसियत में पैसा दान करते हैं, जिससे कथाएं बड़ी और पैसे से ओतप्रोत होती जा रही है।
“टीवी ने कथा को वैश्विक बना दिया”
धर्म चैनलों की शुरूआत को पहले दिन से देखने वाले आस्था चैनल के सीआईओ प्रमोद जोशी बताते हैं कि, “धार्मिक चैनलों पर आने से पहले भी कथाओं में लोग आते थे। सन् 2000 में आस्था चैनल लॉंच हुआ, उससे पहले भी टीवी चैनल पर कथा चलती थी। जीटीवी पर 20 मिनट का कथा अंश चलता था। जब धार्मिक चैनल शुरु हुए तो हम संत महात्माओं के पास गए और कहा कि आप किसी जगह कथा कराते हो, तो जो लोग वहां बैठकर देखते सुनते हैं, वो ही लाभ ले पा रहे हैं। इसी चीज को हम शूट-रिकार्ड करके, टेलीकास्ट करके टीवी पर दिखाएंगे, तो घर बैठे लाखों लोग उसे देख पाएंगे। उनका कहना है कि, व्यक्तिगत रूप से कोई भी संत एक जगह कथा कर रहे हैं, सात दिन या नौ दिन की, तो महीने में तीन और साल में ३६ कथा कर पा रहे हैं तो वो ३६ जगहों पर जाएंगे तो उतने ही लोग सुन पाएंगे जो वहां होंगे, जब उसका प्रसारण टीवी चैनल पर होता है तो घर बैठे व्यक्ति को आभास होगा कि वो कथा में ही हूं। कथा इससे प्रसार पाती गई”।
भागवतकथा वाचक रमेश भाई ओझा मानते हैं कि, “टीवी के माध्यम से अनेक लोगों तक कथा पहुंची। लेकिन एक बात मैं कहूं जहां तक सौराष्ट्र का और हमारे गुजरात का, उस प्रांत का प्रश्न है, जब टीवी चैनल नहीं हुआ करती थी, तब भी जनता इतनी ही थी, पूज्य डोंगरी जी महाराज की कथा में तो संगीत भी नहीं हुआ करता था, व्यास पद्धति से कथा होती थी, तब भी जनता इतनी बड़ी संख्या में लाखों लोगों की संख्या में होती थी। टीवी चैनलों ने जरूर ये काम किया कि केवल व्यास पीठ के समक्ष बैठे लाखों हजारों लोगों तक ही नहीं, जो जहां हैं वहां और लाखों लोगों तक ये संदेश पहुंचता है। ये प्रधान काम है इसका”।
देवकीनंदन ठाकुर इसे दो तरीके से देखते हैं, “मेरा तो मानना है कि आजकल के कथाकारों और संत महात्माओं ने कथा को लोकप्रिय बनाया है, टीवी चैनलों पर तो बहुत सारी चीजें हैं जो चलती तो हैं, पर प्रचारित नहीं होती। लेकिन आजकल के साधु महात्मा ने कटिबद्ध होकर, वचनबद्ध होकर लोगों तक पहुंचने की कोशिश की है, लोंगों को जोड़ा है, टीवी का योगदान है, पहले हम एक जगह बैठकर कथा सुनाते थे तो एक शहर के लोग आते थे, अब पूरी दुनिया सुनती है”।
संतों की कथाओं के प्रति आज हर वर्ग में विशेष आकर्षण है। इसकी वजह कई मायनों में टीवी भी है। प्रमोद जोशी का कहना है कि, “टीवी पर शुरुआती कथा करने का कार्य रामकथा वाचक मोरारी बापूजी, भागवतकथा वाचक भाईश्री रमेश भाई ओझाजी, आसाराम बापू और किरीट भाईजी ने किया। टीवी के पहले भी लोग धार्मिक आयोजनों और कथाओं में आते थे, इसमें कोई संशय नहीं है। लेकिन जब टीवी नहीं था, तो उनका संदेश उन लोगों के बीच में ही था, जो वहां मौजूद रहते थे। आज टीवी पर लाइव आने वाले संतों को पूरी दुनिया में लोग पहचानते हैं। लोग कहते हैं कि फला संत को हमनें टीवी पर देखा है। प्रमोद जोशी बताते हैं कि, स्वामी रामदेवजी कहते हैं कि, “जो कार्य मैं या बहुत सारे साधु संन्यासी सौ वर्षो में कर पाते, वो दस वर्षों में टीवी और संचार माध्यमों की वजह से हो पाया, योग और स्वदेशी का प्रचार इससे दूर-दूर तक हो पाया। इलेक्ट्रानिक माध्यम के उपयोग से बहुत कुछ तय होता है, आप उसका उपयोग कैसे करते हैं”।
धार्मिक टीवी चैनलों और सामान्य टीवी चैनलों पर धर्मगुरुओं की मौजूदगी से एक बात को साफ है कि वो मीडिया या टीवी का ताकत को समझ चुके हैं और इसके लिए व्यय करने से अब नहीं हिचकते। धार्मिक चैनलों पर दिखने वाली सारी कथाओं का शुल्क ये चैनल लाखों में लेते है। जाहिर है इससे कथा को विस्तार मिला और कहीं न कहीं ये व्यापार के तौर पर भी देखी जाने लगी।
“कथा कैसे आयोजित होती है”
कथा का आयोजन एक दुरुह प्रक्रिया भी है। अमूनन लोग अपनी मनोकामना, भगवान के प्रति आभार जताने और संस्थाएं धर्म और मूल्यों के प्रचार के लिए कथाएं करवाती है। एक कथा में अब लाखों करोड़ों खर्च होते हैं। तो आखिर इसके लिए धन कहां से आता है। और क्या गुरु कथा करने का कोई शुल्क लेते हैं। रमेश भाई ओझाजी कहते हैं कि, “जहां तक मेरा प्रश्न है, जिनको कथा के आयोजन की इच्छा होती है, प्राय संस्थाएं ही आती है, और वो प्रार्थना हमारे ठाकुरजी के चरणों में रख देती है, और कहते रहते हैं लोग कि समय-समय पर आ करके जय श्रीकृष्ण कर लिया करो, ताकि हमको याद आए, फिर जब ठाकुरजी अनुकूलता देते हैं तो वहां कथा के लिए चले जाते हैं। और निश्चित रूप से इसका सारा खर्चा आयोजक और आयोजन के संबंधित जो भक्त लोग हैं वहीं सबलोग मिलकर उठाते हैं। मैं वैयक्तिक रुप से कुछ शुल्क नहीं लेता। जिनको जो सेवा करनी होती है वो संस्था की सेवा करते हैं, जो कि सांदीपनी आश्रम में जो गुरुकुल चल रहा है, वहां इतने छात्र पढ़ रहे हैं, उनसे रहने, भोजन, वस्त्र इत्यादि का कोई शुल्क नहीं लिया जाता है, और उनको वेद, संस्कृत शास्त्र आदि का अध्ययन कराया जाता है और जो भी लोग सेवा करते है उस निमित्त वो सब इस सत्कार्य में लग जाती है”।
देवकीनंदन ठाकुर साफ करते हैं कि, “मैं कथा करने का कोई शुल्क नहीं लेता। लेकिन जो हमारी मंडली जाती है, जो ब्राह्मण जाते हैं, जो संगीतज्ञ जाती है, उसका खर्चा आयोजक को करना होता है”।
कथा के आधुनिक विकास के साथ साथ एक आर्थिक व्यवस्था ने जन्म ले लिया है। कथा इवेंट मैनेजमेंट का तरह काम करने लगी है, बस फर्क सिर्फ भावना है। अमूमन कथावाचक पूरे देश और दुनिया में घूम-घूम कर कथा करते हैं और इसकी सारा खर्चा आयोजक करते हैं, यहां प्रायोजक जैसा कोई विधान अभी नहीं है। हर कथा के लिए एक प्रमुख आयोजक, या एक व्यक्तियों का समूह होता है जो खर्चे का वहन करती है। एक कथा में आज पांच लाख से लेकर 2 करोड़ तक खर्च होने लगा है। अमूमन कोई भी कथावाचक कथा करने के पैसे नहीं लेता, लेकिन उसके आने जाने का खर्च, ठहरने, खाने की पूरी व्यवस्था आयोजक ही करता है। सारे कथावाचकों की एक संगीत मंडली और साथ चलने वाले कुछ संत होते हैं, जिनका सारा खर्च भी आयोजन को उठाना पड़ता है। कथा होने के स्थान का चयन, उस जगह का किराया, मंच का निर्माण, भक्तों के लिए बैठने की व्यवस्था, पानी और पंडालों की सारी व्यवस्था आयोजक उठाता है। कथा के प्रचार और प्रसार का भी सारा खर्च आयोजक को उठाना पड़ता है। धार्मिक चैनलों पर कथा को लाइव दिखाने या बाद में किसी चैनल पर दिखाने का खर्च लाखों में पड़ने लगा है, इसकी जिम्मेदारी भी आयोजक या समूह की होती है।
“वक्त के साथ बदलती कथा”
जाहिर है वक्त के साथ कथा भी बदल रही है। धीर-गंभीर कथा वाचन में हास परिहास और आज के व्यावहारिक बातों को पिरोया जा रहा है। लोग कथाओ में जिस भी कारण से जा रहे हैं, उसमें धार्मिक मनोरंजन का पूरा स्थान बन गया है। मोरारी बापू कहते हैं कि, “बहुत-बहुत परिवर्तन आ रहा है। मेरी व्यास पीठ को देखिए, हर दिन वहां एक नूतन फूल खिल रहा है, मैं पहले एक दिन में दो समय कथा करता था, लेकिन मुझे लगा कि छह-छह घंटे पूरा दिन बैठाना ठीक नहीं। बेहतर है कि मैं तीन या चार घंटे एक बार में कथा करु, जिससे आधा दिन लोग समय का और उपयोग कर सकें। रामायण का हर प्रसंग हर कोई जानता हैं, अब उनमें से कोई पात्र, कोई सूत्र कोई प्रसंग और कथा में गाकर कथा को न्याय दे देता हूं। इसके माध्यम से सात्विक और तात्विक चर्चा करता हूं, जिससे लोग गहराई में जा सकें”।
रमेशभाई ओझा कहते हैं कि, “कथा का स्वरुप निश्तित रूप से बदला है, और बदलना स्वाभाविक है। गंगा जब गंगोत्री से निकलती है और गंगासागर तक जाती है तबतक वो कई रुप में नजर आती है।। जिसमें भी गतिशीलता है उसमें परिवर्तनशीलता भी होगी। वो स्वरूप रोचक तो हो ही हो, उसके साथ कल्याणकारी भी हो, और शास्त्र की मर्यादा में रहकर हो, तो ऐसा जो परिवर्तन वो बिल्कुल सही होगा।
“कथा का विदेशी प्रभाव”
कथा से जुड़ा एक बड़ा वर्ग उन भारतीयों का है, जो विदेश में रहते हैं। विदेशों में लोग यूट्यूब, आईपीटीवी और मोबाइल में धार्मिक कथा सुनते हैं, और ये उनमें एक भारतीयता के भाव को सजीव रखती है। विदेशों में लोग अपनी संस्कृति को समझने के लिए कथा से जुड़ते हैं। वो इसके माध्यम से अपने बच्चों को संस्कार सिखाते हैं। विदेशों में भारतीय धार्मिक चैनलों देखने वाले बताते हैं कि, वो अपने बच्चों को पश्चिमीकरण से बचाने के लिए धार्मिक कथाओं को देखते सुनते हैं। भारत के बड़े शहरों में कथाओं के आयोजनों से भी एक बड़ा वर्ग कथाओं से जुड़ रहा है, मुंबई की प्रतिमा केजरीवाल कहती है कि, ‘मैं १३ साल की उम्र में अपनी दादी के साथ कोलकाता में रामसुखदासजी महाराज की रामकथा सुनने जाती थी, उनकी कही बातें मुझे आज भी याद हैं, वो मानती है कि कथा सुनने से संस्कार और जीवन की समझ का विस्तार होता है”।
“क्या कथा भविष्य में रहेगी”
कथा ने रूप बदल लिया है, वो व्यापक और प्रभावी हो गई है। लेकिन क्या कथा आने वाले सालों में भी बची रह पाएगी, या तकनीक का अंतरिक्ष और समय की अनुपलब्धता इसे कमजोर कर देगी। कई वैश्विक शोधों से ये तो साफ हो गया है कि २०५० में धर्म के प्रति आस्था तो बढ़ेगी पर इसका रुप रंग क्या होगा ये तय नहीं है। लेकिन कथा के भविष्य को लेकर आज के वैश्विक प्रसिद्ध कथाकार सकारात्मक हैँ। मोरोरी बापू मानते हैं कि, “कथा रहेगी और टिकेगी, हरि अनंत और हरि कथा अनंता। कथा हमेशा रहेगी”। वहीं रमेशभाई ओझा कहते हैं कि, “चाहे उसका स्वरुप बदलेगा, लेकिन कथा तो बरकरार रहेगी, चाहे वो प्रवचन के रुप में हो, लेकिन इसका जो मूल संदेश है वो तो रहेगा हमेशा, क्योंकि जबतक जीवन है तबतक प्यास भी लगेगी, और जबतक प्यास है पानी कभी आउट आफ डेट नहीं हो सकती है, कथा गंगाजल ही है वो कभी आउट आफ डेट नहीं होगी”। देवकीनंदन ठाकुर के अनुसार, “जिस प्रक्रिया से हम जा रहे हैं, कथा आगे रहेगी अगर इस स्थिति पर कहीं विराम लगा और कहीं हम लोगों को रोकने की कोशिश की गई अथवा हमलोग अपनी सच्चाई को हम बचाकर नहीं रख सकें तो कथा विलुप्त भी हो सकती है। आज व्यक्ति मनी माइंडेड हो रहा है। उससे मन में शांति नहीं है, छोटे छोटे बच्चे तनाव में जा रहे हैं। वो सत्य से कोसों दूर है, जबतक वो सत्य उन्हें समझ नहीं आ जाएगा कि सत्यमेव जयते और सत्यात्मकं त्वं शरणं प्रपन्ना, वही एक सत्य है जहां से हमें भेजा गया और जहां हमें जाना है। लेकिन रावण और कंस जैसे दुराचारी धर्म, सत्ता और सत्संग को नहीं मिटा सके, तो मुझे नहीं लगता कि भविष्य में कथा खत्म की जा सकती है।
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भव्य श्रीवास्तव
लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं और पिछले कई वर्षों से धर्म और आध्यात्म कवर कर रहे हैं
संपर्क – bhavyasri@outlook.com
Editorial Review Note
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