गुरुवायुरप्पन मंदिर: जानिये क्या है इस मंदिर का इतिहास, कैसे हुआ इसका निर्माण
गुरुवायुरप्पन मंदिर भारत में चौथा सबसे बड़ा मंदिर है जहाँ हजारों श्रद्धालु हर दिन आते हैं. मंदिर को “भूलोक वैकुनतम” भी कहा जाता है और इस मंदिर में बहुत शुभ माना जाता है. केरल राज्य के त्रिसूर जिले में गुरुवायुर मंदिर के आसपास के इलाकों का स्वरूप तो बहुत बदल गया है लेकिन कुछ नहीं बदला है वो भगवान के प्रति भक्तों की अटूट श्रद्धा.
मंदिर के देवता भगवान गुरुवायुरप्पन हैं जो बालगोपालन कृष्ण भगवान का बालरूप के रूप में हैं. हालांकि गैर-हिन्दुओं को मंदिर में प्रवेश की अनुमति नहीं है. कई धर्मों को मानने वाले भगवान गुरूवायूरप्पन के परम भक्त हैं. केरल के गुरुवायुर में स्थित गुरुवायुर मंदिर बाल गोपाल श्रीकृष्ण का प्रसिद्ध हिंदू मंदिर है. ये भारत के सबसे प्राचीन मंदिरों में से एक है. यहां भगवान कृष्ण की पूजा गुरुवायुरप्पन के रूप में की जाती है. मंदिर में भगवान विष्णु के दस अवतारों का भी वर्णन किया गया है.
मंदिर से जुड़ी कथा
मान्यता है कि इस मंदिर में जिस मूर्ति की स्थापना की गई है वह मूर्ति द्वारिका की है. एक बार जब द्वारिका में भयंकर बाढ़ आई तो यह मूर्ति बह गई. देव गुरु बृहस्पति को भगवान की ये मूर्ति मिली. उन्होंने वायु देव की सहायता से इस मूर्ति को उपयुक्त स्थान पर पहुंचा दिया. वायु और बृहस्पति इस मूर्ति की स्थापना के लिये एक उपयुक्त स्थान ढूंढ रहे थे. तभी वह केरल पहुंचे. जहां उन्हें महादेव और माता पार्वती के दर्शन हुये. महादेव के कहने पर बृहस्पति और वायु ने उस मूर्ति की स्थापना की. गुरु और वायु के नाम पर ही इस मंदिर का नाम गुरुवायुर श्रीकृष्ण मंदिर पड़ा. हालांकि इस मंदिर में गैर-हिन्दुओं को प्रवेश की अनुमति नहीं है, फिर भी कई धर्मों अनुयायी भगवान गुरूवायूरप्पन के परम भक्त हैं.
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अन्य कला और साधना से जुड़ा है यह मंदिर
यह मंदिर केवल धर्म कर्म और पूजा पाठ से ही नहीं बल्कि कला और साहित्य से भी है. ये मंदिर प्रसिद्ध शास्त्रीय नृत्य कला कथकली के विकास में सहायक रही विधा कृष्णनट्टम कली, जोकि नाट्य-नृत्य कला का एक रूप है उसका प्रमुख केंद्र है.
गुरुयावूर मंदिर प्रशासन जो गुरुयावूर देवास्वोम कहलाता है एक कृष्णट्टम संस्थान का संचालन करता है.
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