होलाष्टक 2018 : क्यों अशुभ माने जाते हैं होली के पहले और बाद के दिन ?

- वर्ष 2018 में 23 फरवरी 2018 से 1 मार्च, 2018 के मध्य की अवधि होलाष्टक पर्व की रहेगी
- होलाष्टक के अशुभ होने क्योंकि होली के त्योहार से आठ दिन पहले ग्रह उग्र
- होलिका दहन, होली त्यौहार का पहला दिन, फाल्गुन मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है
- चन्द्र मास के अनुसार फाल्गुन मास की पूर्णिमा को होलिका पर्व मनाया जाता है
- फाल्गुन शुक्ल अष्टमी से फाल्गुन पूर्णिमा तक होलाष्टक माना जाता है, जिसमें शुभ कार्य वर्जित रहते हैं
इस वर्ष 2018 में होलाष्टक 23 फरवरी को लगेगा और 01 मार्च 2018 तक रहेगा। होली की सूचना होलाष्टक से प्राप्त होती है।
ज्योतिषाचार्य पण्डित दयानन्द शास्त्री ने बताया कि ज्योतिषीय दृष्टि से देखें तो होलाष्टक के अशुभ होने के पीछे यह कारण माना जाता है कि होली के त्योहार से आठ दिन पहले ग्रह उग्र होते हैं। अष्टमी तिथि को मन के कारक ग्रह चन्द्रमा, नवमी तिथि को ग्रहों के राजा सूर्य जो आत्मा के कारक के भी माने जाते हैं वह उग्र होते हैं।
दशमी तिथि को न्यायकर्ता शनि उग्र रहते हैं। एकादशी तिथि को शुक्र, द्वादशी तिथि को गुरू, त्रयोदशी तिथि के दिन बुध, चतुर्दशी तिथि को मंगल और पूर्णिमा तिथि के दिन राहु अपने उग्र रूप में होते हैं।
ग्रहों के उग्र होने से इन दिनों मन विचलित रहता है और जो भी शुभ काम किया जाता है उनमें विध्न बाधाएं आती हैं।
हमारे देश में होली का त्योहार रंगो का त्यौहार होता है और लोग इसको खुशी और उल्लास के साथ मनाते हैं मगर होली से ठीक 8 दिन पहले होलाष्टक शुरू हो जाता है होलाष्टक के समय शुभ कार्य करना वर्जित होता है और होलिका दहन के बाद तक होलाष्टक चलता है। होलाष्टक से होली के समय तक तंत्र मंत्र यंत्र का जोर होता है।
चन्द्र मास के अनुसार फाल्गुन मास की पूर्णिमा को होलिका पर्व मनाया जाता है। होली पर्व के आने की सूचना होलाष्टक से प्राप्त होती है. होलाष्टक को होली पर्व की सूचना लेकर आने वाला एक हरकारा कहा जात सकता है. “होलाष्टक” के शाब्दिक अर्थ पर जायें, तो होला+अष्टक अर्थात होली से पूर्व के आठ दिन, जो दिन होता है, वह होलाष्टक कहलाता है ।
सामान्य रुप से देखा जाये तो होली एक दिन का पर्व न होकर पूरे नौ दिनों का त्यौहार है। दुलैण्डी के दिन रंग और गुलाल के साथ इस पर्व का समापन होता है ।
होली की शुरुआत होली पर्व होलाष्टक से प्रारम्भ होकर दुलैण्डी तक रहती है. इसके कारण प्रकृ्ति में खुशी और उत्सव का माहौल रहता है. वर्ष 2018 में 23 फरवरी 2018 से 1 मार्च, 2018 के मध्य की अवधि होलाष्टक पर्व की रहेगी.
होलाष्टक से होली के आने की दस्तक मिलती है, साथ ही इस दिन से होली उत्सव के साथ-साथ होलिका दहन की तैयारियां भी शुरु हो जाती है.

भगवान विष्णु ने नरसिंह का अवतार धारण कर खम्बे से निकल कर गोधुली बेला में दरवाजे की चोखट पर बैठकर अपने नाखूनों से अत्याचारी राजा हिरण्यकश्यप का वध किया। तभी से होली का त्यौहार मनाया जाता हैं। होली एक दिन का पर्व न होकर पूरे आठ दिन का त्योहार है। भगवान श्रीकृष्ण आठ दिन तक गोपियों संग होली खेले और दुलहंडी के दिन अर्थात होली को रंगों में सने कपड़ों को अग्नि के हवाले कर दिया, तब से आठ दिन तक यह पर्व मनाया जाने लगा।
होलिका दहन, होली त्यौहार का पहला दिन, फाल्गुन मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है। इसके अगले दिन रंगों से खेलने की परंपरा है जिसे धुलेंडी, धुलंडी और धूलि आदि नामों से भी जाना जाता है। होली बुराई पर अच्छाई की विजय के उपलक्ष्य में मनाई जाती है। होलिका पूजन करने के लिये होली से आठ दिन पहले होलिका दहन वाले स्थान को गंगाजल से शुद्ध कर उसमें सूखे उपले, सूखी लकडी, सूखी खास व होली का डंडा स्थापित कर दिया जाता है. जिस दिन यह कार्य किया जाता है, उस दिन को होलाष्टक प्रारम्भ का दिन भी कहा जाता है. जिस गांव, क्षेत्र या मौहल्ले के चौराहे पर पर यह होली का डंडा स्थापित किया जाता है. होली का डंडा स्थापित होने के बाद संबन्धित क्षेत्र में होलिका दहन होने तक कोई शुभ कार्य संपन्न नहीं किया जाता है. होलाष्टक से लेकर होलिका दहन के दिन तक प्रतिदिन इसमें कुछ लकडियां डाली जाती है. इस प्रकार होलिका दहन के दिन तक यह लकडियों का बडा ढेर बन जाता है. व इस दिन से होली के रंग फिजाओं में बिखरने लगते है. अर्थात होली की शुरुआत हो जाती है. बच्चे और बडे इस दिन से हल्की फुलकी होली खेलनी प्रारम्भ कर देते है.

फाल्गुन शुक्ल अष्टमी से फाल्गुन पूर्णिमा तक होलाष्टक माना जाता है, जिसमें शुभ कार्य वर्जित रहते हैं।
पूर्णिमा के दिन होलिका-दहन किया जाता है। इसके लिए मुख्यतः दो नियम ध्यान में रखने चाहिए….
- पहला, उस दिन “भद्रा” न हो। भद्रा का ही एक दूसरा नाम विष्टि करण भी है, जो कि 11 करणों में से एक है। एक करण तिथि के आधे भाग के बराबर होता है।
- दूसरा, पूर्णिमा प्रदोषकाल-व्यापिनी होनी चाहिए।
सरल शब्दों में कहें तो उस दिन सूर्यास्त के बाद के तीन मुहूर्तों में पूर्णिमा तिथि होनी चाहिए।
होलिका दहन (जिसे छोटी होली भी कहते हैं) के अगले दिन पूर्ण हर्षोल्लास के साथ रंग खेलने का विधान है और अबीर-गुलाल आदि एक-दूसरे को लगाकर व गले मिलकर इस पर्व को मनाया जाता है।
पुराणों के अनुसार दानवराज हिरण्यकश्यप ने जब देखा की उसका पुत्र प्रह्लाद सिवाय विष्णु भगवान के किसी अन्य को नहीं भजता, तो वह क्रुद्ध हो उठा और अंततः उसने अपनी बहन होलिका को आदेश दिया की वह प्रह्लाद को गोद में लेकर अग्नि में बैठ जाए; क्योंकि होलिका को वरदान प्राप्त था कि उसे अग्नि नुक़सान नहीं पहुँचा सकती। किन्तु हुआ इसके ठीक विपरीत – होलिका जलकर भस्म हो गयी और भक्त प्रह्लाद को कुछ भी नहीं हुआ। इसी घटना की याद में इस दिन होलिका दहन करने का विधान है। होली का पर्व संदेश देता है कि इसी प्रकार ईश्वर अपने अनन्य भक्तों की रक्षा के लिए सदा उपस्थित रहते हैं।
होली का वर्णन बहुत पहले से हमें देखने को मिलता है। प्राचीन विजयनगर साम्राज्य की राजधानी हम्पी में 16वीं शताब्दी का चित्र मिला है जिसमें होली के पर्व को उकेरा गया है। ऐसे ही विंध्य पर्वतों के निकट स्थित रामगढ़ में मिले एक ईसा से 300 वर्ष पुराने अभिलेख में भी इसका उल्लेख मिलता है। कुछ लोग मानते हैं कि इसी दिन भगवान श्री कृष्ण ने पूतना नामक राक्षसी का वध किया था। इसी ख़ुशी में गोपियों ने उनके साथ होली खेली थी।
फाल्गुन शुक्ल अष्टमी से लेकर होलिका दहन अर्थात पूर्णिमा तक होलाष्टक रहता है। इस दिन से मौसम की छटा में बदलाव आना आरम्भ हो जाता है. सर्दियां अलविदा कहने लगती है, और गर्मियों का आगमन होने लगता है. साथ ही वसंत के आगमन की खुशबू फूलों की महक के साथ प्रकृ्ति में बिखरने लगती है. होलाष्टक के विषय में यह माना जाता है कि जब भगवान श्री भोले नाथ ने क्रोध में आकर काम देव को भस्म कर दिया था, तो उस दिन से होलाष्टक की शुरुआत हुई थी.
यदि परिवार में कोई व्यक्ति निरन्तर अस्वस्थ्य रहता है, तो होली के दिन सुबह आटे की 2 लोई बनाकर उसमें गीले चने की दाल के साथ गुड़ और थोड़ी मात्रा में पिसी काली हल्दी को दबाकर मरीज के ऊपर से 7 बार उतार कर गाय को खिला दें। फिर होली का पूजन कर घर लौट आएं।
काले कपड़े में काली हल्दी को बांधकर 7 बार ऊपर से उतार कर होली की अग्नि में भस्म कर दें।
होलाष्टक से जुडी मान्यताओं को भारत के कुछ भागों में ही माना जाता है। इन मान्यताओं का विचार सबसे अधिक पंजाब में देखने में आता है. होली के रंगों की तरह होली को मनाने के ढंग में विभिन्न है. होली उत्तर प्रदेश, राजस्थान, पंजाब, हरियाणा, तमिलनाडू, गुजरात, महाराष्ट्र, उडिसा, गोवा आदि में अलग ढंग से मनाने का चलन है. देश के जिन प्रदेशो में होलाष्टक से जुडी मान्यताओं को नहीं माना जाता है। उन सभी प्रदेशों में होलाष्टक से होलिका दहन के मध्य अवधि में शुभ कार्य करने बन्द नहीं किये जाते है.
होलाष्टक के दिनों में कोई भी शुभ कार्य प्रारंभ करना वर्जित होगा। ज्योतिशास्त्र के अनुसार होलाष्टक के दौराना किया गया कार्य विपरीत परिणामा लेकर आ सकता है और ये आपके लिए पीड़ादायी एवं कष्टकारी बन सकता है। ज्योतिष की दृष्टि से होलाष्टक एक दोष माना जाता है, जिसमें किसी भी तरह का मंगल या शुभ कार्य प्रारंभ करने पर वह अत्यंत ही पीड़ादायी सिद्ध होता है। होलाष्टक के आठ दिन किसी भी ऐसे कार्य करने के लिए पूर्णत अशुभ माने जाते हैं, जो आपके जीवन में मंगलकारी माने गए हैं। ज्योतिष शास्त्र का कथन है होलाष्टक को ज्योतिष की दृष्टि से एक होलाष्टक दोष माना जाता है जिसमें विवाह, गर्भाधान, गृह प्रवेश, निर्माण, आदि शुभ कार्य वर्जित हैं। इस वर्ष होलाष्टक 26 फरवरी, गुरुवार से प्रारंभ हो रहा है, जो 5 मार्च होलिका दहन के साथ ही समाप्त हो जाएगा अर्थात् आठ दिनों का यह होलाष्टक दोष रहेगा। जिसमें सभी शुभ कार्य वर्जित है।
लेख – पंडित विशाल दयानंद शास्त्री
(ज्योतिष-वास्तु सलाहकार)
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